उत्पत्ति 1:24
पाठ
छठे दिन का पहला वचन: परमेश्वर कहते हैं कि पृथ्वी अपने भीतर से जीवित प्राणी निकाले, और वे तीन नामों से गिनाए जाते हैं, "घरेलू पशु, और रेंगनेवाले जन्तु, और पृथ्वी के वन पशु।" हर एक "जाति-जाति के अनुसार", यानी अपनी-अपनी सीमा और पहचान के साथ। और फिर वही छोटा, शान्त वाक्य जो इस अध्याय में बार-बार लौटता है: "और वैसा ही हो गया।" कोई संघर्ष नहीं, कोई देवताओं की लड़ाई नहीं। एक शब्द, और मिट्टी जीवन उगलने लगती है। ध्यान दीजिए कि यहाँ मनुष्य अभी दृश्य में आया ही नहीं है; गाय और साँप और जंगली जानवर उससे पहले खड़े हैं, और परमेश्वर उन्हें देखकर अगले वचन में कहते हैं कि यह अच्छा है।
मर्म
यह वचन दो बातें एक साथ कहता है, और दोनों हमें असहज करती हैं। पहली: पशु मनुष्य के काम आने के लिए नहीं, परमेश्वर के वचन से अस्तित्व में आए हैं। उनकी कीमत हमारी ज़रूरत से नहीं, उस आज्ञा से तय होती है जो उनसे पहले बोली गई। दूसरी: परमेश्वर "पृथ्वी से" उन्हें निकालते हैं। वे सीधे आकाश से नहीं गिरते; ज़मीन को भागीदार बनाया जाता है। सृष्टिकर्ता अपनी शक्ति साझा करने से नहीं डरते। और "जाति-जाति के अनुसार" कोई जीवविज्ञान की परिभाषा नहीं, बल्कि व्यवस्था की घोषणा है: परमेश्वर अराजकता के नहीं, सीमाओं के परमेश्वर हैं। जो सीमा वे खींचते हैं, वह कैद नहीं, सुरक्षा है। जीवन तभी फलता है जब वह अपनी दी हुई जगह में रहता है, और यही बात हम पर भी लागू होती है।
जोड़ने वाला सूत्र
जिस वचन से पशु निकले, वही वचन बाद में देह बनकर उन्हीं पशुओं की चरनी में लिटाया गया। यह संयोग नहीं है कि सुसमाचार का आरम्भ एक ऐसे कमरे में होता है जहाँ जानवर खाते हैं। परमेश्वर अपनी सृष्टि से पीछे नहीं हटते; वे उसके भीतर उतर आते हैं। और पौलुस जब लिखता है कि सारी सृष्टि छुटकारे की बाट जोहती हुई कराह रही है, तो वह ठीक इसी वचन के प्राणियों की बात कर रहा है, उन घरेलू पशुओं और वन पशुओं की, जो हमारे पतन का बोझ बिना किसी अपराध के ढोते हैं। मसीह में मेल केवल मनुष्यों का नहीं, "सब वस्तुओं" का है। इसलिए जो व्यक्ति सृष्टि के साथ क्रूर है, वह उस राज्य के विरुद्ध जी रहा है जिसकी वह प्रार्थना करता है।
दर्पण
यह वचन आपके रसोईघर तक आता है। जिस मुर्गी को आप खाते हैं, वह किन परिस्थितियों में पली, यह सवाल अब "धार्मिक" नहीं रहा; परमेश्वर ने उसे बनाया और अच्छा कहा, इससे पहले कि वह आपके काम आती। यह वचन आपके घर के कुत्ते तक, गली की उस गाय तक, और उस बैल तक आता है जो बिना विश्राम जोता जाता है। पर यह वचन आपकी सीमाओं तक भी आता है। "जाति-जाति के अनुसार" का अर्थ है कि आप वह नहीं हैं जो आप बनना चाहते हैं, आप वह हैं जो आप बनाए गए हैं। आपका शरीर सोता है, थकता है, बूढ़ा होता है; यह दोष नहीं, रचना है। जो आदमी अपने शरीर से मशीन का काम माँगता है, वह अपने सृष्टिकर्ता से बहस कर रहा है।
आज कुछ कीजिए: किसी पशु के पास जाइए, गली का कुत्ता हो, गाय हो, या घर का जानवर, उसके सामने पानी रखिए, और धीमे स्वर में कहिए, "परमेश्वर ने तुझे बनाया, और यह अच्छा है।"
