प्रेरितों के काम 4:24
पाठ
धमकियाँ खाकर पतरस और यूहन्ना अपने साथियों के पास लौटते हैं और सब कुछ कह सुनाते हैं: महासभा ने क्या कहा, क्या चेतावनी दी, यीशु का नाम लेने पर क्या रोक लगाई। मण्डली की प्रतिक्रिया न घबराहट है, न रणनीति। वे "एक चित्त होकर ऊँचे शब्द से परमेश्वर से" बोलते हैं, और प्रार्थना का पहला वाक्य उनके संकट के बारे में नहीं, परमेश्वर के बारे में है: "हे प्रभु, तू वही है जिसने स्वर्ग और पृथ्वी और समुद्र और जो कुछ उनमें है बनाया।" पहले सृष्टिकर्ता को सम्बोधन, फिर भजन का उद्धरण, और बहुत बाद में जाकर अपनी ज़रूरत। यह आयत उस प्रार्थना का द्वार है, और द्वार ही पूरे घर का आकार बता देता है।
मूल बात
यहाँ जिस शब्द का अनुवाद "हे प्रभु" हुआ है, वह यूनानी में सामान्य क्यूरिओस नहीं बल्कि देस्पोतेस है, यानी वह स्वामी जिसके पास दासों पर पूरा अधिकार है। यह संयोग नहीं कि छह आयत आगे वही लोग खुद को "अपने दासों" कहते हैं। जिस सुबह महासभा ने उन पर मालिकाना हक जताया था, उसी शाम वे घोषणा करते हैं कि उनका मालिक कोई और है। और यह मालिक समुद्र तक का रचयिता है, उस समुद्र का जो पूरे पुराने नियम में अराजकता और भय का प्रतीक रहा। धमकी देनेवाले याजक भी उसी की बनाई हुई धूल से हैं। प्रार्थना यहाँ वास्तविकता का नाप बदल देती है: संकट छोटा नहीं होता, पर वह अचानक एक बहुत बड़े संसार के भीतर रख दिया जाता है।
मुख्य सूत्र
सृष्टिकर्ता को पुकारना यहाँ कोई धार्मिक औपचारिकता नहीं, यह दावा है कि जो संसार धमकी दे रहा है वह परमेश्वर का अपना बनाया हुआ है। और उसी संसार में, उसी यरूशलेम में, उनके अनुसार परमेश्वर ने अपने "पवित्र सेवक यीशु" को भेजा और वही संसार उसके विरोध में इकट्ठा हुआ। मण्डली यह नहीं कहती कि क्रूस ने परमेश्वर की योजना तोड़ दी; वे कहते हैं कि हाकिमों ने वही किया "जो कुछ पहले से तेरी सामर्थ्य और मति से ठहरा था"। यही बाइबल का लंबा सूत्र है: जिसने आरम्भ में आकाश, पृथ्वी और समुद्र रचे, वही अंत तक इतिहास का लेखक है, और उसकी कलम क्रूस पर भी नहीं टूटी। पतरस ने कुछ ही घंटे पहले यीशु को ठुकराया हुआ पत्थर कहा था जो कोने का सिरा बन गया; अब वही मण्डली उस पत्थर के रचयिता से बात कर रही है।
दर्पण
हममें से ज़्यादातर लोग प्रार्थना वहीं से शुरू करते हैं जहाँ दर्द है। वकील का नोटिस, बॉस का वह मेल जिसमें "अंतिम चेतावनी" लिखा है, डॉक्टर की रिपोर्ट, रिश्तेदार की ज़हरीली बात, बच्चे का फ़ोन जो उठता ही नहीं। हम सीधे मुद्दे पर आते हैं, और इसमें कुछ गलत नहीं; पर ध्यान दीजिए, इस मण्डली ने अपनी ज़रूरत छठी आयत बाद रखी। उन्होंने पहले यह याद किया कि वे किसके संसार में खड़े हैं, और तब धमकी का आकार अपने आप सही हो गया। डर हमें हमेशा यह झूठ बेचता है कि धमकी देनेवाला ही सबसे बड़ा है। आज जो एक काम कीजिए: जिस चिट्ठी, मेसेज या रिपोर्ट से आप डरे हुए हैं उसे सामने रखिए, और कुछ भी माँगने से पहले आयत 24 का वाक्य ऊँची आवाज़ में बोलिए, "हे प्रभु, तू वही है जिसने स्वर्ग और पृथ्वी और समुद्र और जो कुछ उनमें है बनाया।"
मुख्य पात्र
इस आयत का मुख्य पात्र बोलता नहीं, केवल सम्बोधित किया जाता है, और फिर भी वही पूरे दृश्य को भर देता है। जिस परमेश्वर को मण्डली पुकारती है, वह दूर का निर्माता नहीं जिसने संसार बनाकर छोड़ दिया; वह वही स्वामी है जो अपने दासों की धमकियों को "देख" सकता है, जिसका हाथ चंगा करने के लिये बढ़ता है, जिसकी उपस्थिति से कमरा हिल जाता है। बाइबल का परमेश्वर इतना बड़ा है कि समुद्र उसकी रचना है, और इतना निकट कि दो अनपढ़ मछुआरों की हिम्मत उसकी चिन्ता का विषय है। यही संतुलन हमारी प्रार्थना को बचाता है: अगर वह केवल बड़ा होता तो हम उससे कुछ माँगते नहीं, और अगर वह केवल निकट होता तो हमारी माँग का कोई वज़न न होता।
एक बारीकी
