प्रेरितों के काम 9
पाठ
शाऊल दमिश्क की धूल भरी सड़क पर चल रहा है, हाथ में महायाजक की चिट्ठियाँ, मन में गिरफ्तारी की सूची। फिर अचानक ज्योति, ज़मीन, और एक आवाज़ जो उसका नाम दो बार पुकारती है: "हे शाऊल, हे शाऊल, तू मुझे क्यों सताता है?" तीन दिन के अंधेरे और उपवास के बाद हनन्याह नाम का एक डरा हुआ शिष्य उस पर हाथ रखता है, और सतानेवाला प्रचारक बन जाता है। अध्याय का दूसरा आधा भाग पतरस को लुद्दा और याफा ले जाता है, जहाँ ऐनियास खाट से उठता है और मरी हुई तबीता आँखें खोलती है। एक ही अध्याय में तीन बार कोई उठाया जाता है: ज़मीन से, बिछौने से, मृत्यु से।
मर्म
ध्यान दीजिए कि प्रभु यह नहीं पूछते, "तू मेरे लोगों को क्यों सताता है?" वे कहते हैं, "मैं यीशु हूँ; जिसे तू सताता है।" स्वर्ग में बैठा हुआ मसीह अपने आप को उन बंधे हुए, पिटते हुए, भागते हुए विश्वासियों के साथ इस हद तक एक कर लेता है कि उनका घाव उनका अपना घाव है। यहीं इस अध्याय का धर्मशास्त्र छिपा है: कलीसिया कोई संगठन नहीं, मसीह का शरीर है। और दूसरी बात, जो और भी असहज है: शाऊल कुछ खोज नहीं रहा था। वह पश्चाताप की ओर नहीं, हिंसा की ओर बढ़ रहा था। अनुग्रह ने उसकी खोज का उत्तर नहीं दिया, उसकी यात्रा को बीच में तोड़ दिया। हम बचाए जाने में सहयोग नहीं करते; हम गिराए जाते हैं और फिर उठाए जाते हैं।
सूत्र
पूरे पुराने नियम में परमेश्वर नाम दोहराकर पुकारते हैं: "अब्राहम, अब्राहम", "मूसा, मूसा", "शमूएल, शमूएल"। हर बार वह पुकार किसी मोड़ पर आती है, जहाँ एक जीवन परमेश्वर के बड़े उद्देश्य में खींच लिया जाता है। "हे शाऊल, हे शाऊल" उसी परंपरा में खड़ा है, पर एक अंतर के साथ: पहले वाले सेवक थे, यह शत्रु है। और फिर प्रभु उसे "मेरा चुना हुआ पात्र" कहते हैं, वही शब्द जो इस्राएल के चुनाव की भाषा है। जिस कहानी में परमेश्वर एक परिवार से एक जाति और एक जाति से सारी जातियों तक पहुँचते हैं, उसमें अन्यजातियों का प्रेरित इसी सड़क पर पैदा होता है। मुक्ति का इतिहास अपने सबसे कट्टर विरोधी को अपना सबसे दूर तक जानेवाला दूत बना लेता है।
दर्पण
हनन्याह पर रुकिए, क्योंकि हममें से ज़्यादातर शाऊल नहीं, हनन्याह हैं। उसका डर जायज़ है: "मैंने इस मनुष्य के विषय में बहुतों से सुना है।" उसके पास सूचना है, अनुभव है, और शायद ऐसे दोस्त जो शाऊल के कारण अब नहीं रहे। परमेश्वर उसके डर को झुठलाते नहीं, बस उसे भेजते हैं। सोचिए उस रिश्तेदार के बारे में जिसने आपके परिवार को तोड़ा, उस सहकर्मी के बारे में जिसने आपकी प्रतिष्ठा गिराई, उस व्यक्ति के बारे में जिसका नाम सुनते ही आपका पेट सिकुड़ता है। हनन्याह उस कमरे में जाता है और पहला शब्द बोलता है: "हे भाई शाऊल।" भाई। यह शब्द उसे कितना महँगा पड़ा होगा। आज इतना कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिससे आप डरते हैं, और उस नाम के आगे लिख दीजिए, "प्रभु का चुना हुआ पात्र हो सकता है", और उसके लिए दो मिनट प्रार्थना कीजिए।
बारीकी
तीन दिन। शाऊल न देख सका, न खाया, न पिया। कहानी इस खामोशी को समझाती नहीं, बस दर्ज करती है। हम जानना चाहते हैं कि उन तीन दिनों में उसके भीतर क्या चला, पर पाठ हमें अंदर नहीं आने देता। इतना ही कहा गया है: "वह प्रार्थना कर रहा है।" जो आदमी जीवन भर आराधनालय में प्रार्थना करता आया था, उसकी प्रार्थना अब पहली बार गिनी जाती है। और अंधापन एक तरह की दया है: जिस आदमी को लगता था कि वह सब कुछ साफ़ देख रहा है, उसे अंधकार में बैठाया जाता है ताकि वह सचमुच देखना सीखे। परमेश्वर हर काम बिजली की तरह नहीं करते; कभी वे तीन दिन का अँधेरा देते हैं और चुप रहते हैं।
