इफिसियों 1:1
पाठ
पत्र की पहली पंक्ति एक साधारण परिचय जैसी लगती है: भेजनेवाला कौन है, पानेवाले कौन हैं। पौलुस अपना नाम लिखते हैं और तुरंत बताते हैं कि वे किस अधिकार से लिख रहे हैं, "परमेश्वर की इच्छा से यीशु मसीह का प्रेरित।" यह उनका पेशा नहीं, उनकी नियुक्ति है, और नियुक्त करनेवाला वे स्वयं नहीं हैं। फिर वे पानेवालों को तीन शब्दों में बाँधते हैं: "उन पवित्र और मसीह यीशु में विश्वासी लोगों के नाम जो इफिसुस में हैं।" ये लोग एक ठोस शहर में रहते हैं, पर उनकी असली पहचान उस शहर से नहीं, बल्कि मसीह से जुड़ी हुई है। एक ही वाक्य में दो पते दिए गए हैं: एक भौगोलिक, एक आत्मिक।
मर्म
ध्यान दीजिए कि "इच्छा" शब्द यहाँ पहली बार आता है, पर आखिरी बार नहीं। वही इच्छा आगे जगत की उत्पत्ति से पहले चुनती है, वही "अपने भले अभिप्राय के अनुसार" लेपालक पुत्र ठहराती है, वही "सब कुछ" करती है। यानी पौलुस का प्रेरित होना कोई अलग-थलग घटना नहीं; वह उसी विशाल संकल्प का एक छोटा-सा दिखाई देनेवाला सिरा है जो सृष्टि से पहले शुरू हुआ। यही बात पानेवालों पर भी लागू होती है। उन्हें "पवित्र" कहा गया है, इसलिए नहीं कि उनका चालचलन निर्दोष था, बल्कि इसलिए कि परमेश्वर ने उन्हें अपने लिये अलग कर लिया। पवित्रता यहाँ पहले उपलब्धि नहीं, स्थिति है; अनुग्रह पहले आता है, आज्ञाकारिता उसके पीछे चलती है। और यह सारी स्थिति "मसीह यीशु में" टिकी है, किसी योग्यता पर नहीं।
सूत्र
"पवित्र लोग" कोई नया शब्द नहीं था। पुराने नियम में परमेश्वर ने इस्राएल को सब जातियों में से अपने लिये अलग किया, एक पवित्र जाति, एक याजकों का राज्य, इसलिए नहीं कि वे बेहतर थे, बल्कि इसलिए कि परमेश्वर ने उन्हें चुना। अब वही शब्द इफिसुस के गैर-यहूदी विश्वासियों पर लगाया जा रहा है, जो कल तक अर्तिमिस के मंदिर की छाया में जीते थे। यह वाचा की भाषा का विस्तार है, टूटन नहीं। और यह विस्तार मसीह के द्वारा होता है: यही पत्र आगे कहता है कि परमेश्वर की योजना है, "समय की पूर्ति होने पर, जो कुछ स्वर्ग में और जो कुछ पृथ्वी पर है, सब कुछ वह मसीह में एकत्र करे।" पहली पंक्ति का छोटा-सा "मसीह यीशु में" उसी विशाल संग्रह का पहला संकेत है। जो बिखरा था, वह एक व्यक्ति में इकट्ठा किया जा रहा है।
दर्पण
हम अपना परिचय आमतौर पर पहले पते से देते हैं: नाम, काम, शहर, पद। शिक्षक हूँ, इंजीनियर हूँ, अमुक कलीसिया में सेवा करता हूँ। यह स्वाभाविक है, पर खतरनाक भी, क्योंकि जो चीज़ आपकी पहचान बनाती है वही आपको तोड़ भी सकती है। नौकरी चली जाए, तबादला हो जाए, बच्चे दूर चले जाएँ, शरीर साथ छोड़ दे, और अचानक लगता है कि "मैं कौन हूँ" का उत्तर खाली हो गया। पौलुस दोनों पते साथ लिखते हैं, पर क्रम बदल देते हैं: पहले पवित्र और विश्वासी, फिर इफिसुस। आपका शहर आपका पता है, आपकी अवस्था नहीं। और यह दूसरा पता आपने कमाया नहीं; परमेश्वर ने आपको अपने लिये अलग किया, इसलिए वह छिन नहीं सकता।
आज एक कागज़ पर लिखिए कि पिछली बार आपने अपना परिचय कैसे दिया था, और उसके नीचे लिखिए: "मसीह यीशु में, परमेश्वर के द्वारा अपने लिये अलग किया हुआ।" फिर उसे ज़ोर से पढ़िए।
अंतर्पाठ
कुरिन्थुस की कलीसिया को पौलुस उसी शब्द से संबोधित करते हैं, "पवित्र लोग", हालाँकि उस कलीसिया में फूट, मुकदमेबाज़ी और खुला व्यभिचार तक था। यह तुलना ज़रूरी है, क्योंकि वह दिखाती है कि "पवित्र" पौलुस के लिए प्रशंसा-पत्र नहीं, स्थिति का बयान है; और यही कारण है कि वे बाद में उन्हें डाँट सकते हैं, क्योंकि वे उन्हें उनकी असली पहचान की याद दिला रहे हैं। दूसरी ओर, निर्गमन में सीनै पर्वत पर परमेश्वर इस्राएल को अपनी निज सम्पत्ति कहते हैं, इससे पहले कि वे एक भी आज्ञा मानें। दोनों जगह क्रम वही है: पहले चुनाव, फिर बुलाहट का जीवन। यह पत्र आगे उसी क्रम को खोलता है, जब वह कहता है कि उसने हमें चुना "कि हम उसकी दृष्टि में पवित्र और निर्दोष हों।" पवित्रता लक्ष्य है क्योंकि वह पहले से उपहार है।
