रोमियों 11
पाठ
पौलुस एक जलते हुए प्रश्न से शुरू करता है: क्या परमेश्वर ने अपनी प्रजा को त्याग दिया? उसका उत्तर है, कदापि नहीं। एलिय्याह के दिनों की तरह आज भी अनुग्रह से चुना हुआ एक शेष बाकी है। इस्राएल का ठोकर खाना अन्यजातियों के उद्धार का द्वार बना, पर यह अंत नहीं है, क्योंकि जड़ अभी भी पवित्र है, और परमेश्वर टूटी हुई डालियों को पुनः साट सकता है। अंत में पौलुस उस अगाध बुद्धि के आगे झुक जाता है जो सब को अवज्ञा में बन्द करके सब पर दया करती है।
मूल बात
यह अध्याय परमेश्वर की विश्वासयोग्यता के बारे में है, तब भी जब उसकी प्रजा विश्वासघाती हो। पौलुस यहाँ केवल इस्राएल का बचाव नहीं कर रहा, वह परमेश्वर के चरित्र का बचाव कर रहा है। यदि परमेश्वर अपनी पहली प्रतिज्ञाओं से पलट सकता है, तो अन्यजाति विश्वासी भी किस आधार पर सुरक्षित हैं? इसलिए पद 29 पूरे अध्याय की धुरी है: "परमेश्वर अपने वरदानों से, और बुलाहट से कभी पीछे नहीं हटता।" अनुग्रह की परिभाषा यहीं तेज होती है, पद 6 में, कि यदि यह कर्मों से है तो अनुग्रह अनुग्रह नहीं रहा। परमेश्वर का चुनाव मानवीय योग्यता पर नहीं, उसकी अपनी स्वतंत्र दया पर टिका है।
सूत्र
यह अध्याय पूरे बाइबल के "शेष" (remnant) सूत्र को उठाता है। नूह का परिवार, यूसुफ के द्वारा बचाया गया इस्राएल, एलिय्याह के सात हजार, बन्धुआई से लौटा हुआ शेष, ये सब उस पैटर्न को बनाते हैं जिसमें परमेश्वर हमेशा एक बीज छोड़ता है। मसीह स्वयं वह सच्चा शेष है, वह एक इस्राएली जिसने पूर्ण विश्वास किया, और उसी में एक नया शेष जन्मता है। जैतून के वृक्ष की छवि गहरी है: जड़ अब्राहम की प्रतिज्ञाएँ हैं, और मसीह वह रस है जो जंगली डालियों तक बहता है। अन्यजाति विश्वासी कोई नया वृक्ष नहीं हैं, वे इस्राएल की जड़ में साटे गए हैं।
दर्पण
पद 18 सीधे हमारे चेहरे पर आकर टकराता है: "डालियों पर घमण्ड न करना।" कलीसिया के इतिहास में यह चेतावनी कितनी बार अनसुनी हुई है। हमने यहूदियों को भुला दिया, कभी सताया भी, यह भूलकर कि हम मेहमान हैं, मेज़बान नहीं। पर यह घमण्ड केवल यहूदी विरोधी भावना तक सीमित नहीं है। जब भी आप सोचते हैं कि आप कलीसिया में हैं क्योंकि आप अधिक बुद्धिमान, अधिक नैतिक, या अधिक आत्मिक हैं, यही वही घमण्ड है। पद 20 का "भय मान" उन लोगों के लिए है जो अनुग्रह को अधिकार समझने लगे हैं। अपने पड़ोसी के अविश्वास को देखकर सिर हिलाना आसान है; यह भूल जाना कि आप स्वयं जंगली जैतून थे, बहुत आसान है।
पृष्ठभूमि
रोम की कलीसिया मिश्रित थी, यहूदी और अन्यजाति विश्वासी एक साथ। सम्राट क्लौदियुस ने कुछ वर्ष पहले यहूदियों को रोम से निकाल दिया था, और जब वे लौटे तो पाया कि अन्यजातियों का बहुमत हो चुका है। तनाव स्वाभाविक था: अन्यजाति विश्वासी सोचने लगे थे कि यहूदी अब पिछड़ चुके हैं, कि परमेश्वर ने उन्हें छोड़ दिया है। पौलुस, जो स्वयं "बिन्यामीन के गोत्र में से" है, इस अहंकार को जड़ से काटता है। मूल पाठकों ने यह अध्याय एक चेतावनी के रूप में सुना होगा, न कि केवल एक धर्मशास्त्रीय व्याख्यान। जैतून का वृक्ष उनके लिए दैनिक जीवन की छवि थी, और साटने की कला वे जानते थे।
प्रश्न
