निर्गमन 20:8
पाठ
आठवीं आयत में एक अजीब सी क्रिया आती है: "स्मरण रखना।" परमेश्वर यह नहीं कहते कि विश्रामदिन बनाओ, या विश्रामदिन शुरू करो, बल्कि कहते हैं कि उसे याद रखो, जैसे वह पहले से मौजूद है और तुम उसे भूल बैठे हो। और याद रखने का उद्देश्य भी बताया गया है: "पवित्र मानने के लिये।" यानी एक दिन को बाकी दिनों से अलग करना, उसे परमेश्वर के लिये चिह्नित करना। अगली दो आयतें इसे खोलती हैं: छः दिन तेरा काम-काज, सातवाँ दिन "तेरे परमेश्वर यहोवा के लिये", और उस दिन तेरे बेटे-बेटी, दास-दासी, पशु और फाटक के भीतर के परदेशी तक काम से मुक्त। आज्ञा एक व्यक्ति को नहीं, पूरे घराने और उसके पूरे श्रम-तंत्र को छूती है।
मूल
यह आज्ञा हमारे बारे में एक बात मान कर चलती है: हम काम को छोड़ना नहीं जानते। मिस्र से निकले लोगों ने चार सौ साल ऐसी व्यवस्था में जीया था जहाँ मनुष्य का मूल्य उसके उत्पादन से तय होता था; ईंटें गिनी जाती थीं, आदमी नहीं। विश्रामदिन उस तर्क पर सीधा प्रहार है। यह घोषणा करता है कि सृष्टि परमेश्वर के हाथ में है, न कि तेरी मेहनत के हाथ में, और इसलिये तू एक दिन हाथ रोक सकता है और दुनिया ढह नहीं जाएगी। यहाँ अनुग्रह आज्ञा का रूप ले लेता है। और ध्यान दें, यह पवित्रता किसी मंदिर या पर्वत से नहीं, समय से शुरू होती है: परमेश्वर पहले एक दिन को अपने लिये अलग करते हैं, फिर धीरे-धीरे स्थान, बलिदान और लोग अलग किये जाते हैं। जो समय पर अधिकार रखता है, वही जीवन पर अधिकार रखता है।
सूत्र
विश्राम की यह आज्ञा सृष्टि के सातवें दिन से जुड़ी है, जैसा आयत 11 खुद कहती है: परमेश्वर ने "सातवें दिन विश्राम किया; इस कारण यहोवा ने विश्रामदिन को आशीष दी और उसको पवित्र ठहराया।" यानी यह नियम सीनै पर्वत पर पैदा नहीं हुआ, वह सृष्टि की बुनावट में पहले से गुँथा था। और यह सूत्र यीशु मसीह तक खिंचता है। जब उन्होंने कहा कि विश्रामदिन मनुष्य के लिये बनाया गया, न कि मनुष्य विश्रामदिन के लिये, तो वे इस आज्ञा को हल्का नहीं कर रहे थे, वे उसकी असली दिशा बता रहे थे। जिस विश्राम की ओर यह दिन इशारा करता है, वह अंततः एक दिन नहीं बल्कि एक व्यक्ति है: वही जो थके हुओं को अपने पास बुलाता है। मिस्र से छुड़ाया गया शरीर एक दिन विश्राम करता है; मसीह में छुड़ाया गया मन हर दिन साँस लेना सीखता है।
दर्पण
यह आज्ञा आपके कैलेंडर को नहीं, आपके भरोसे को टटोलती है। रविवार की दोपहर जब आप "बस दस मिनट" के लिये ईमेल खोलते हैं, तो सवाल आलस्य का नहीं, डर का है: अगर मैं रुक गया तो पीछे रह जाऊँगा। जिस परिवार में हर शाम पढ़ाई, कोचिंग और लक्ष्य से भरी हो, वहाँ बच्चे यह सीखते हैं कि उनका मूल्य उनके प्रदर्शन से तय होता है, ठीक वैसे ही जैसे मिस्र में ईंटें गिनी जाती थीं। और आयत 10 और भी चुभती है: विश्राम सिर्फ आपका नहीं, आपके दास-दासी और आपके फाटक के भीतर के परदेशी का भी अधिकार है। जो लोग आपके आराम को संभव बनाते हैं, घर में काम करने वाली महिला, डिलीवरी करने वाला लड़का, आपकी दुकान का कर्मचारी, क्या वे भी रुक पाते हैं? पवित्रता यहाँ बहुत ठोस है।
आज ही, दस मिनट में: जो व्यक्ति आपके लिये काम करता है, उसे फोन करके या संदेश भेजकर इस सप्ताह का एक पूरा दिन बिना वेतन कटे छुट्टी दे दीजिए, और उसे बता दीजिए कि यह छुट्टी क्यों है।
बारीकी
