इफिसियों 3:20
पाठ
पौलुस की प्रार्थना अचानक प्रार्थना होना बंद कर देती है और स्तुति में बदल जाती है। वह जिस परमेश्वर से अभी-अभी माँग रहा था, उसी के बारे में कहता है कि वे "हमारी विनती और समझ से कहीं अधिक काम कर सकते हैं" और यह सब उसी सामर्थ्य के अनुसार होता है "जो हम में कार्य करता है।" फिर वह महिमा को कलीसिया और मसीह यीशु में, पीढ़ी से पीढ़ी तक ठहरा देता है।
हृदय-मर्म
ध्यान दीजिए कि माप कहाँ से शुरू होता है। पौलुस यह नहीं कहता कि परमेश्वर बहुत कुछ कर सकते हैं; वह कहता है कि वे हमारी माँग से अधिक, और हमारी कल्पना से भी अधिक कर सकते हैं। हमारी प्रार्थना की छत परमेश्वर की छत नहीं है। पर यहीं एक धार भी है: यह "अधिक" खाली चेक नहीं है जिस पर हम अपनी इच्छा लिख दें। पिछली आयतें बता चुकी हैं कि पौलुस क्या माँग रहा था, भीतरी मनुष्यत्व में सामर्थ्य, हृदय में मसीह का बसना, प्रेम में जड़ें, "परमेश्वर की सारी भरपूरी।" परमेश्वर इससे अधिक करते हैं, इससे कम नहीं, और इससे अलग भी नहीं। उनका "अधिक" हमारी सूची का विस्तार नहीं, उनके अपने उद्देश्य की गहराई है।
मुख्य सूत्र
यह आयत हवा में नहीं लटकी। इसी पत्री के पहले अध्याय में पौलुस उसी सामर्थ्य की बात करता है जिसने मसीह को मरे हुओं में से जिलाया और स्वर्गीय स्थानों में बैठाया। वही सामर्थ्य अब "हम में कार्य करता है।" यानी जिस शक्ति का सबसे बड़ा प्रदर्शन कब्र के पत्थर पर हुआ, वही शक्ति अब एक डरे हुए विश्वासी के भीतर चुपचाप काम कर रही है। और आयत 21 महिमा को "कलीसिया में, और मसीह यीशु में" ठहराती है, पीढ़ी से पीढ़ी तक। यह अब्राहम से की गई प्रतिज्ञा की भाषा है: तेरे वंश में सब जातियाँ आशीष पाएँगी। जो अन्यजाति इस पत्री को सुन रही थी, वह स्वयं उस "अधिक" का जीवित प्रमाण थी जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी।
दर्पण
हममें से अधिकतर लोग दो तरह से प्रार्थना करते हैं। या तो हम छोटा माँगते हैं क्योंकि हमें निराश होने से डर लगता है, बीमार माँ के लिए बस "थोड़ी राहत", भटकते बेटे के लिए बस "कोई फोन आ जाए"; या हम बड़ा माँगते हैं और फिर इस आयत को लॉटरी के टिकट की तरह पकड़ लेते हैं, जैसे परमेश्वर हमारी महत्वाकांक्षा के ठेकेदार हों। पौलुस दोनों को तोड़ता है। वह कहता है: तुम्हारी सबसे बड़ी माँग भी छोटी है, पर जो अधिक मिलेगा वह शायद नौकरी नहीं, भीतर की वह मजबूती होगी जिससे तुम बिना नौकरी के भी खड़े रह सको। यह सुनने में कम लग सकता है। कुछ समय बाद पता चलता है कि यही अधिक था।
आज यह कीजिए: जिस एक प्रार्थना को आप वर्षों से दोहरा रहे हैं, उसे कागज़ पर एक वाक्य में लिखिए। उसके नीचे दूसरा वाक्य लिखिए: "और इसी हालात में मुझे भीतरी मनुष्यत्व में बलवन्त कीजिए, प्रेम में जड़ पकड़ने दीजिए।" फिर दोनों वाक्य ऊँची आवाज़ में पढ़कर प्रार्थना कर दीजिए।
अन्तर्पाठ
यह आयत कई पुरानी आवाज़ों को जगाती है। उत्पत्ति 18 में सारा तंबू के पीछे हँसती है, क्योंकि उसकी "समझ" से बच्चा असंभव था, और परमेश्वर पूछते हैं कि क्या उनके लिए कुछ भी कठिन है। वहाँ "समझ से अधिक" एक बूढ़ी देह में जन्मा था। रोमियों 11 में भी पौलुस ठीक इसी क्रम से चलता है: पहले यहूदी और अन्यजाति का भेद खोलता है, फिर अचानक स्तुति में फूट पड़ता है कि परमेश्वर का ज्ञान कितना अथाह है। भेद समझाया नहीं जा सकता, उसकी स्तुति की जा सकती है। यहाँ भी वही हुआ है।
पर ईमानदारी से एक तनाव भी देखिए। याकूब लिखता है कि लोग माँगकर भी नहीं पाते क्योंकि वे बुरी इच्छा से माँगते हैं। और स्वयं पौलुस ने तीन बार अपने शरीर के काँटे के लिए प्रार्थना की और उत्तर मिला: नहीं, मेरा अनुग्रह तेरे लिए बहुत है। वही व्यक्ति जो यहाँ "कहीं अधिक" लिखता है, वहाँ "नहीं" सुन चुका था। इसका अर्थ यह है कि यह आयत उस आदमी की कलम से निकली है जिसकी अपनी प्रार्थना अस्वीकार हुई थी, और जो फिर भी स्तुति करता है, क्योंकि उसने देखा कि इनकार के भीतर भी वही सामर्थ्य काम कर रही थी।