श्रोता
इफिसुस के पाठक ऐसे शहर में रहते थे जो अपनी पहचान पर गर्व करता था: अर्तिमिस का विशाल मंदिर, दुनिया के अजूबों में गिना जाने वाला, और शहर की उपाधि कि वह देवी के मंदिर का रक्षक है। वहाँ व्यापारिक संघों की सदस्यता, मूर्तिपूजा के भोज और जादू-टोने की परंपरा जीवन में गुँथी हुई थी। ऐसे शहर में किसी को "पवित्र", यानी परमेश्वर के लिए अलग किया गया, कहना केवल धार्मिक भाषा नहीं थी, वह सामाजिक चुनौती थी। इसका मतलब था: तुम्हारी असली नागरिकता उस देवी के शहर में नहीं, उस मसीह में है जिसे रोम ने क्रूस पर चढ़ाया था। और "प्रेरित" शब्द उनके कानों में राजदूत जैसा गूँजता था, वह व्यक्ति जो भेजनेवाले के पूरे अधिकार के साथ बोलता है। पौलुस के शब्द पौलुस से बड़े थे।
पृष्ठभूमि
पौलुस ने इफिसुस में लगभग तीन साल बिताए थे, इसलिए ये अजनबी नहीं थे। यह पत्र संभवतः उनकी कैद के दिनों में लिखा गया, यानी एक ऐसे आदमी की कलम से जो ज़ंजीरों में था और फिर भी स्वर्गीय स्थानों की बात कर रहा है। इफिसुस एशिया प्रांत का बड़ा बंदरगाह और प्रशासनिक केंद्र था, जहाँ पैसा, धर्म और राजनीति एक-दूसरे से बँधे थे। कलीसिया वहाँ कोई प्रभावशाली संस्था नहीं थी, बल्कि घरों में जुटने वाले छोटे समूह, जिनमें दास और व्यापारी दोनों बैठते थे। ऐसे लोगों को पत्र की पहली पंक्ति में ही बताया जाता है कि वे परमेश्वर की इच्छा से भेजे गए प्रेरित की चिट्ठी पढ़ रहे हैं, और वे स्वयं उसी इच्छा के फल हैं। छोटा समूह, विशाल दावा।
मनन
आप अपने बारे में सबसे पहले क्या बताते हैं, और वह बताता है कि आपकी पहचान असल में किस पर टिकी है?
अगर "पवित्र" आपकी उपलब्धि नहीं बल्कि परमेश्वर की ओर से दी गई स्थिति है, तो इससे आपके अपराधबोध और आपके गर्व, दोनों में क्या बदलना चाहिए?
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इफिसियों 1:1 का क्या अर्थ है?
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इफिसियों 1:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इफिसियों 1:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Ephesians 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
अपनी इच्छा की सुमति के अनुसार हमें अपने लिए पहले से ठहराया कि यीशु मसीह के द्वारा हम उसके लेपालक पुत्र हों।"
गोद लेना कभी दुर्घटना से नहीं होता। बच्चा जन्म से मिल जाता है, पर गोद लिया बेटा चुना जाता है, कागज़ पर नाम लिखा जाता है, कीमत चुकाई जाती है। परमेश्वर ने तुम्हें मजबूरी में नहीं, खुशी से चुना। तुम उसकी योजना में बाद में जोड़े गए नाम नहीं हो।
पिता, मुझे बुद्धि और समझ की वह आत्मा दीजिए जिससे मैं आपको सच में जान सकूँ। मेरा मन अक्सर उलझा रहता है, पर आप अपने आप को मुझ पर प्रकट करते रहिए। मैं आपके बारे में सिर्फ सुनना नहीं, आपको पहचानना चाहता हूँ।
कि हम जो पहले से मसीह में आशा रखते आए हैं, उसकी महिमा की स्तुति का कारण हों।"
ध्यान दे, पौलुस यह नहीं कहता कि हम स्तुति करें, बल्कि यह कि हम स्तुति का कारण बनें। तेरा जीवन एक वजह है जिससे कोई और परमेश्वर की बड़ाई करे। आज किसी ने तुझे देखकर उसकी महिमा की? यही तो तेरे बचाए जाने का मकसद है।
पिता, धन्यवाद कि आपने मसीह को कलीसिया का सिर ठहराया और हमें उसकी देह में जोड़ा। धन्यवाद कि हम अकेले नहीं, बल्कि उसी की परिपूर्णता में सम्मिलित हैं, जो सब में सब कुछ पूर्ण करता है। जहाँ हम अधूरे हैं, वहाँ वही हमें भरता है।
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