"स्मरण रखना" के लिये मूल इब्रानी शब्द है ज़ाखोर, और यह केवल दिमाग में कुछ रखने का शब्द नहीं है। इब्रानी में स्मरण करना लगभग हमेशा कुछ करना होता है: परमेश्वर वाचा को "स्मरण" करते हैं और छुड़ाते हैं। तो यह आज्ञा यह नहीं कहती कि सप्ताह में एक बार आपको ध्यान आ जाए कि आज रविवार है। वह कहती है: उस दिन को अपने हाथों से, अपने खाने से, अपने बंद लैपटॉप से, अपने बच्चों के साथ बिताए समय से बनाओ। और यह भी ध्यान दें कि "स्मरण" शब्द मानता है कि कुछ भुलाया जा चुका है। गुलामी में वे सातवें दिन को भूल गए थे, क्योंकि गुलामों का कोई सातवाँ दिन नहीं होता। स्वतंत्रता का पहला काम याद करना है।
श्रोता
कल्पना कीजिए कि आप उस भीड़ में खड़े हैं जो आयत 18 के अनुसार गरजने और धुएँ को देखकर काँपकर दूर हट गई थी। आप पीढ़ियों से गुलाम रहे हैं। आपके पास अनाज का कोई सुरक्षित भंडार नहीं, कोई बैंक खाता नहीं, और जीवन खेती और पशुओं की रोज़ की मेहनत पर टिका है। और अब यह आवाज़ कहती है कि हर सातवें दिन आप कुछ नहीं करेंगे। आसपास की कोई भी जाति ऐसा नहीं करती थी; कोई साप्ताहिक छुट्टी का दिन नहीं था। बाद में रोमी इस पर हँसते थे कि यहूदी सप्ताह का सातवाँ हिस्सा आलस्य में गँवा देते हैं। पहले सुनने वालों के लिये यह आज्ञा नियम कम और जोखिम अधिक थी: क्या परमेश्वर सचमुच छः दिन की मेहनत में सात दिन की रोटी देंगे? मन्ना पहले ही उत्तर दे चुका था।
मुख्य पात्र
इस आयत के पीछे वह परमेश्वर खड़े हैं जो विश्राम करते हैं। यह चौंकाने वाली बात है। आसपास के देवता भूखे, माँग करने वाले, इंसानी श्रम पर निर्भर देवता थे; मनुष्य उन्हें खिलाने के लिये बनाया गया था। परन्तु यहोवा को किसी की मेहनत की ज़रूरत नहीं। वे सृष्टि पूरी करते हैं, रुकते हैं, और उस रुकने को आशीष देते हैं। यही परमेश्वर आयत 2 में अपना परिचय एक छुड़ाने वाले के रूप में देते हैं, न कि एक मालिक के रूप में। इसलिये विश्रामदिन उनका स्वभाव है, कोई मनमानी शर्त नहीं। वे चाहते हैं कि उनके लोग उन्हें केवल सेवा करके नहीं, बल्कि उनके साथ बैठकर, खाकर, साँस लेकर जानें। एक ऐसा परमेश्वर जो अपनी संतान को थकाना नहीं, बल्कि ठहराना चाहता है।
चिंतन
आपके भीतर वह कौन सा डर है जो आपको एक पूरा दिन रुकने नहीं देता, और वह डर परमेश्वर के बारे में क्या मानता है?
आपके घर, दफ़्तर या फाटक के भीतर कौन है जिसका विश्राम आपके निर्णय पर टिका है?
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Exodus 20:8 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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निर्गमन 20:8 का क्या अर्थ है?
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निर्गमन 20:8 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
निर्गमन 20:8 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Exodus 20 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
तू किसी के विरुद्ध झूठी साक्षी न देना।" यह आज्ञा अदालत की भाषा में दी गई थी, जहाँ एक झूठे शब्द से किसी का जीवन छिन सकता था। आज वह अदालत तुम्हारे फोन में बैठी है। बिना पूरी बात जाने जो संदेश तुमने आगे भेजा, जो अधूरा सच तुमने कहा, उससे किसी का नाम मरा। सोचो, कल किसके बारे में तुम चुप रह सकते थे?
छ: दिन तो तू परिश्रम करके अपना सब काम-काज करना।" ध्यान दे, आज्ञा केवल विश्राम की नहीं, परिश्रम की भी है। परमेश्वर तेरे सोमवार को भी उतनी ही गंभीरता से देखता है जितना सब्त को। और "सब काम-काज" कहकर वह तुझसे कहता है, अपना काम पूरा कर, ताकि सातवें दिन तू उसे मन में ढोता न फिरे। थका नहीं, हल्का होकर उसके सामने आ।
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