पद 32 चौंकाता है: "परमेश्वर ने सब को आज्ञा न मानने के कारण बन्द कर रखा है ताकि वह सब पर दया करे।" क्या परमेश्वर ने जानबूझकर लोगों को कठोर किया ताकि वह उन पर दया कर सके? पद 8 और भी कठोर है, कि उसने "मंदता की आत्मा" दी। यहाँ हम एक ऐसे रहस्य के सामने खड़े हैं जिसे चिकना करना बेईमानी होगी। पौलुस स्वयं इसे नहीं सुलझाता; वह पद 33 में विस्मय में झुक जाता है। हमें यह मानना होगा कि परमेश्वर की संप्रभुता और मानवीय ज़िम्मेदारी दोनों सच हैं, भले ही हम उन्हें जोड़ न सकें। "पूर्ण-सार्वभौमिकवाद" का सस्ता उत्तर, कि अंततः सब बच जाएँगे, पद 22 की "कड़ाई" को अनदेखा करता है। रहस्य को रहस्य रहने दें।
अंतर्पाठ
पौलुस इस अध्याय को पुराने नियम के हवालों से बुनता है। एलिय्याह की गुफा की कहानी (1 राजा 19) दिखाती है कि जब भविष्यद्वक्ता को लगा वह अकेला है, परमेश्वर के पास पहले से सात हजार थे। यह उन क्षणों में सांत्वना है जब कलीसिया मरती हुई लगती है। यशायाह 6 की "आँखें जो न देखें" वही शाप है जो यीशु ने दृष्टान्तों के बारे में उद्धृत किया (मत्ती 13), दिखाते हुए कि यह पैटर्न मसीह में भी दोहराया गया। जैतून के वृक्ष के पीछे यिर्मयाह 11:16 है, जहाँ इस्राएल को "हरा जैतून" कहा गया है जिसे परमेश्वर ने लगाया। और पद 26-27 में यशायाह का उद्धरण, "छुड़ानेवाला सिय्योन से आएगा," हमें याद दिलाता है कि मसीह का दूसरा आगमन इस्राएल के लिए भी उद्धार का क्षण है। सबसे मार्मिक: पद
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Romans 11 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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रोमियों 11 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
रोमियों 11 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
रोमियों 11 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Romans 11 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
एलिय्याह की शिकायत सुनिए: "हे प्रभु, उन्होंने तेरे भविष्यद्वक्ताओं को मार डाला और तेरी वेदियों को ढा दिया है; और मैं ही अकेला बच गया हूँ, और वे मेरे प्राण के भी खोजी हैं।" वह गिन रहा था, और गिनती में सिर्फ़ खुद को पाया। पर परमेश्वर के पास दूसरी गिनती थी, सात हज़ार। आपका अकेलापन सच्चा दर्द है, मगर पूरा सच नहीं।
पिता, मुझे याद दिला कि मैं तेरी दया से ही इस पेड़ में जुड़ा हूँ, अपनी योग्यता से नहीं। मेरे मन का घमंड तोड़ दे और डर के बजाय आदर से भरा भरोसा दे। मुझे नम्र रख, ताकि मैं तेरी भलाई को हल्के में न लूँ।
धन्यवाद पिता, कि आप फिर से लगा सकते हैं। जो डाली टूट गई, उसे भी आप कलम की तरह वापस जोड़ देते हैं। इसलिए जो अभी अविश्वास में हैं, उनके लिए भी आशा बाकी है। आपकी सामर्थ्य हमारी टूटन से बड़ी है, इसके लिए मेरा हृदय आपका आभारी है।
जंगली जैतून की डाली को अच्छे पेड़ में लगाना, यह प्रकृति के विरुद्ध है। माली ऐसा नहीं करते। पर परमेश्वर ने तेरे साथ यही किया। तू जो दूर था, पराया था, उसे उसने अपने पवित्र पेड़ में जोड़ लिया।
जब कभी लगे कि तू यहाँ का नहीं है, याद रखना, तेरा जुड़ना उसकी कृपा का चमत्कार है, तेरी योग्यता का इनाम नहीं।
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