पहचान
जो लोग यह पत्री सुन रहे थे, वे किसी भव्य इमारत में नहीं बैठे थे। वे छोटे घरों में इकट्ठा अन्यजाति विश्वासी थे, जिनके पड़ोस में मंदिर, तंत्र-मंत्र और सम्राट की मूर्तियाँ थीं। पौलुस ने अभी-अभी उन्हें "प्रधानों और अधिकारियों" की याद दिलाई है और यह भी कि वह स्वयं बंदी है, जंजीरों में। ऐसे लोगों के लिए यह स्तुति अहंकार नहीं, विद्रोह थी। जिस दुनिया में सामर्थ्य का अर्थ सेना, पैसा और जादू था, वहाँ कहा जा रहा था कि असली सामर्थ्य इन कुछ बुनकरों और दासों के भीतर काम कर रही है, और महिमा रोम में नहीं, कलीसिया में, युगानुयुग ठहरेगी।
बारीकी
"कहीं अधिक" के पीछे यूनानी में एक लगभग तुतलाता हुआ शब्द है, hyperekperissou, जिसमें "ऊपर" और "बाहर" और "अत्यधिक" तीनों ठूँसे गए हैं, मानो भाषा स्वयं हाँफ रही हो। पर असली बारीकी उसके बाद है: "उस सामर्थ्य के अनुसार जो हम में कार्य करता है।" पौलुस यह नहीं कहता कि परमेश्वर की सामर्थ्य स्वर्ग में कहीं रखी है और ज़रूरत पड़ने पर भेजी जाएगी। क्रिया वर्तमान काल में है, लगातार चलती हुई। माप का फीता बाहर से भीतर की ओर मुड़ जाता है। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि परमेश्वर कितना कर सकते हैं, बल्कि यह कि जो काम आपके भीतर पहले से चल रहा है, आप उसे पहचान पा रहे हैं या नहीं।
चिंतन
आपकी प्रार्थनाओं की सूची देखिए: क्या वे इसलिए छोटी हैं कि आप विनम्र हैं, या इसलिए कि आप निराश होने से डरते हैं?
पौलुस का "नहीं" सुनना और यह स्तुति लिखना, दोनों एक ही जीवन में समाए हैं। आपके किस अनुत्तरित "नहीं" के भीतर परमेश्वर शायद कुछ और ही कर रहे थे?
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Ephesians 3:20 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
इफिसियों 3:20 का क्या अर्थ है?
इफिसियों 3:20 किस विषय में है?
इफिसियों 3:20 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इफिसियों 3:20 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इफिसियों 3:20 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Ephesians 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
इसी कारण मैं उस पिता के सामने घुटने टेकता हूँ," पौलुस यह जंजीरों में लिखता है। कैदखाने से वह न शिकायत करता है, न बहस। वह घुटने टेकता है। उस समय लोग अक्सर खड़े होकर प्रार्थना करते थे, घुटने टेकना गहरे बोझ की निशानी था। तेरे मन का बोझ आज कहाँ जा रहा है? पिता के सामने झुकना कमजोरी नहीं, वही सबसे सही जगह है।
पिता, मैं जानता हूँ कि जो कुछ भी मेरे हाथों से होता है, वह मेरी योग्यता से नहीं, आपके मुफ्त दिए हुए अनुग्रह से होता है। मुझे अपनी सामर्थ्य से भर दीजिए, ताकि मैं डर और झिझक छोड़कर आपके लोगों की सेवा कर सकूँ।
पिता, मेरे मन में आकर बस जा, वहीं रह जहाँ मैं किसी को नहीं आने देता। मेरी जड़ें तेरे प्रेम में गहरी कर दे, ताकि जब सब कुछ हिले, मैं टिका रहूँ। विश्वास कमज़ोर पड़े तो तू थाम लेना।
जिससे स्वर्ग और पृथ्वी पर, हर एक घराने का नाम रखा जाता है।" पौलुस घुटनों पर है, और जिस पिता के सामने झुका है, उसी से हर परिवार को उसका नाम मिला है। तेरा घर टूटा हो, तेरा उपनाम तुझे चुभता हो, या तू अकेला महसूस करता हो, फिर भी तेरी पहचान किसी इंसान के रजिस्टर में नहीं, पिता के मुँह से निकली है। वह तुझे नाम लेकर जानता है।
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