एज्रा 4:2
पाठ
मंदिर की नींव पर हथौड़े की आवाज़ अभी थमी नहीं थी कि उत्तर से कुछ लोग चले आए। वे ज़रुब्बाबेल के सामने खड़े हुए, और पूर्वजों के घरानों के मुख्य पुरुषों के सामने, और उनका प्रस्ताव सुनने में उतना ही सौम्य था जितना कोई पड़ोसी अपने पड़ोसी से कह सकता है: "हमें भी अपने संग बनाने दो।" फिर उन्होंने अपना परिचय-पत्र खोला, दो हिस्सों में। पहला धार्मिक: "तुम्हारे समान हम भी तुम्हारे परमेश्वर की खोज में लगे हुए हैं।" दूसरा ऐतिहासिक, और कहीं अधिक भारी: "अश्शूर का राजा एसर्हद्दोन जिसने हमें यहाँ पहुँचाया, उसके दिनों से हम उसी को बलि चढ़ाते भी हैं।" एक वाक्य में पूजा भी है और निर्वासन की राजनीति भी।
मर्म
ध्यान दीजिए, वे "हमारे परमेश्वर" नहीं कहते। वे कहते हैं "तुम्हारे परमेश्वर"। यही छोटा-सा सर्वनाम पूरे प्रस्ताव की रीढ़ तोड़ देता है। उनके लिए यहोवा इस भूमि के एक देवता हैं, जिनकी बलि वे अश्शूरी नीति के तहत यहाँ बसाए जाने के बाद से चढ़ाते आए हैं, कई देवताओं में से एक और। इस्राएल के लिए यहोवा वह परमेश्वर हैं जिन्होंने वाचा बाँधी, जिन्होंने बँधुआई में झोंका और फिर वहाँ से छुड़ाया। दोनों एक ही नाम बोल रहे हैं, पर एक ही बात नहीं कह रहे। यहीं पर यह पाठ चुभता है: धर्म की भाषा साझा हो सकती है जबकि परमेश्वर की पहचान साझा न हो। और मंदिर कोई साझा परियोजना नहीं था; वह उस वाचा का चिन्ह था जिसमें ये लोग शामिल नहीं थे।
सूत्र
यह इनकार जितना कठोर दिखता है, उतना ही यह पूरी कहानी की दिशा तय करता है। मंदिर इसलिए सुरक्षित रखा जाना था क्योंकि वह परमेश्वर की उस उपस्थिति का चिन्ह था जो एक दिन पत्थरों से निकलकर देह में आने वाली थी। जो लोग यहाँ दरवाज़े पर रोके गए, उन्हीं के वंश-क्षेत्र में, सामरिया के एक कुएँ पर, यीशु मसीह एक स्त्री से आराधना की बात करेंगे और कहेंगे कि वह घड़ी आ रही है जब न इस पहाड़ पर, न यरूशलेम में। पर वह घड़ी तब आती है जब नींव बन चुकी हो। पहले वाचा की पहचान सुरक्षित रहती है, फिर उसके द्वार चौड़े खुलते हैं। क्रम उलटा नहीं होता।
दर्पण
हम सब इस प्रस्ताव से परिचित हैं, क्योंकि हम अक्सर इसे स्वीकार कर लेते हैं। दफ़्तर में कोई कहता है, आखिर हम सब एक ही ऊपरवाले को मानते हैं; परिवार में कोई रिश्तेदार जुड़ना चाहता है, पर उसकी शर्तों पर; चर्च में कोई आर्थिक सहयोग आता है जिसके साथ अदृश्य डोरियाँ बँधी हैं। मना करना असभ्य लगता है, और ज़रुब्बाबेल जानता था कि इनकार की कीमत चुकानी पड़ेगी, जैसी आगे चुकानी भी पड़ी। असली सवाल यह नहीं कि कौन मदद दे रहा है, बल्कि यह कि नींव किसकी है।
आज दस मिनट निकालिए, काग़ज़ पर उस एक प्रस्ताव या साझेदारी का नाम लिखिए जो इस समय आपके सामने है, और उसके नीचे यह वाक्य लिखिए: "इसमें नींव किसकी है?" फिर उसे ज़ोर से पढ़कर परमेश्वर के सामने रख दीजिए।
प्रश्न
क्या यह इनकार सही था? पाठ इसे बिना आलोचना के दर्ज करता है, पर परिणाम भयावह हैं: निराशा, रिश्वत, चिट्ठियाँ, और अंत में काम का रुक जाना। सीमा खींचने वाले हमेशा साफ़ नैतिक धरातल पर खड़े नहीं होते, और बाइबल में ऐसी सीमाएँ कभी-कभी डर से भी खींची गई हैं। हमें यह असुविधा ईमानदारी से उठानी चाहिए। साथ ही यह भी सच है कि यदि वे हाँ कह देते, तो कुछ पीढ़ियों बाद जो खड़ा होता वह यहोवा का मंदिर न होकर एक मिला-जुला पूजा-स्थल होता, जैसा उत्तर में पहले से मौजूद था। कब सीमा विश्वासघात है और कब विश्वासपात्रता, यह पाठ हमें कोई सरल नियम नहीं देता।
