एज्रा 1:1
पाठ
बाबेल की गलियों में एक घोषक की आवाज़ गूँजती है, और वही बात मिट्टी और चमड़े पर लिखी जाकर साम्राज्य के कोने-कोने तक दौड़ पड़ती है। पद कहता है कि फारस के राजा कुस्रू के राज्य के पहले वर्ष में "यहोवा ने फारस के राजा कुस्रू का मन उभारा", और यह इसलिए हुआ कि "यहोवा का जो वचन यिर्मयाह के मुँह से निकला था वह पूरा हो जाए।" इसके बाद राजा ने अपने समस्त राज्य में यह प्रचार करवाया और लिखवा भी दिया। यानी एक ओर विश्व-राजनीति की सबसे ऊँची कुर्सी, दूसरी ओर दशकों पुराना एक भविष्यद्वक्ता का वाक्य; और इस पद के अनुसार दोनों में से चलानेवाला कौन है, इसमें कोई अस्पष्टता नहीं है।
मर्म
निर्वासित यहूदी के कानों में यह वाक्य लगभग असभ्य लगता होगा: यहोवा ने कुस्रू का मन उभारा। कुस्रू यहोवा को जानता तक नहीं था; उसके शिलालेखों में तो मरदूक देवता उसे बुलाता है। फिर भी शास्त्र दावा करता है कि उस सम्राट के भीतर की हलचल किसी और के हाथ की थी। यही इस पद का धार्मिक केंद्र है: परमेश्वर का शासन केवल मंदिर और मण्डली तक सीमित नहीं, वह राजनीतिक निर्णयों की नसों तक पहुँचता है, और वह ऐसे लोगों के द्वारा काम करता है जो उनका नाम भी ठीक से नहीं जानते। साथ ही यह पद बताता है कि परमेश्वर का वचन समय में लटका नहीं रहता। यिर्मयाह का बोला हुआ वाक्य सत्तर साल तक चुपचाप पड़ा नहीं रहा; वह पूरा होने के लिए इतिहास को खींच लाया।
सूत्र
यिर्मयाह ने सत्तर वर्ष की बात कही थी, और यशायाह ने तो कुस्रू का नाम तक पहले से बोल दिया था, उसे परमेश्वर का "अभिषिक्त" कहकर, जो शब्द सामान्यतः दाऊद की वंश-परंपरा के लिए बचाकर रखा जाता था। यह दो कारणों से महत्वपूर्ण है। पहला, इससे पता चलता है कि परमेश्वर अपने लोगों को छुड़ाने के लिए बाहर के, अन्यजाति के, अनजान हाथों का प्रयोग करने में संकोच नहीं करते। दूसरा, यह उस बड़े ढर्रे की एक कड़ी है जो मिस्र से निकलने से शुरू होकर क्रूस तक जाती है: बन्धुआई से घर लौटना, छिनी हुई वस्तुओं का लौटाया जाना, उजड़े स्थान पर उपासना का फिर से खड़ा होना। कुस्रू का फरमान अंतिम छुटकारा नहीं था, केवल उसका पूर्वाभास; क्योंकि जो मंदिर शेशबस्सर बनवाने चला, उसी के आँगन में एक दिन वह खड़ा होगा जो कहेगा कि इस मंदिर को ढाओ, मैं इसे तीन दिन में उठाऊँगा।
दर्पण
आपके जीवन में भी कोई कुस्रू है। वह विभागाध्यक्ष जिसके हस्ताक्षर के बिना फाइल आगे नहीं बढ़ती, वह मकान-मालिक, वह अफसर, वह रिश्तेदार जिसके हाथ में परिवार की संपत्ति का निर्णय है, वह डॉक्टर जिसकी राय पर अगले छह महीने टिके हैं। आप उनके सामने बैठकर यही सोचते हैं कि सब कुछ इनके मूड पर निर्भर है। यह पद उस अनुभव को झूठा नहीं कहता, वह सचमुच शक्तिशाली हैं; पर वह जोड़ता है कि उनके भीतर का "मन उभारना" किसी और के अधिकार में है। और यहाँ पर यह पद हमारे अभिमान को भी छूता है: यदि परमेश्वर अन्यजाति सम्राट को काम में ला सकते हैं, तो उनका काम आपकी शुद्धता, आपकी योग्यता या आपकी मण्डली की सहमति पर टिका नहीं है। आज ही उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसके निर्णय से आप डरते हैं, और उस नाम पर हाथ रखकर एक वाक्य में प्रार्थना कीजिए: "प्रभु, जैसे आपने कुस्रू का मन उभारा, इनका मन भी उभारिए।"
मुख्य पात्र
इस पद का असली कर्ता कुस्रू नहीं, यहोवा हैं, और उनका चित्र यहाँ बड़ा अनोखा है। वे न बिजली गिराते हैं, न स्वप्न में प्रकट होते हैं, न कोई भविष्यद्वक्ता दरबार में भेजते हैं। वे बस "मन उभारते" हैं; इब्रानी शब्द है उर, यानी किसी सोए हुए को जगाना, भीतर से हिला देना। यह परमेश्वर की सबसे शांत और सबसे भयावह कार्यशैली है: सम्राट को लगता है कि यह उसकी अपनी राजनीतिक बुद्धि है, प्रजा को खुश रखने की चतुर नीति, और वह सही भी है; पर उसकी बुद्धि के नीचे एक और इच्छा चल रही है। ऐसे परमेश्वर के साथ जीना आसान नहीं, क्योंकि वे प्रायः वहाँ नहीं दिखते जहाँ हम उन्हें ढूँढ़ते हैं। वे पर्दे के पीछे रहकर पूरा नाटक चलाते हैं, और अपने वचन को कभी ज़मीन पर गिरने नहीं देते।
