सभोपदेशक 5:12
पाठ
एक मज़दूर दिन भर हाथ-पैर चलाता है, शाम को थाली में कम हो या ज़्यादा, वह लेटता है और नींद उसे अपने में समेट लेती है। दूसरी ओर वह आदमी है जिसकी तिजोरी भरी जा रही है, और ठीक इसी बढ़ती के कारण उसकी आँखों से नींद उड़ी हुई है। उपदेशक दो बिस्तरों की तुलना कर रहा है, दो बैंक खातों की नहीं। वह यह नहीं कहता कि गरीबी अच्छी है या धन पाप है; वह सिर्फ़ यह देखता है कि जो चीज़ सुरक्षा देने का वादा करती है, वही रात को जागरण थमा देती है। "धन बढ़ने के कारण" शब्द चुभते हैं: समस्या कमी नहीं, बढ़ती है। जितना अधिक है, उतना अधिक खोने का डर है, और डर सोने नहीं देता।
मूल बात
नींद इस पद में एक धार्मिक शब्द है। सोने के लिए आपको अपने ऊपर से नियंत्रण छोड़ना पड़ता है; जो सोता है, वह मान लेता है कि अगले आठ घंटे दुनिया उसके बिना भी चल जाएगी, क्योंकि कोई और जाग रहा है। इसलिए बेचैन रात केवल तनाव का लक्षण नहीं, बल्कि उस भरोसे की परीक्षा है जिस पर हमारा जीवन टिका है। धनी आदमी सो नहीं पाता क्योंकि उसने अपनी सुरक्षा उस चीज़ में रखी है जिसकी रखवाली उसे ख़ुद करनी है। मज़दूर सो जाता है क्योंकि उसके पास पहरा देने लायक कुछ नहीं, और इसी खालीपन में वह परमेश्वर के हाथ में गिर जाता है। उपदेशक यहाँ कंजूसी नहीं सिखा रहा, वह दिखा रहा है कि थोड़े में तृप्ति परमेश्वर का वरदान है, और बहुत में बेचैनी उसकी चेतावनी।
सूत्र
यह पद उस दृश्य की ओर इशारा करता है जो सुसमाचार में एक नाव की पिछली कुर्सी पर घटता है। झील पर तूफ़ान है, पानी नाव में भर रहा है, अनुभवी मछुआरे घबराए हुए हैं, और यीशु मसीह तकिये पर सिर रखकर सो रहे हैं। यह वही नींद है जिसकी बात उपदेशक कर रहा है: उस व्यक्ति की नींद जिसके पास पहरा देने को कुछ नहीं, क्योंकि उसका सब कुछ पिता के हाथ में है। और ध्यान दीजिए, यह वही व्यक्ति है जिसके पास सिर रखने को अपनी कोई जगह नहीं थी, जो सबसे ग़रीब मज़दूर की तरह जीया और बिना संपत्ति के मरा, कपड़े तक बाँट दिए गए। मसीह ने वह तृप्ति जी कर दिखाई जिसे उपदेशक दूर से देख रहा था। और उन्हीं का बुलावा आज भी वही है: थके हुओं को विश्राम, बिना उन्हें पहले अमीर बनाए।
दर्पण
आपकी बेचैन रातें किस चीज़ की रखवाली कर रही हैं? कभी-कभी यह सचमुच पैसा होता है: वह लोन, वह निवेश, वह नौकरी जो अगले साल रहेगी या नहीं। पर तिजोरी के कई रूप हैं। एक माँ बच्चे के भविष्य की रखवाली करते हुए जागती है, एक पास्टर अपनी छवि की, एक बुज़ुर्ग अपने शरीर की। जो भी चीज़ आपने अपनी सुरक्षा का आधार बनाई है, उसी की चौकीदारी रात में आपके सिरहाने बैठ जाती है। और यह चौकीदारी कभी पूरी नहीं होती, क्योंकि जितना बचाने को है, उतना ही खोने को है। उपदेशक आपसे त्याग नहीं माँग रहा, वह पूछ रहा है कि क्या आप एक रात के लिए भी परमेश्वर को अपना काम सँभालने देंगे।
आज रात सोने से पहले, ऊँची आवाज़ में उस एक चीज़ का नाम लीजिए जिसकी फ़िक्र आपको जगाए रखती है, और कहिए: "यह आपका है, मैं अब सो रहा हूँ।"
मुख्य पात्र
इस पद का केंद्रीय पात्र वह धनी है, और उपदेशक उसे बिना व्यंग्य के, लगभग करुणा से देखता है। यह आदमी बुरा नहीं है; उसने मेहनत की, बचाया, बढ़ाया, वही किया जो हर समझदार आदमी करता है। पर उसकी संपत्ति ने उसे मालिक नहीं, पहरेदार बना दिया। पिछला पद कहता है कि संपत्ति बढ़ने पर "उसके खानेवाले भी बढ़ते हैं", और मालिक के हाथ बस देखना रह जाता है। यही उसका भीतरी नक्शा है: एक आदमी जो अँधेरे में छत की ओर देखता हुआ हिसाब लगा रहा है, और जिसके पास सब कुछ है सिवाय छोड़ देने की आज़ादी के। सोलहवें पद में वह "अंधकार में भोजन" करता है, दुःखित और क्रोधित। धन ने उसे भरा नहीं, उसे अकेला कर दिया।