अंतर्पाठ
दो जगहें इस दृश्य पर रोशनी डालती हैं। पहली, दूसरे राजाओं की वह रिपोर्ट कि अश्शूर द्वारा सामरिया में बसाए गए लोग यहोवा का भय मानते थे और साथ ही अपने देवताओं की भी सेवा करते थे। ठीक वही दोहरी निष्ठा यहाँ "एसर्हद्दोन के दिनों से" वाले वाक्य के पीछे खड़ी है। दूसरी, यशायाह की वह प्रतिज्ञा कि परदेशी भी, जो वाचा को थामे रहते हैं, परमेश्वर के पवित्र पर्वत पर लाए जाएँगे और उनकी बलि स्वीकार होगी। यानी बाधा जाति नहीं, बँटी हुई निष्ठा थी। परमेश्वर का घर हमेशा से खुला था, पर बिना शर्त नहीं।
संदर्भ
समय लगभग 536 ईसा पूर्व। कुस्रू के आदेश पर लौटी टोली छोटी है, गरीब है, और फारसी साम्राज्य के एक मामूली प्रांत में जी रही है। ज़रुब्बाबेल दाऊद के वंश से है, पर राजा नहीं; येशुअ महायाजक है, पर मंदिर अभी खंडहर। उत्तर के ये लोग कमज़ोर नहीं हैं: वे स्थानीय रूप से जमे हुए हैं, फारसी प्रशासन तक उनकी पहुँच है, और आगे के पदों में वे यही दिखा देते हैं। उनका "हमें भी अपने संग बनाने दो" इसलिए केवल धार्मिक भाईचारा नहीं, नियंत्रण का प्रस्ताव भी है। मंदिर का शाही परवाना किसके नाम है, यही असली दाँव पर लगा है।
चिंतन
आपके जीवन में इस समय कौन-सा प्रस्ताव सुनने में सौम्य है, पर जिसकी नींव किसी और की है?
"तुम्हारे परमेश्वर" और "हमारे परमेश्वर" के बीच का फ़ासला आपकी अपनी प्रार्थना में कहाँ दिखाई देता है?
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Ezra 4:2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
एज्रा 4:2 का क्या अर्थ है?
एज्रा 4:2 किस विषय में है?
एज्रा 4:2 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
एज्रा 4:2 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
एज्रा 4:2 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Ezra 4 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
तब यरूशलेम में परमेश्वर के भवन का काम रुक गया, और वह फारस के राजा दारा के राज्य के दूसरे वर्ष तक रुका रहा।" सोलह साल। नींव पड़ी रही, दीवारें अधूरी रहीं, और लोग हर सुबह उस अधूरे काम को देखते रहे। तेरे जीवन में भी शायद कुछ ऐसा ही अधूरा पड़ा है। पर ध्यान दे, यह आयत "रुक गया" पर खत्म नहीं होती, वह एक तारीख बताती है। परमेश्वर ने रुकने का समय भी तय कर रखा था, और फिर से शुरू होने का भी।
जरुब्बाबेल और येशुअ ने मदद ठुकरा दी: "हमारे परमेश्वर के लिये भवन बनाना तुम्हारा नहीं हमारा ही काम है।" कितना कठिन रहा होगा, जब काम बड़ा था और हाथ कम। पर हर बढ़ा हुआ हाथ परमेश्वर की ओर से नहीं होता। क्या तुम्हारे जीवन में भी कोई ऐसी मदद है, जो काम तो आसान करती है, पर नींव कमज़ोर कर देती है?
पिता, धन्यवाद कि जब विरोधियों ने राजा अर्तक्षत्र को वह चिट्ठी लिखी, तब भी तेरा काम तेरे हाथ से नहीं छूटा। धन्यवाद कि हमारे विरुद्ध लिखी हर बात तू पढ़ता है और तेरी योजना कोई कागज़ रोक नहीं सकता। तेरे भरोसे हम शांत रहते हैं।
पत्र में विरोधियों ने पहले अपना परिचय बड़े नामों से दिया, "महान और प्रतिष्ठित ओस्नप्पर" जिसने उन्हें लाकर सामरिया में बसाया था। ध्यान दे, ये लोग खुद उजाड़े गए और किसी और की मर्जी से बसाए गए थे। फिर भी अब दूसरों के बसने का विरोध कर रहे हैं। दर्द इंसान को कोमल भी बनाता है और कठोर भी। तेरे साथ जो हुआ, उसने तुझे किस ओर मोड़ा?
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