"ऊँचे शब्द से" इस वाक्य में सबसे तीखा हिस्सा है। उसी दिन महासभा ने आदेश दिया था, "यीशु के नाम से कुछ भी न बोलना और न सिखाना।" चुप कराए गए लोग घर लौटते हैं और सबसे पहले जो करते हैं वह है आवाज़ ऊँची करना। पर ध्यान दीजिए किसकी ओर: वे सत्ता के विरुद्ध नारा नहीं लगाते, वे परमेश्वर से बोलते हैं। और यह आवाज़ "एक चित्त होकर" उठती है, जैसे किसी ने पहले से शब्द तय कर दिए हों। जिस समुदाय की ज़बान बाहर बंद की जाती है, उसकी प्रार्थना भीतर और ऊँची हो जाती है, और आयत 31 बताती है कि इसका असर क्या हुआ: स्थान हिल गया और वे फिर साहस से बोलने लगे।
शास्त्र के भीतर गूँज
सबसे साफ़ गूँज हिजकिय्याह की है। अश्शूर के राजा की धमकी भरी चिट्ठी लेकर वह मन्दिर में जाता है, उसे परमेश्वर के सामने फैलाता है, और प्रार्थना इन्हीं शब्दों से शुरू करता है कि आप ही ने आकाश और पृथ्वी बनाए, आप ही पृथ्वी के सब राज्यों के परमेश्वर हैं (2 राजा 19)। मण्डली उस प्रार्थना की भाषा में बोल रही है, और इसका अर्थ है कि वे महासभा को सन्हेरीब की श्रेणी में रख रहे हैं: शोर बहुत, अधिकार सीमित। दूसरी गूँज भजन 146 की है, जिसका हवाला पाठ के हाशिये में दिया गया है। वह भजन कहता है कि राजकुमारों पर भरोसा मत रखो, उनमें उद्धार नहीं; भरोसा उस पर रखो जिसने आकाश, पृथ्वी और समुद्र बनाए। पतरस ने कुछ घंटे पहले उसी बात का दूसरा पहलू कहा था, "किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं।" और फिर भजन 2, जिसे वे खुलकर उद्धृत करते हैं: जातियों का हुल्लड़ व्यर्थ है। तीनों मिलकर एक ही बात कहते हैं, पर ध्यान दीजिए कि यहाँ तनाव भी है। भजन 2 में परमेश्वर हँसकर शत्रुओं को तोड़ देता है; प्रेरित प्रार्थना में सुरक्षा नहीं, साहस माँगते हैं। उद्धार मिलता है, पर छुटकारे के रूप में नहीं, गवाही की शक्ति के रूप में।
चिंतन
आपकी पिछली सच्ची प्रार्थना का पहला वाक्य क्या था, और वह आपके परमेश्वर के बारे में क्या बताता है?
यदि परमेश्वर आपकी वर्तमान परिस्थिति से छुटकारा नहीं, बल्कि उसमें बोलने का साहस दें, तो क्या आप उसे उत्तर मानेंगे?
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Acts 4:24 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
प्रेरितों के काम 4:24 का क्या अर्थ है?
प्रेरितों के काम 4:24 किस विषय में है?
प्रेरितों के काम 4:24 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
प्रेरितों के काम 4:24 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
प्रेरितों के काम 4:24 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Acts 4 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, जब दबाव और धमकियाँ मुझे घेर लेती हैं, मुझे ऐसे लोग दीजिए जिनके पास मैं लौट सकूँ, जो सुनें और मेरे साथ प्रार्थना करें। मुझे भी किसी के लिए वैसा ही साथ बनने की कृपा दीजिए। अकेले लड़ने की ज़िद मुझसे ले लीजिए।
और उन्होंने उन्हें पकड़कर दूसरे दिन तक हिरासत में रखा, क्योंकि संध्या हो गई थी।" पतरस और यूहन्ना का वह पहला दिन जेल में बीता। पर उसी शाम, जब वे सलाखों के पीछे थे, पाँच हज़ार लोगों ने वचन मान लिया। तुम्हें रोका जा सकता है, तुम्हारे वचन को नहीं। आज अगर कोई दरवाज़ा तुम पर बंद हुआ है, याद रखो, परमेश्वर का काम उस रात भी नहीं रुका।
पतरस के शब्दों में एक गहरी विडंबना छिपी है: "यदि आज हम से इस दुर्बल मनुष्य के साथ किए गए उपकार के विषय में पूछा जाता है कि वह किस रीति से अच्छा हुआ।" एक भले काम के लिए कठघरे में खड़ा होना। कभी सोचा है, तेरी भलाई भी शायद सवालों के घेरे में आए? पतरस ने बचाव नहीं, बल्कि यीशु का नाम बोला।
हे प्रभु, जब लोग मुझ पर सवाल उठाएँ और मेरे विश्वास को परखें, तब मुझे शांत रख। जो सच्चाई तूने मुझ में डाली है, वह इतनी स्पष्ट हो कि दूसरों को रुककर सोचना पड़े। मेरे शब्दों और कामों में तेरी ज्योति चमके।
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