इफिसियों 5
पाठ
पौलुस विश्वासियों को बुलाता है कि वे "प्रिय बच्चों के समान" परमेश्वर का अनुसरण करें और प्रेम में चलें, जैसे मसीह ने स्वयं को हमारे लिए सुगन्धित बलिदान के रूप में अर्पित किया। फिर वह अंधकार और ज्योति के विरोध को खोलता है, पवित्र आत्मा से भरे जीवन का चित्र खींचता है, और अंत में विवाह को मसीह और कलीसिया के रहस्य के रूप में प्रस्तुत करता है।
मर्म
इस अध्याय का हृदय एक शब्द में है: "अनुसरण।" परमेश्वर का अनुकरण, जैसे बच्चे अपने पिता की चाल की नकल करते हैं, अनजाने में, प्रेम से। यह नैतिक सूची नहीं है जिसे पूरा करना है; यह पहचान है जिसमें से जीना है। "तुम तो पहले अंधकार थे परन्तु अब प्रभु में ज्योति हो।" ध्यान दीजिए, पौलुस यह नहीं कहता कि तुम ज्योति में हो, बल्कि तुम ज्योति हो। यह सत्ता का बयान है, आदेश नहीं। और यहीं से नैतिकता निकलती है, न कि उलटे क्रम से। हम पवित्र इसलिए जीते हैं क्योंकि हम पवित्र किए गए हैं, और मसीह की सुगन्ध हमारे भीतर बस चुकी है।
सूत्र
पूरे अध्याय में एक ही सूत्र दौड़ता है: मसीह का आत्म-समर्पण। पद 2 में वह "अपने आपको भेंट करके बलिदान कर देता है।" पद 25 में वह "अपने आपको उसके लिये दे देता है।" बीच में जो कुछ है, ज्योति में चलना, आत्मा से भरना, धन्यवाद देना, यह उसी आत्म-दान का प्रतिबिंब है। पुराने नियम के होमबलि की "सुखदायक सुगन्ध" (उत्पत्ति और लैव्यव्यवस्था की भाषा) अब मसीह में पूर्ण हुई है, और वही सुगन्ध कलीसिया के जीवन से उठनी है। विवाह भी इसी सूत्र में बुना गया है: यह केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं, बल्कि उस "बड़े भेद" का जीवित चिह्न है, जो सृष्टि की शुरुआत से ही मसीह और उसकी दुल्हन की ओर इशारा कर रहा था।
दर्पण
यह अध्याय हमें असहज करता है, और अच्छा है कि करता है। पद 4 में पौलुस "मूर्खता की बातचीत" और "उपहास" का जिक्र करता है, वे बातें जो हम अक्सर हल्की समझते हैं। कार्यस्थल की गपशप, व्हाट्सएप पर घूमते चुटकुले, दूसरों की कीमत पर हँसी, ये सब यहाँ नाम से पुकारे गए हैं। और लोभ? पौलुस इसे मूर्तिपूजा कहता है। आपके बैंक खाते की चिंता, अगली पदोन्नति की भूख, पड़ोसी की गाड़ी पर टिकी निगाह, ये केवल आर्थिक मामले नहीं, आराधना के मामले हैं। फिर पद 16: "अवसर को बहुमूल्य समझो, क्योंकि दिन बुरे हैं।" आपका समय कहाँ रिस रहा है? स्क्रीन पर, चिंता में, या उन रिश्तों में जो आत्मा को भरते हैं?
