उत्पत्ति 25:34
पाठ
एक कटोरा दाल, थोड़ी रोटी, और एक सौदा पूरा हो जाता है। याकूब ने जो माँगा था वह मिल चुका है, और अब वह अपने भाई को खाना परोसता है, मानो कुछ हुआ ही न हो। एसाव खाता है, पीता है, उठता है, और चला जाता है। कहानी उसके चेहरे का वर्णन नहीं करती, न उसके मन का। वह बस चला जाता है, जैसे कोई भूखा आदमी भोजन के बाद अपने काम पर लौट जाता है। और तभी, जब सब कुछ शांत और सामान्य लगने लगा है, कहानी सुनानेवाला एक वाक्य में फैसला सुना देता है: "इस प्रकार एसाव ने अपना पहलौठे का अधिकार तुच्छ जाना।"
मूल बात
ध्यान दीजिए कि एसाव ने कभी नहीं कहा, "मुझे इसकी परवाह नहीं।" उसने कहा था कि वह मरने पर है, कि इस अधिकार से उसे क्या लाभ। पर परमेश्वर का वचन उसकी बात दोहराता नहीं, वह उसके कर्म को तौलता है। इब्रानी क्रिया बाज़ाह का अर्थ है किसी चीज़ को हल्का समझना, उसका मोल घटा देना। यही इस पद का भार है: पाप हमेशा इनकार की गर्जना नहीं होता, कभी-कभी वह केवल एक शांत अनदेखी होता है। पहलौठे का अधिकार यहाँ जायदाद का हिस्सा नहीं, अब्राहम को दी गई प्रतिज्ञा की डोर है, आनेवाली जातियों की आशीष। और वह डोर एक थके हुए दोपहर में, बिना किसी नाटक के, छोड़ दी जाती है। क्या हम भी अपने सबसे कीमती को यूँ ही, चुपचाप, हाथ से फिसलने देते हैं?
साझा सूत्र
पहलौठे का अधिकार यहाँ एक पारिवारिक रिवाज़ से बड़ा है। यह वही डोर है जो अब्राहम से इसहाक तक आई, और जिसके सिरे पर आनेवाली जातियों की आशीष बँधी है। इसलिए यह दृश्य इतना बेचैन करता है: उद्धार का इतिहास एक चूल्हे के पास, दो भाइयों के बीच, एक थके हुए आदमी की भूख पर टिका दिखता है। और सदियों बाद एक और थका, भूखा आदमी जंगल में खड़ा होगा, जिससे कहा जाएगा कि रोटी बना ले, और वह अपने पुत्रत्व को रोटी के बदले नहीं देगा। यीशु मसीह वह पहलौठा हैं जिन्होंने अपने अधिकार को तुच्छ नहीं जाना, बल्कि उसे हमारे लिए थामे रखा। इब्रानियों की पत्री एसाव का नाम चेतावनी के तौर पर लेती है, इसलिए नहीं कि वह राक्षस था, बल्कि इसलिए कि वह हमारे जैसा था।
आयना
हम अपनी बड़ी चीज़ें बड़े क्षणों में नहीं खोते। हम उन्हें थकान में खोते हैं। शुक्रवार शाम, जब मन ख़ाली है और शरीर भारी; वह क्षण जब पत्नी से बात करने के बजाय स्क्रीन आसान लगती है; वह नौकरी की पदोन्नति जिसके लिए आपने चुपचाप वह तय कर लिया कि रविवार अब उपलब्ध नहीं; वह छोटा झूठ जो हिसाब को सरल बना देता है। कोई घोषणा नहीं होती, कोई फैसला नहीं लिया जाता। हम बस खाते हैं, पीते हैं, उठते हैं, चले जाते हैं। और कहानी सुनानेवाला ऊपर से एक वाक्य लिखता है जिसे हम उस वक्त सुनते नहीं। आज एक कागज़ पर लिखिए: पिछले सात दिनों में मैंने परमेश्वर के साथ का अपना समय किस "दाल" के बदले दे दिया। फिर उसे परमेश्वर के सामने ऊँची आवाज़ में पढ़िए और कागज़ फाड़ दीजिए।
मुख्य पात्र
एसाव खलनायक नहीं है, और यही उसे डरावना बनाता है। वह मैदान का आदमी है, हाथ से काम करनेवाला, शरीर में जीनेवाला, इतना जीवित कि उसकी भूख उसकी सोच से ऊँची बोलती है। "मैं तो अभी मरने पर हूँ" कहना अतिशयोक्ति है, पर वह उसे सच मानता है, क्योंकि इस पल में उसका शरीर उससे यही कह रहा है। जो अभी महसूस हो रहा है वह उसके लिए असली है; जो आगे आनेवाला है वह धुँधला है। और सबसे मार्मिक बात: पाठ हमें उसका पछतावा नहीं दिखाता। वह उठकर चला जाता है। कोई आँसू नहीं, कोई आत्मचिंतन नहीं। मन का सुन्न हो जाना कभी-कभी विद्रोह से भी गहरा नुकसान करता है।
कठिन प्रश्न
तो याकूब का क्या? उसने अपने भाई की भूख को मोलभाव का औज़ार बनाया, और पाठ उसे एक शब्द भी नहीं डाँटता। और इससे भी कठिन: परमेश्वर ने रिबका से पहले ही कह दिया था कि "बड़ा बेटा छोटे के अधीन होगा।" तो क्या एसाव केवल एक पहले से लिखी पटकथा पढ़ रहा था? पाठ यह गाँठ नहीं खोलता। वह दोनों बातें साथ रखता है: परमेश्वर का पहले से कहा गया वचन, और एसाव का अपना, स्वतंत्र, तुच्छ जानना। हमें यहाँ चुप रहना सीखना पड़ता है। जो हम कह सकते हैं वह यह है कि परमेश्वर का चुनाव किसी को मजबूर नहीं करता, और एसाव के हाथ में जो कटोरा था, वह उसने खुद उठाया था।
पहले सुननेवाले
जिन इस्राएलियों ने यह कहानी पहली बार सुनी, उनके कान पद 30 के अंत पर अटक गए होंगे: "इसी कारण उसका नाम एदोम भी पड़ा।" एदोम उनका पड़ोसी था, उनका खून का रिश्तेदार और अक्सर उनका शत्रु। यह कहानी उन्हें बताती थी कि वह पूरी जाति एक ऐसे पूर्वज से निकली जिसने आशीष को हल्का समझा। पर अगर वे ईमानदार थे, तो उन्हें अपना चेहरा भी दिखता था: वे लोग जो जंगल में छूट पाकर भी मिस्र की हाँडियों को याद करते रहे, जिन्होंने प्रतिज्ञा के देश के बदले पेट की शिकायत को चुना। यह पाठ पड़ोसी पर उँगली उठाता दिखता है, पर आईना सुननेवाले की ओर घूम जाता है।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन-सा क्षण है जब आप सबसे कमज़ोर होते हैं, जब "अभी" की आवाज़ "आगे" की आवाज़ को दबा देती है? उस क्षण को नाम दे सकें, तो क्या आप उसके लिए पहले से तैयारी कर सकते हैं?
एसाव उठकर चला गया, बिना पछतावे के। कहीं कोई ऐसी चीज़ है जिसे आपने खो दिया है और अब उसका दुःख भी नहीं होता? क्या आप परमेश्वर से यह माँगने को तैयार हैं कि वे उस सुन्नपन को तोड़ दें?
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