संदर्भ
उपदेशक की दुनिया में न बैंक थे, न बीमा। धन का मतलब था अनाज के भंडार, पशु, चाँदी, ज़मीन, और ये सब चीज़ें चोरों, सूखे, राजा के कर-वसूलने वालों और घर के नौकरों के सामने खुली पड़ी थीं। अमीर आदमी को सचमुच जागकर पहरा देना पड़ता था। दूसरी ओर मज़दूर दिहाड़ी पर जीता था, शाम को मज़दूरी मिलती और उसी से रात का खाना बनता। इसी अध्याय में उपदेशक ने अभी-अभी कहा है कि प्रांतों में निर्धनों पर अंधेर होता है और अधिकारी के ऊपर अधिकारी बैठे हैं। यानी यह पद किसी शांत गाँव की कविता नहीं, एक शोषक व्यवस्था के बीच से आई हुई ठंडी टिप्पणी है: ऊपर चढ़ने की दौड़ जीतने वाले भी रात को हारते हैं।
कठिन प्रश्न
पर क्या ग़रीब सचमुच चैन से सोता है? जिसने भूख से बेचैन बच्चे को गोद में लिया हो, या किराए की तारीख़ गिनते हुए रात काटी हो, वह जानता है कि यह पद पूरी सच्चाई नहीं कहता। उपदेशक "सूर्य के नीचे" जो दिखता है वही लिखता है, और वह ग़रीबी का महिमामंडन नहीं कर रहा; आठवें पद में वही आदमी निर्धनों पर होते अंधेर पर चीख़ रहा है। इस पद को नियम बना देना क्रूरता होगी। और सबसे गहरी बात यह है कि हमारे प्रभु की आख़िरी रात नींद की नहीं थी: गतसमनी में वे जागे, पसीना बहाते हुए, जबकि शिष्य सो गए। उन्होंने हमारी बेचैनी अपने ऊपर ली, ताकि जो नींद यह पद वादा करता है वह अंततः किसी बैंक खाते पर नहीं, उनके जागरण पर टिके।
मनन
आप किस चीज़ की चौकीदारी करते-करते जागते हैं, और आपने आख़िरी बार कब उसे परमेश्वर के हाथ में सौंपा था?
अगर कल आपकी आमदनी दोगुनी हो जाए, तो आपकी नींद बेहतर होगी या बदतर, और यह उत्तर आपके भरोसे के बारे में क्या कहता है?
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जब सम्पत्ति बढ़ती है, तो उसके खानेवाले भी बढ़ जाते हैं; और उसके स्वामी को इससे क्या लाभ, सिवाय इसके कि वह उसे अपनी आँखों से देखता रहे?" सुलैमान के पास सब कुछ था, फिर भी उसने पाया कि बहुत सारा धन केवल देखने के लिए रह जाता है। जो तू जोड़ रहा है, क्या तू उसे सचमुच भोग रहा है, या बस पहरा दे रहा है? परमेश्वर के हाथ से मिली रोटी खाने में जो चैन है, वह तिजोरी में नहीं मिलता।
जो व्यक्ति परमेश्वर के दिए हुए को खाता, पीता और अपने परिश्रम में सुख पाता है, उसके बारे में सुलैमान कहता है, "परमेश्वर उसे उसके मन के आनन्द में लगाए रखता है।" ध्यान दे, यह आनन्द दिनों की गिनती भुला देता है। जो मन कड़वाहट और हिसाब में उलझा है, वह हर बीता दिन गिनता रहता है। आज तेरी थाली में जो सादा रोटी है, क्या तू उसे परमेश्वर का उपहार मानकर खा सकता है?
राजा सिंहासन पर बैठता है, मुकुट पहनता है, आज्ञा देता है। पर उसकी थाली में रोटी किसी किसान के पसीने से आती है। "राजा भी खेत से लाभ उठाता है।"
कोई इतना ऊँचा नहीं जो मिट्टी पर निर्भर न हो। और मिट्टी परमेश्वर की है।
जिस काम को तू छोटा समझकर करता है, कहीं ऐसा न हो कि उसी पर किसी का जीवन टिका हो। और जो तेरे पास है, वह भी किसी के हाथों से आया है, तेरी योग्यता से नहीं।
जब तू परमेश्वर के लिये मन्नत माने, तब उसे पूरी करने में विलम्ब न करना; क्योंकि वह मूर्खों से प्रसन्न नहीं होता। जो मन्नत तू ने मानी है उसे पूरी करना।" संकट की घड़ी में मुँह से निकली बातें याद हैं? "प्रभु, बस इस बार बचा ले, फिर मैं..." राहत मिल गई, और वादा वहीं छूट गया। परमेश्वर भूलता नहीं। आज उसके सामने बैठ, और जो कहा था उसे पूरा कर।
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