निर्गमन 6
पाठ
अध्याय की शुरुआत एक ऐसे वाक्य से होती है जो मूसा की शिकायत का उत्तर नहीं, बल्कि उसे किनारे रख देना है: "अब तू देखेगा कि मैं फ़िरौन से क्या करूँगा।" इसके बाद परमेश्वर अपने नाम की घोषणा करते हैं, अब्राहम, इसहाक और याकूब के साथ बाँधी गई वाचा को स्मरण करते हैं, और इस्राएलियों के कराहने के जवाब में सात बार "मैं करूँगा" कहकर छुटकारे, अपनाने और देश देने का वादा करते हैं। परन्तु लोग सुनते नहीं, क्योंकि उनका मन बेचैन है और दासत्व क्रूर; मूसा दोबारा अपनी हकलाती जीभ का बहाना बनाता है। बीच में अचानक एक वंशावली आ खड़ी होती है, जो रूबेन से शुरू होकर लेवी पर ठहर जाती है और हारून तथा मूसा को नाम देकर इतिहास में गाड़ देती है।
मूल बात
यहाँ परमेश्वर अपने कामों से पहले अपने नाम पर ज़ोर देते हैं: "मैं यहोवा हूँ" इस अध्याय की धड़कन है, आरंभ में, बीच में और अंत में। छुटकारे की नींव इस्राएल की योग्यता, विश्वास या प्रतिक्रिया नहीं है; लोग तो सुनने से इनकार कर देते हैं, और फिर भी वादे वापस नहीं लिए जाते। यही अनुग्रह का असली आकार है: वाचा परमेश्वर की स्मृति में सुरक्षित है, हमारी हिम्मत में नहीं। ध्यान दीजिए कि "छुड़ा लूँगा" के पीछे इब्रानी शब्द गाअल है, यानी वह निकट संबंधी जो कर्ज़ में बिके भाई को अपने पैसे से वापस खरीदता है। परमेश्वर दूर से आदेश देने वाला सम्राट नहीं, बल्कि वह रिश्तेदार हैं जो दाम चुकाते हैं। और छुटकारे का लक्ष्य केवल आज़ादी नहीं, बल्कि संबंध है: "मैं तुम को अपनी प्रजा बनाने के लिये अपना लूँगा, और मैं तुम्हारा परमेश्वर ठहरूँगा।" मिस्र से निकलना साधन है; परमेश्वर के साथ रहना उद्देश्य।
सूत्र
सात बार "मैं करूँगा" कोई शैली नहीं, बल्कि छुटकारे का व्याकरण है: निकालूँगा, छुड़ाऊँगा, छुड़ा लूँगा, अपना लूँगा, ठहरूँगा, पहुँचाकर, भाग कर दूँगा। यह वही क्रम है जो पूरे बाइबल में दोहराया जाता है: बंधन से निकालना, दाम चुकाकर मोल लेना, अपनी प्रजा बनाना, और अंत में विरासत में पहुँचाना। यीशु मसीह जब अपने बारे में कहते हैं कि वे बहुतों की छुड़ौती के लिये अपना प्राण देने आए हैं (मरकुस 10:45), तो वे इसी गाअल की भूमिका में खड़े होते हैं, अब चाँदी से नहीं बल्कि अपने लहू से। और वाचा का वह वाक्य "मैं तुम्हारा परमेश्वर ठहरूँगा" बाइबल के आख़िरी पन्नों तक चलता है, जहाँ परमेश्वर अपने लोगों के बीच बसते हैं (प्रकाशितवाक्य 21)। मिस्र का दरवाज़ा उसी लंबी सड़क का पहला मोड़ है।
दर्पण
नौवाँ पद सबसे ईमानदार पद है: "उन्होंने मन की बेचैनी और दासत्व की क्रूरता के कारण उसकी न सुनी।" यह अविश्वास नहीं, थकावट है। जब महीने के अंत में पैसे नहीं बचते, जब बीमार माता-पिता की देखभाल में रातें कट जाती हैं, जब दफ़्तर में हर हफ़्ते नया दबाव आता है, तब वादा सुनने की भी ताक़त नहीं बचती। ध्यान दीजिए, परमेश्वर इस पर नाराज़ नहीं होते; वे मूसा को दोबारा भेजते हैं। आपका विश्वास इस समय कमज़ोर है, इससे वाचा नहीं टूटती। आज यह कीजिए: एक काग़ज़ पर वह एक जगह लिखिए जहाँ आप थककर सुनना छोड़ चुके हैं, और उसके नीचे ज़ोर से बोलकर यह वाक्य पढ़िए, "मैं तुम को अपनी प्रजा बनाने के लिये अपना लूँगा।"