अंतर्पाठ
लूका जानबूझकर पतरस के चमत्कारों को यीशु की भाषा में लिखता है। "हे तबीता, उठ" उस आरामी शब्द के इतना करीब है जो यीशु ने याईर की बेटी से कहा था, और "उठ, अपना बिछौना उठा" तो लगभग शब्दशः वही है जो कफरनहूम में लकवे के मारे हुए से कहा गया। अंतर यह है कि पतरस पहले घुटने टेकता है और प्रार्थना करता है; वह उधार की सामर्थ्य से काम करता है। और शाऊल का टोकरे में शहरपनाह से उतारा जाना उसी आदमी की पहली सार्वजनिक हार है जो घोड़े पर सवार होकर आया था। बाद में वह खुद इसी घटना को अपनी कमज़ोरी की सूची में गिनेगा।
संदर्भ
यह लगभग ईस्वी 33 से 35 का समय है, स्तिफनुस के पत्थरवाह के तुरंत बाद। दमिश्क यरूशलेम से लगभग दो सौ किलोमीटर दूर, रोमी प्रांत में, पर वहाँ की बड़ी यहूदी बस्ती पर महायाजक का नैतिक अधिकार अब भी चलता था; इसीलिए चिट्ठियाँ चाहिए थीं। शाऊल कोई सिरफिरा नहीं, तरसुस का शिक्षित, धर्मशास्त्री फरीसी है, जो ईमानदारी से मानता है कि यह नया "पंथ" इस्राएल को भ्रष्ट कर रहा है। ध्यान रहे, तब मसीही खुद को अलग धर्म नहीं मानते थे; वे आराधनालय में जाते थे। और अंत की छोटी सी पंक्ति कि पतरस चमड़े का धंधा करनेवाले शमौन के यहाँ ठहरा, अपने आप में क्रांति है: यह पेशा शुद्धता के नियमों की सीमा पर था। अगला अध्याय बताएगा कि परमेश्वर पतरस को कहाँ ले जा रहे हैं।
चिंतन
तीन दिन के अंधकार में, जब परमेश्वर चुप थे, शाऊल क्या कर रहा था? आपके जीवन में वह खामोश समय कौन सा है जिसे आप अब तक व्यर्थ मानते आए हैं?
हनन्याह के मुँह से "हे भाई शाऊल" निकलने में कितनी देर लगी होगी? किस नाम को "भाई" या "बहन" कहना आपके लिए आज सबसे कठिन है, और क्यों?
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Acts 9 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
प्रेरितों के काम 9 का क्या अर्थ है?
प्रेरितों के काम 9 किस विषय में है?
प्रेरितों के काम 9 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
प्रेरितों के काम 9 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
प्रेरितों के काम 9 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Acts 9 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
याफा में उसकी पहचान यही थी: "वह बहुत भले-भले काम और दान किया करती थी।" कोई प्रवचन नहीं, कोई बड़ा पद नहीं, बस सुई, धागा और विधवाओं के लिए बनाए कपड़े। परमेश्वर ने उसी छोटे काम को अपनी किताब में लिख लिया। आज तुम्हारे हाथ जो चुपचाप करते हैं, वह भी उससे छिपा नहीं है।
प्रभु, मुझे भी उठा और चलने की हिम्मत दे। मैं पूरा रास्ता जानना चाहता हूँ, पर तू सिर्फ अगला कदम दिखाता है। मुझे इतना भरोसा दे कि तेरे कहने पर निकल पड़ूँ, और जहाँ तू भेजे वहाँ तेरी आवाज़ सुनने को तैयार रहूँ।
प्रभु, तूने पौलुस को बुलाया और साथ ही यह भी बताया कि तेरे नाम के लिए दुख सहना पड़ेगा। मुझे डर लगता है, फिर भी मैं तेरे पीछे चलना चाहता हूँ। जब राह कठिन हो, तो मुझे थामे रखना और यह याद दिलाना कि तू मेरे साथ है।
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