कुलुस्सियों 3
पाठ
"क्योंकि तुम तो मर गए, और तुम्हारा जीवन मसीह के साथ परमेश्वर में छिपा हुआ है।" यह वाक्य पूरे अध्याय की नींव है। पौलुस पहले तेरह वचनों में एक तथ्य बताते हैं: विश्वासी मसीह के साथ मर गए और जिलाए गए हैं, इसलिए उनका ध्यान वहाँ लगे जहाँ मसीह परमेश्वर के दाहिने विराजमान हैं। इसके बाद वे दो सूचियाँ देते हैं, एक उतारने की और एक पहनने की: व्यभिचार, लोभ, क्रोध, झूठ उतार दो; करुणा, दीनता, सहनशीलता, क्षमा और सबसे ऊपर प्रेम पहन लो। अध्याय का अंत घर की चौखट पर होता है, जहाँ पति-पत्नी, माता-पिता, बच्चे और दास अपने रोज़ के रिश्तों में यही नया मनुष्यत्व जीते हैं।
मर्म
यह अध्याय नैतिकता की सूची नहीं, पहचान का दस्तावेज़ है। ध्यान दीजिए कि आदेश कहाँ से आता है: "तो जब तुम मसीह के साथ जिलाए गए।" पहले घटना, फिर आचरण। ईसाई नैतिकता कुछ बनने की कोशिश नहीं, कुछ हो चुके होने का परिणाम है। और वह "कुछ" हमारे भीतर नहीं, मसीह में छिपा है, परमेश्वर के पास सुरक्षित।
यही बात लोभ को मूर्तिपूजा कहने का अर्थ खोलती है। लोभ केवल ज़्यादा चाहना नहीं; वह जीवन को किसी और चीज़ में ढूँढ़ना है, जबकि पौलुस कहते हैं "मसीह जो हमारा जीवन है।" पाप यहाँ नियम-भंग से पहले पते की गलती है: हम वहाँ जीवन खोजते हैं जहाँ वह नहीं है।
सूत्र
पौलुस पुराने नियम के दो बड़े धागों को यहाँ एक साथ बाँधते हैं। पहला, सृष्टि: नया मनुष्यत्व "अपने सृजनहार के स्वरूप के अनुसार" नया बनता जाता है। उत्पत्ति में मनुष्य परमेश्वर के स्वरूप में बनाया गया था; वह स्वरूप टूटा, और मसीह में उसकी मरम्मत नहीं, बल्कि पुनर्रचना हो रही है।
दूसरा, वाचा के लोगों का बिखराव। "न तो यूनानी रहा, न यहूदी, न खतना, न खतनारहित, न जंगली, न स्कूती, न दास और न स्वतंत्र।" बाबेल से बिखरी मानवजाति और खतने की दीवार से बँटा इस्राएल, दोनों का उत्तर एक वाक्य में आता है: "केवल मसीह सब कुछ और सब में है।" उद्धार की योजना का लक्ष्य यही है, एक देह जिसमें मसीह की शान्ति राज्य करे।
दर्पण
यह अध्याय आपकी पवित्रता की जाँच वहाँ करता है जहाँ आप सबसे कम देखे जाते हैं। ध्यान दीजिए, सूची में क्रोध और गालियों के बाद सीधे आता है "एक दूसरे से झूठ मत बोलो।" यह मंच का पाप नहीं, रसोई और दफ़्तर का पाप है: वह आधा सच जो झगड़ा टाल देता है, वह आँकड़ा जो थोड़ा सुधार दिया जाता है।
और क्षमा का माप देखिए: "जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो।" यहाँ वह रिश्ता कल्पना कीजिए जिसे आपने "अब बस, बहुत हुआ" कहकर बन्द कर दिया है। पौलुस उस दरवाज़े पर दस्तक नहीं देते, वे उसे खोल देते हैं। आपके पास ठोस शिकायत हो सकती है; वचन 13 उसे मानता भी है, फिर भी सहने और क्षमा करने को कहता है।
मुख्य पात्र
इस अध्याय का मुख्य पात्र पौलुस नहीं, कुलुस्से की कलीसिया भी नहीं, बल्कि मसीह हैं, और वे तीन मुद्राओं में दिखते हैं। वे विराजमान हैं, परमेश्वर के दाहिनी ओर, अर्थात् अधिकार में। वे छिपे हैं, और उनके साथ आपका जीवन भी छिपा है, इसलिए विश्वास अभी दृश्य नहीं है। और वे प्रगट होंगे, तब जो छिपा है वह महिमा सहित सामने आएगा।
इन तीनों के बीच एक चौथी बात है: वे क्षमा करने वाले हैं। पूरे अध्याय की नैतिकता उसी क्षमा की नकल है, नकल नहीं, विस्तार। "मसीह की शान्ति… तुम्हारे हृदय में राज्य करे" में वही राजा फिर दिखते हैं, अब सिंहासन पर नहीं, आपके भीतर पंचायत करते हुए।
संदर्भ