एक बारीकी
वंशावली बीच में क्यों घुस आती है? क्योंकि छुटकारा हवा में नहीं, परिवारों में होता है। पर असली चुभन नामों में है। यहाँ "कोरह के पुत्र" दर्ज हैं, उसी कोरह के जो आगे चलकर मूसा के विरुद्ध विद्रोह करेगा; और हारून के बेटों में नादाब और अबीहू हैं, जो पवित्रस्थान में अनुचित आग लेकर मरेंगे। परमेश्वर की मुक्ति की सूची किसी आदर्श परिवार की सूची नहीं है। जिस वंश से छुटकारा आता है, उसी वंश से बग़ावत भी आती है। यह वंशावली हमें याद दिलाती है कि अनुग्रह इतिहास को सुंदर बनाकर नहीं, बल्कि उसे जैसा है वैसा उठाकर चलता है।
पृष्ठभूमि
पाँचवें अध्याय के बाद हालात बदतर हैं: फ़िरौन ने भूसा देना बंद कर दिया, ईंटों की गिनती वही रखी, इस्राएली सरदार पिटे, और मूसा की साख मिट्टी में मिल गई। मिस्र में फ़िरौन केवल राजा नहीं, देवता माना जाता था; उसका शब्द ही व्यवस्था था। ऐसे माहौल में "मैं यहोवा हूँ" एक राजकीय घोषणा की तरह गूँजता है, जैसे कोई सम्राट अपना फ़रमान अपने नाम से मुहरबंद करता है। असली सवाल यह नहीं कि इस्राएल आज़ाद होगा या नहीं, बल्कि यह कि मिस्र की धरती पर कौन सच में राजा है। दास लोग अपने मालिकों के देवताओं को शक्तिशाली मानते थे; परमेश्वर पहले उनके कान बदलते हैं, फिर उनकी ज़ंजीरें।
कठिन प्रश्न
तीसरा पद कहता है कि पूर्वजों पर परमेश्वर "यहोवा के नाम से" प्रगट नहीं हुए थे। पर उत्पत्ति में अब्राहम यही नाम पुकारता है। क्या बाइबल अपने आप से टकरा रही है? सबसे ईमानदार उत्तर यह है कि यहाँ "जानना" और "प्रगट होना" शब्दकोश की बात नहीं, अनुभव की बात है। पूर्वजों ने नाम सुना था, पर उस नाम के पीछे की वाचा-निभाने वाली शक्ति नहीं देखी थी; उन्होंने वादा पकड़ा और बिना देखे मरे। अब वह नाम इतिहास में काम करके अपने आप को खोलेगा। फिर भी एक बेचैनी बची रहती है: जो पीढ़ियाँ पूरा होते हुए नहीं देखतीं, उनका क्या? पाठ इसका सफ़ाई से हल नहीं देता। वह केवल इतना कहता है कि परमेश्वर स्मरण करते हैं, और उनका स्मरण देर से आए तब भी अधूरा नहीं होता।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन-सी थकावट है जो आपको परमेश्वर के वादे "सुनने" से रोक रही है, और आप उसे किसके सामने खुलकर कहेंगे?
अगर छुटकारे का असली लक्ष्य आज़ादी नहीं बल्कि "मैं तुम्हारा परमेश्वर ठहरूँगा" है, तो आप जिस चीज़ के लिए सबसे ज़्यादा प्रार्थना कर रहे हैं, वह इस लक्ष्य से कैसे जुड़ती है?
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