श्रोता
जिन्होंने यह पुस्तक पहली बार पढ़ी, वे विजय के नशे में चूर लोग नहीं थे। वे यरूशलेम की धूल में रहनेवाला एक छोटा-सा समुदाय था, फारसी प्रांत "नदी पार" का एक कर-देनेवाला कोना, जहाँ मंदिर पहले वाले की तुलना में इतना मामूली था कि बूढ़े लोग उसे देखकर रोए थे। उनके मन में यह प्रश्न कुतरता रहता था: क्या हम अब भी वही लोग हैं जिनसे परमेश्वर ने वाचा बाँधी थी, या हम इतिहास का बचा-खुचा टुकड़ा हैं? इस पद ने उन्हें उत्तर दिया। तुम्हारा अस्तित्व किसी संयोग या फारसी उदारता का फल नहीं; तुम एक बोले हुए वचन की पूर्ति हो। बर्तनों की वह लंबी गिनती, तीस परात, एक हजार परात, उन्तीस छुरी, उनके लिए नीरस आँकड़े नहीं थे; वह प्रमाण था कि जो लूटा गया था, वह वापस आया है।
अंतर्पाठ
दो जगहें इस पद के नीचे बहती हैं। पहली, यिर्मयाह की सत्तर वर्षों वाली भविष्यवाणी, जो निर्वासितों को लिखी गई चिट्ठी में आती है: वहाँ परमेश्वर बन्धुआई को स्वीकार करने और साथ ही उसके अंत की आशा रखने को कहते हैं। एज्रा 1:1 उसी चिट्ठी की रसीद है। दूसरी, यशायाह 44 और 45, जहाँ कुस्रू का नाम लेकर कहा गया कि परमेश्वर उसकी कमर बाँधेंगे यद्यपि वह उन्हें नहीं जानता। इन दोनों को साथ रखिए और एज्रा की पहली पंक्ति एक सूखी ऐतिहासिक सूचना नहीं रह जाती; वह एक अदालती फैसले की तरह पढ़ी जाती है, जिसमें परमेश्वर अपने ही वचन के प्रति सच्चे ठहरते हैं, चाहे बीच में सत्तर साल और एक साम्राज्य का पतन क्यों न आ जाए।
चिंतन
आपके जीवन का कौन-सा "कुस्रू" है, जिसके निर्णय को आपने चुपचाप परमेश्वर के हाथ से बाहर मान लिया है?
परमेश्वर का कौन-सा वचन आपने बहुत पहले सुना था और अब मान बैठे हैं कि उसका समय निकल गया, जबकि वह शायद अब भी पूरा होने के लिए इतिहास को खींच रहा है?
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Ezra 1:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
एज्रा 1:1 का क्या अर्थ है?
एज्रा 1:1 किस विषय में है?
एज्रा 1:1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
एज्रा 1:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
एज्रा 1:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Ezra 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, जो कुछ छिन गया था, आपने उसे गिनकर लौटा दिया। मेरे जीवन के टूटे और बिखरे हिस्से भी आपकी नज़र में हैं। जो सालों पहले खो गया, उसे भी आप वापस लाने में सक्षम हैं। मुझे बंधन से घर की ओर ले चलिए, और भरोसा दीजिए कि आप कुछ भी नहीं भूलते।
जो लौटकर नहीं जा रहे थे, उन्होंने ही जानेवालों के हाथ मजबूत किए। "उनके आस-पास के सब रहनेवालों ने... उनकी सहायता की।" चाँदी, सोना, पशु, सब कुछ ऐसे लोगों के हाथ में जो शायद फिर कभी न दिखें। परमेश्वर का काम अकेले बुलाए हुए लोग नहीं करते, पीछे रहनेवाले देनेवाले भी करते हैं। तेरा हिस्सा शायद जाना नहीं, थामना है।
पिता, तूने बंधुआई में भी अपने लोगों को नहीं भुलाया, और लौटने का रास्ता खोल दिया। मुझे भी उठने का साहस दे, जहाँ तू बुला रहा है वहाँ जाने का। जो टूटा है उसे तेरे साथ मिलकर फिर से बनाने की इच्छा मेरे मन में जगा दे।
सब लोग यरूशलेम नहीं लौटे। कुछ बाबेल में ही रह गए। पर कुस्रू का आदेश उन्हें भुलाता नहीं: "उस स्थान के मनुष्य चाँदी, सोना, धन और पशु देकर उसकी सहायता करें।" जो जा नहीं सकता, वह देकर साथ चल सकता है। परमेश्वर का भवन उन हाथों से भी बनता है जो कभी उसकी दीवार को छूते नहीं। तू आज किसके कदमों को अपनी भेंट से मजबूत कर रहा है?
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