मुख्य पात्र
यहाँ मसीह ही केंद्र में है, पर एक विशेष रूप में: वह प्रेमी के रूप में। पद 25 से 27 में उसका चित्र कोमल है, और साथ ही गहरा। वह कलीसिया से इसलिए प्रेम नहीं करता क्योंकि वह सुंदर है; वह उसे सुंदर बनाने के लिए प्रेम करता है, "न कलंक, न झुर्री" वाली। यह प्रेम की उलटी दिशा है। मनुष्य आमतौर पर उसी से प्रेम करता है जो पहले से आकर्षक हो; मसीह प्रेम से आकर्षण उत्पन्न करता है। और वह कैसे शुद्ध करता है? "वचन के द्वारा जल के स्नान से।" उसका तरीका हिंसक नहीं, बल्कि धीमा और नहलाने वाला है, शब्द दर शब्द, दिन दर दिन। जो पति इस मसीह को देखते हैं, उनके पास प्रेम करने का एक नया मापदंड है, और जो पत्नियाँ इस कलीसिया को देखती हैं, उनके पास अधीनता का एक नया अर्थ।
विवरण
पद 14 पर रुकिए: "हे सोनेवाले जाग और मुर्दों में से जी उठ; तो मसीह की ज्योति तुझ पर चमकेगी।" यह पंक्ति अजीब है। पौलुस कहता है "वह कहता है," पर कौन कहता है? यह संभवतः प्रारंभिक कलीसिया का बपतिस्मा-गीत था, एक ऐसी पुकार जो नए विश्वासी पर गाई जाती थी जब वह पानी से बाहर आता था। सोचिए इसका भार: नींद, मृत्यु, और फिर प्रकाश। पौलुस मानता है कि विश्वासी भी सो सकते हैं, आत्मिक रूप से बेहोश हो सकते हैं। यह आवाहन कठोर नहीं, पुकारने वाली है। कोई हमें नाम से बुला रहा है। और वादा यह नहीं कि हमें ज्योति खोजनी है, बल्कि यह कि जागते ही ज्योति स्वयं हम पर चमकेगी। कृपा पहले, हमारा उठना बाद में।
प्रश्न
पद 22 से 33 आज के पाठक के गले में अटकते हैं। "पत्नियाँ अपने पति के अधीन रहें", यह वाक्य सदियों से दुरुपयोग हुआ है, और उस दर्द को हल्के में नहीं लेना चाहिए। पर क्या पौलुस वास्तव में एकतरफा शक्ति की बात कर रहा है? उसने पद 21 में पहले ही कहा था: "एक दूसरे के अधीन रहो।" और पति को जो आज्ञा मिली, वह अधिकार जताने की नहीं, मरने की है, "जैसा मसीह ने…अपने आपको उसके लिये दे दिया।" फिर भी, प्रश्न बना रहता है: क्यों यह असममित भाषा? क्यों "सिर" का रूपक? यहाँ मैं सरल उत्तर नहीं दूँगा। पौलुस स्वयं कहता है, "यह भेद तो बड़ा है।" शायद हमें इस रहस्य के सामने कुछ देर मौन बैठना है, इससे पहले कि हम इसे अपनी संस्कृति के सांचे में, चाहे पितृसत्तात्मक हो या समतावादी, ढालने की जल्दी करें। मसीह
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Ephesians 5 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Ephesians 5 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
जिसमें न कलंक, न झुर्री, न कोई ऐसी ही और बात हो" (इफिसियों 5:27)। ध्यान दे, मसीह ने कलीसिया को पहले से बेदाग पाकर नहीं चुना। उसने उसे धोया, और तब सुंदर बनाया। तेरे वे दाग जिन्हें तू छिपाता है, वही उसके हाथों का काम बनने वाले हैं। वह तुझे तेरी सफाई के बाद नहीं, तेरी गंदगी के बीच प्रेम करता है।
पौलुस सिर्फ यह नहीं कहता कि गंदी बात बंद करो। वह बदले में कुछ थमा देता है, "वरन् धन्यवाद ही सुना जाए।" गौर करो, ठट्ठे की उलटी चीज़ चुप्पी नहीं, धन्यवाद है। जो हँसी दूसरे को छोटा करके मज़ा लेती है, वह भूल चुकी है कि उसके पास जो कुछ है सब अनुग्रह से मिला है। आज तुम्हारी बातचीत में कौन सा स्वाद ज़्यादा घुला है?
पिता, आपकी रोशनी मेरे भीतर काम करे, ताकि मेरे जीवन से भलाई, सच्चाई और सही राह निकले। कई बार मैं छिपकर जीना चाहता हूँ, पर आप जानते हैं मैं कैसा हूँ। मुझे उजाले में चलना सिखाइए, थोड़ा थोड़ा करके ही सही।
और यह परखते रहो कि प्रभु को क्या भाता है।" ध्यान दो, पौलुस यह नहीं कहता कि जाँचो क्या जायज़ है। वह पूछता है, प्रभु को क्या भाता है। ये दो बहुत अलग सवाल हैं। पहला नियम का सवाल है, दूसरा प्रेम का। जो बच्चा पिता से डरता है, वह पूछता है कि कितनी दूर तक जा सकता हूँ। जो पिता से प्रेम करता है, वह पूछता है कि आपको क्या अच्छा लगेगा। आज तुम कौन सा सवाल पूछ रहे हो?
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