श्रोता
जिन्होंने यह पहली बार सुना, वे बैलों और भेड़ों के बीच जीते थे और मिस्र तथा बाबेल की कहानियाँ जानते थे, जहाँ जानवर देवता थे: गाय की मूरत, मेंढक, साँप, बाज़। उनके कानों में यह वचन एक साथ मुक्ति और झटका था। बैल पूजने की चीज़ नहीं, बनाई हुई चीज़ है, इसलिए सोने का बछड़ा गढ़ना केवल अवज्ञा नहीं, मूर्खता है। पर साथ ही वे यह भी सुनते हैं कि जिन जानवरों पर उनकी रोटी टिकी है, वे संयोग नहीं, आज्ञा हैं। एक किसान के लिए यह गहरी सांत्वना थी: उसका सारा जीवन जिन प्राणियों के भरोसे चलता है, वे परमेश्वर के मुँह से निकले हैं।
पृष्ठभूमि
यह अध्याय ऐसे लोगों के लिए लिखा गया जो अपनी भूमि से उखड़ चुके थे या उखड़ने के कगार पर थे, और जिनके चारों ओर की सभ्यताएँ सृष्टि को देवताओं की मारकाट का मलबा बताती थीं। उन कहानियों में संसार हिंसा से बना; यहाँ वह वाणी से बनता है। वहाँ मनुष्य देवताओं का दास है; यहाँ पूरी पृथ्वी एक व्यवस्थित घर है जिसमें दिन-ब-दिन जगह और उसके निवासी सजाए जाते हैं। पाँचवें दिन जल और आकाश भरे गए, छठे दिन सूखी भूमि भरी जाती है। तीन श्रेणियाँ, घरेलू, रेंगनेवाले, वन पशु, इस्राएली किसान के अनुभव की श्रेणियाँ हैं: जिन्हें वह पालता है, जिनसे वह डरता है, और जो बीच में कहीं रेंगते हैं।
शास्त्र की गूँज
नीतिवचन कहता है कि धर्मी मनुष्य अपने पशु के प्राण की भी सुधि रखता है, जबकि दुष्ट की दया भी निर्दयता है। यह वाक्य सीधे इसी वचन पर खड़ा है: यदि पशु परमेश्वर की आज्ञा से बने हैं, तो उनके साथ बरताव चरित्र की परीक्षा है, शौक नहीं। और योना की पुस्तक का आखिरी वाक्य, जहाँ परमेश्वर नीनवे को बचाने का कारण बताते हुए उसके "बहुत से पशुओं" का भी नाम लेते हैं, हमें चौंकाता है, क्योंकि हम उन्हें गिनती में नहीं रखते। परमेश्वर रखते हैं। जो उन्होंने बोलकर बनाया, उसे वे भूलते नहीं।
चिंतन
आपके जीवन में कौन-सा प्राणी, या कौन-सा मनुष्य, केवल इसलिए मूल्यवान माना जाता है क्योंकि वह आपके काम आता है, और यदि वह काम आना बन्द कर दे तो क्या बदलेगा?
"जाति-जाति के अनुसार" जो सीमा परमेश्वर ने आपके शरीर, आपकी उम्र और आपकी क्षमता में रखी है, उसमें से किसे आप इस समय दोष मानकर लड़ रहे हैं?
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Genesis 1:24 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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उत्पत्ति 1:24 का क्या अर्थ है?
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उत्पत्ति 1:24 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
उत्पत्ति 1:24 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Genesis 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, आपने आकाशमण्डल को स्वर्ग कहा, और मैं हर सुबह उस नीले विस्तार को देखकर धन्यवाद देता हूँ। सांझ हुई फिर भोर हुआ, यह क्रम आपके हाथ में है। इसलिए मेरे दिनों की गिनती भी आप ही करते हैं, और यह मुझे शान्ति देता है।
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