गलातियों 5
पाठ
पौलुस के मुँह से एक ऐसा वाक्य निकलता है जिसे कोई प्रचारक आज मंच से बोलने की हिम्मत न करे: "भला होता, कि जो तुम्हें डाँवाडोल करते हैं, वे अपना अंग ही काट डालते!" यह अध्याय उसी तीखेपन से शुरू होता है, "मसीह ने स्वतंत्रता के लिये हमें स्वतंत्र किया है", और चेतावनी देता है कि खतना के द्वारा धर्मी ठहरने की कोशिश करना अनुग्रह से गिर जाना है। फिर मोड़ आता है: यह स्वतंत्रता शरीर के लिये खुला मैदान नहीं, बल्कि प्रेम में एक दूसरे का दास बनने का बुलावा है। अंत में दो सूचियाँ आमने-सामने रखी जाती हैं, शरीर के काम और आत्मा का फल।
मर्म
गलातियों की कलीसिया में सवाल यह नहीं था कि यीशु मसीह पर्याप्त हैं या नहीं, बल्कि यह कि क्या वे अकेले पर्याप्त हैं। मसीह और थोड़ा-सा खतना; अनुग्रह और थोड़ी-सी व्यवस्था। पौलुस कहता है: ऐसा जोड़ना संभव नहीं। "तुम जो व्यवस्था के द्वारा धर्मी ठहरना चाहते हो, मसीह से अलग और अनुग्रह से गिर गए हो।" धार्मिकता या तो पूरी तरह उपहार है, या फिर वह उपहार है ही नहीं। और ध्यान दीजिए कि पौलुस धार्मिकता को भविष्य में रखता है: "हम विश्वास से, आशा की हुई धार्मिकता की प्रतीक्षा करते हैं।" हम इसे अपने भीतर नापकर नहीं देखते; हम इसकी प्रतीक्षा करते हैं। यही अनुग्रह का स्वभाव है, वह हमेशा बाहर से आता है।
सूत्र
व्यवस्था बुरी नहीं थी। सीनै पर्वत पर परमेश्वर ने उसे वाचा के भीतर दिया, एक ऐसी प्रजा को जिसे वे पहले ही मिस्र से छुड़ा चुके थे। छुटकारा पहले, आज्ञाएँ बाद में। गलातिया के शिक्षक इस क्रम को उलट रहे थे: पहले आज्ञापालन, फिर अपनापन। पौलुस पूरे पुराने नियम के धागे को वापस सीधा करता है। और वह आगे बढ़कर कहता है कि व्यवस्था का लक्ष्य खो नहीं गया, वह पूरा हुआ है: "सारी व्यवस्था इस एक ही बात में पूरी हो जाती है, 'तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।'" यह लैव्यव्यवस्था का ही वचन है। मसीह ने व्यवस्था को रद्द नहीं किया, उसने उसे उसकी जड़ तक पहुँचा दिया, और आत्मा अब वही प्रेम भीतर से उगाते हैं जिसे पत्थर की पटियाएँ केवल माँग सकती थीं।
दर्पण
हममें से अधिकांश खतना नहीं कराते, पर हम सब कुछ न कुछ जोड़ते हैं। सुबह की प्रार्थना का समय, दशमांश का हिसाब, सेवा में उपस्थिति, बच्चों की परवरिश का रिकॉर्ड। ये सब अच्छी चीज़ें हैं, और ठीक इसीलिए ख़तरनाक हैं: हम इन्हें चुपचाप उस पलड़े पर रख देते हैं जिस पर केवल मसीह का क्रूस रखा जाना था। इसका लक्षण साफ़ है, और पौलुस उसे बेरहमी से नाम देता है, "यदि तुम एक दूसरे को दाँत से काटते और फाड़ खाते हो।" जहाँ लोग अपनी धार्मिकता कमा रहे होते हैं, वहाँ तुलना अनिवार्य है, और तुलना से डाह और छींटाकशी जन्म लेती है। कलीसिया में ज़हरीली राजनीति लगभग हमेशा अनुग्रह की कमी का फल होती है, नैतिक ढीलेपन का नहीं।
मुख्य पात्र
इस अध्याय का असली कर्ता पवित्र आत्मा हैं। ध्यान दीजिए कि पौलुस शरीर के "काम" कहता है पर आत्मा का "फल"। काम बनाए जाते हैं, फल उगता है। आप धीरज को दाँत भींचकर पैदा नहीं कर सकते, वह किसी जीवित चीज़ से निकलता है जो आपके भीतर बोई गई है। और यह सूची कोई भावनात्मक गुलदस्ता नहीं: प्रेम, आनन्द, शान्ति, धीरज, दया, भलाई, विश्वास, नम्रता, संयम। यह परमेश्वर के अपने चरित्र का चित्र है, जो एक साधारण मनुष्य में उतरता हुआ दिखता है। आत्मा हमें नियम नहीं थमाते, वे मसीह की समानता हमारे भीतर आकार देते हैं। इसीलिए पौलुस हँसकर जोड़ सकता है: "ऐसे-ऐसे कामों के विरोध में कोई व्यवस्था नहीं।"