कुलुस्से एशिया माइनर का एक ढलता हुआ व्यापारिक कस्बा था, और यह पत्र पौलुस ने बन्दीगृह से लिखा। वहाँ की कलीसिया में एक शिक्षा घुस आई थी जो आत्मिक उन्नति के लिए विशेष ज्ञान, व्रत, नियम और स्वर्गदूतों की आराधना का रास्ता बताती थी। उसके सामने पौलुस "स्वर्गीय वस्तुओं पर ध्यान" का अर्थ बदल देते हैं: यह शरीर से भागना नहीं, विराजमान मसीह की ओर मुड़ना है।
अध्याय का अंत यूनानी-रोमी घर के ढाँचे को छूता है, जहाँ गृहस्वामी के पास पत्नी, बच्चों और दासों पर लगभग निर्विवाद अधिकार था। इस माहौल में पतियों को कठोरता से मना करना, पिताओं को बच्चों का साहस तोड़ने से रोकना, और दास को "प्रभु मसीह की सेवा" करता हुआ बताना, चुपचाप विस्फोटक था।
प्रश्न
फिर भी ईमानदारी से कहें: पौलुस दासत्व को समाप्त नहीं करते। वे दास को धैर्य सिखाते हैं और स्वामी को अगले अध्याय में चेतावनी देते हैं, पर व्यवस्था वहीं खड़ी रहती है। यह हमें खटकता है, और खटकना चाहिए।
दो बातें फिर भी ध्यान देने योग्य हैं। पहली, वचन 11 पहले ही कह चुका है कि मसीह में "न दास और न स्वतंत्र" रहा; यह घोषणा अपने भीतर उस ढाँचे की मौत का बीज लिए है। दूसरी, वचन 25: "वहाँ किसी का पक्षपात नहीं।" रोम के कानून में मालिक और दास बराबर नहीं थे; परमेश्वर के न्याय में हैं।
लेकिन इससे यह प्रश्न नहीं मिटता कि परमेश्वर ने अन्याय को इतनी देर सहने क्यों दिया। पौलुस उत्तर नहीं देते। वे केवल यह कहते हैं कि जीवन अभी छिपा है और एक दिन प्रगट होगा। यह सस्ती तसल्ली नहीं; यह प्रतीक्षा है, और प्रतीक्षा का दर्द असली है।
चिन्तन
आपके जीवन का कौन-सा हिस्सा इस बात से चलता है कि लोग देख रहे हैं, और वह वचन 23 के "तन मन से, प्रभु के लिये" के सामने कैसा दिखता है?
"जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए" इस माप को आप किस एक व्यक्ति पर लागू करने से बच रहे हैं, और उसका असली कारण क्या है?
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Colossians 3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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कुलुस्सियों 3 का क्या अर्थ है?
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कुलुस्सियों 3 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Colossians 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
हे बालको, सब बातों में अपने माता-पिता की आज्ञा मानो, क्योंकि प्रभु इससे प्रसन्न होता है।" पौलुस ने यह बात मंदिर या सभा के बारे में नहीं, घर की रसोई और आँगन के बारे में कही। जो बच्चा बिना बहस किए माँ की बात मान लेता है, वहीं स्वर्ग मुस्कुराता है। और तू, जिसके माता-पिता अब बूढ़े हो चले हैं, तेरी आवाज़ का लहजा भी तो आज्ञाकारिता ही है।
पिता, मेरे काम को सिर्फ़ लोगों की नज़रों से मत तौलने दे। जब कोई देख नहीं रहा होता, तब भी मेरा मन सीधा रहे। मुझे माफ़ कर जब मैं दिखावे के लिए मेहनत करता हूँ। आज जो भी ज़िम्मेदारी मेरे हाथ में है, उसे मैं तेरे सामने, सच्चे दिल से करूँ।
पिता, मेरे भीतर जो गुस्सा और कड़वाहट छिपी है, उसे तू जानता है। मुझे मदद कर कि मैं उसे पकड़े न रहूँ, बल्कि तेरे हाथों में रख दूँ। मेरी बातों से किसी का दिल न टूटे, बल्कि तेरी नरमी झलके।
हे पतियो, अपनी-अपनी पत्नी से प्रेम रखो और उनसे कठोरता न किया करो।" ध्यान दो, पौलुस ने पति को अधिकार जताने को नहीं कहा, प्रेम करने को कहा। और साथ में एक चेतावनी भी दी, क्योंकि प्रेम करते हुए भी आवाज़ कड़वी हो सकती है। घर में तुम्हारा लहज़ा भी तुम्हारी गवाही है। जिससे तुम सबसे ज़्यादा प्रेम करते हो, क्या उसी से सबसे कठोरता से बोलते हो?
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