प्रश्न
तो फिर पद 21 को क्या करें? "ऐसे-ऐसे काम करनेवाले परमेश्वर के राज्य के वारिस न होंगे।" यह उसी पत्री में है जो कहती है कि हम केवल विश्वास से धर्मी ठहरते हैं। क्या पौलुस विरोधाभास में फँस गया? मुझे लगता है नहीं, पर आसान समाधान भी नहीं है। वह उन कामों की बात नहीं कर रहा जो कभी-कभार हो जाते हैं और जिन पर हम रोते हैं, बल्कि उस जीवन-दिशा की जिसे कोई चुनकर जीता है। फिर भी यह चेतावनी असहज रहनी चाहिए। अनुग्रह की मुफ़्त प्रकृति कभी इस बात की गारंटी नहीं बनती कि हमारा जीवन जो भी हो वह अनदेखा रह जाएगा। राज्य उपहार है, पर उसे पाने वाले बदल जाते हैं। जो नहीं बदल रहा, उसे शांत नहीं, बेचैन होना चाहिए।
अंतर्पाठ
यीशु ने अंगूर की डाली की बात करते हुए यही कहा था, कि फल जुड़े रहने से आता है, ज़ोर लगाने से नहीं; पौलुस की "आत्मा का फल" उसी शिक्षा का दूसरा रूप है। और यहेजकेल में परमेश्वर ने वादा किया था कि वे अपना आत्मा भीतर देंगे ताकि लोग उनकी विधियों पर चलें। गलातियों 5 उस वादे की पूर्ति की घोषणा है: नई वाचा का हृदय-परिवर्तन अब बाहरी चिन्ह की जगह ले चुका है। इसीलिए पौलुस लिखता है कि "न खतना, न खतनारहित कुछ काम का है, परन्तु केवल विश्वास का जो प्रेम के द्वारा प्रभाव करता है।" विश्वास निष्क्रिय नहीं होता, वह काम करता है, और उसका काम प्रेम है।
चिंतन
आप अपने जीवन में मसीह के साथ चुपचाप क्या "जोड़" रहे हैं, और उस जोड़ को हटाने में आपको किस बात का डर लगता है?
पद 22-23 की सूची में से कौन-सा फल आपके भीतर सबसे कम दिखता है, और क्या आप उसे उगाने की कोशिश कर रहे हैं या आत्मा से माँग रहे हैं?
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Galatians 5 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पर यदि तुम एक दूसरे को दाँत से काटते और फाड़ खाते हो, तो चौकस रहो कि एक दूसरे का सत्यानाश न कर दो।" पौलुस ने जंगली जानवरों की भाषा चुनी, क्योंकि कलीसिया में बहस इतनी बढ़ गई थी। ध्यान दे, वह यह नहीं कहता कि तुम दूसरे को नष्ट कर दोगे, बल्कि दोनों मिटेंगे। जिस बात को लेकर तू आज किसी भाई से लड़ रहा है, क्या वह इस कीमत के लायक है?
हम घमण्ड करनेवाले न बनें, न एक दूसरे को चिढ़ाएँ, न एक दूसरे से डाह करें।" ध्यान दो, खोखला घमण्ड दो रास्ते बनाता है। जो हमसे पीछे लगते हैं, उन्हें हम चिढ़ाते हैं; जो हमसे आगे दिखते हैं, उनसे जलते हैं। दोनों में तुलना ही जड़ है। आत्मा का फल बताया जा चुका, अब सवाल यह है: क्या तेरी नज़र भाई को नापती है, या थामती है?
पौलुस उन लोगों को लिख रहा है जो व्यवस्था के छोटे से छोटे नियम पर बहस कर रहे थे, और उसी बीच एक दूसरे को काट खा रहे थे। उनसे वह कहता है, "क्योंकि सारी व्यवस्था इस एक ही बात में पूरी हो जाती है, 'तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।'" सोचो, जिस इंसान से तुम्हारी अनबन चल रही है, परमेश्वर की पूरी व्यवस्था उसी के साथ तुम्हारे बर्ताव में परखी जा रही है। सही होना काफी नहीं, प्रेम करना ज़रूरी है।
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