इब्रानियों 11:35
पाठ
एक ही वाक्य में दो बिल्कुल उलटी तस्वीरें रखी गई हैं। पहली: कुछ स्त्रियों को उनके मरे हुए बेटे जीवित लौटा दिए गए, कब्र ने अपना शिकार वापस उगल दिया, और घर में फिर से हँसी लौट आई। दूसरी: कुछ लोग मार खाते-खाते मर गए, और जब उनके सामने छूटने का रास्ता रखा गया, तो उन्होंने उसे ठुकरा दिया। लेखक कारण भी बताता है: "इसलिए कि उत्तम पुनरुत्थान के भागी हों।" यानी उन्होंने आज की रिहाई को ठुकराया क्योंकि उनकी नज़र उस जीवन पर टिकी थी जो कब्र के उस पार से शुरू होता है। एक ही अध्याय, एक ही विश्वास, दो बिल्कुल अलग अंजाम, और दोनों को एक ही साँस में सराहा गया।
मर्म
हम विश्वास को नतीजों से नापते हैं। बेटा जी उठा, तो परमेश्वर विश्वासयोग्य हैं; आदमी पीटा जाकर मर गया, तो कहीं कुछ गड़बड़ हुई। यह आयत उस पूरे तराजू को तोड़ देती है। इब्रानियों का लेखक दोनों घटनाओं को विश्वास के एक ही खाते में डालता है, और दूसरी को तो और ऊँचा भी ठहराता है, क्योंकि वहाँ विश्वास ने बिना किसी प्रमाण के, बिना किसी राहत के, केवल परमेश्वर के वचन के भरोसे खड़े रहना चुना। ध्यान दीजिए, वहाँ "छुटकारा न चाहा" लिखा है; छुटकारा मौजूद था, दरवाज़ा खुला था, केवल एक शब्द बोलना था। उन्होंने मना कर दिया। इसका मतलब यह है कि परमेश्वर की भलाई का अंतिम प्रमाण हमारी परिस्थिति का बदल जाना नहीं, बल्कि मसीह का जी उठना है, जिसमें वे "उत्तम पुनरुत्थान" के भागी बनते हैं। विश्वास तब सबसे साफ़ दिखता है जब उसके हाथ में सिवाय वादे के कुछ नहीं बचता।
सूत्र
यह आधी आयत इस्राएल के इतिहास के दो छोरों को छूती है। पहला हिस्सा एलिय्याह और एलीशा की कहानियों की ओर इशारा करता है, जहाँ दो विधवाओं को उनके बेटे लौटा दिए गए; दूसरा हिस्सा उन शहीदों की ओर, जिन्हें दोनों नियमों के बीच के अंधेरे दौर में यातना देकर मारा गया और जिनसे बार-बार कहा गया कि बस एक बार झुक जाओ, तुम छूट जाओगे। दोनों धाराएँ एक ही व्यक्ति में आकर मिलती हैं। यीशु मसीह को भी क्रूस पर छुटकारे का ताना दिया गया, नीचे उतर आओ; उन्होंने मना किया, और तीसरे दिन वह "उत्तम पुनरुत्थान" पाया जिसकी ये सब केवल प्रतीक्षा कर रहे थे। इसीलिए अध्याय के अंत में लेखक कहता है, "परमेश्वर ने हमारे लिये पहले से एक उत्तम बात ठहराई।" उनका इंतज़ार खाली नहीं था; वह मसीह की ओर मुड़ा हुआ था।
दर्पण
अब ईमानदारी से: आप किस जीविते होने की प्रार्थना कर रहे हैं? वह रिपोर्ट जो बदल जाए, वह नौकरी जो लौट आए, वह रिश्ता जो फिर साँस लेने लगे। यह चाहना पाप नहीं; इस आयत की पहली पंक्ति उसी चाहत को सम्मान देती है। पर दूसरी पंक्ति आपके सामने वह दरवाज़ा रखती है जिसे आप रोज़ खुला देखते हैं। दफ़्तर में एक चुप्पी, जिससे झंझट टल जाए। परिवार में एक अधूरा सच, जिससे शांति बनी रहे। थोड़ा-सा समझौता, और राहत मिल जाए। "छुटकारा न चाहा" का मतलब यही है: बचने का रास्ता मौजूद था, और उन्होंने उसे छोड़ दिया, क्योंकि उनकी उम्मीद कब्र के इस पार खत्म नहीं होती थी।
आज ही एक कागज़ पर वह एक वाक्य लिखिए जिससे आप इस हफ़्ते बच निकलने वाले थे, और उसके नीचे लिखिए "उत्तम पुनरुत्थान", फिर उसे परमेश्वर के सामने ज़ोर से पढ़िए।
प्रश्न
पर सवाल तो बचा ही रहता है: एक माँ को उसका बेटा लौटा दिया गया, दूसरी को उसकी लाश भी शायद न मिली। क्यों? पाठ कोई कसौटी नहीं देता। वह यह नहीं कहता कि पहली का विश्वास बड़ा था या दूसरी का पाप भारी। दोनों एक ही सूची में, एक ही सम्मान के साथ खड़े हैं। यहाँ हमें एक बात माननी पड़ती है जो सहज नहीं लगती: परमेश्वर हमारे न्याय के फार्मूले के अधीन नहीं हैं। इसका उत्तर तर्क में नहीं, क्रूस में है, जहाँ उन्होंने अपने पुत्र को भी छुटकारा नहीं दिया। जो परमेश्वर वहाँ खड़े रहे, वे हमारे दुख के बाहर खड़े तमाशबीन नहीं हैं। यह जवाब दर्द मिटाता नहीं, पर अकेलापन मिटाता है।
श्रोता
जिन्हें यह पत्र लिखा गया, उनके लिए यह सैद्धांतिक बहस नहीं थी। उनकी संपत्ति लूटी जा चुकी थी, कुछ जेल में थे, कुछ सरेआम अपमानित हुए थे। और उनके सामने एक वैध, आसान रास्ता खुला था: मसीह के नाम से थोड़ी दूरी बना लो, पुरानी पहचान में लौट आओ, और उत्पीड़न रुक जाएगा। लेखक उन्हें उनके अपने इतिहास के वे लोग दिखाता है जिनके सामने ठीक यही सौदा रखा गया था और जिन्होंने ठुकरा दिया। ये कहानियाँ वे बचपन से सुनते आए थे। "छुटकारा न चाहा" उनके कानों में नारा नहीं, पारिवारिक स्मृति थी, और अब वही स्मृति उनसे हिसाब माँग रही थी।
अन्तर्पाठ
इसी अध्याय की तेरहवीं आयत इस वाक्य को रोशनी देती है: "ये सब विश्वास ही की दशा में मरे; और उन्होंने प्रतिज्ञा की हुई वस्तुएँ नहीं पाईं।" यानी अधूरे हाथों मरना विश्वास की हार नहीं, उसका सबसे पक्का रूप है। और अध्याय का अंतिम वाक्य इसे पूरा करता है: "कि वे हमारे बिना सिद्धता को न पहुँचें।" वे मरते समय अकेले लग रहे थे, पर परमेश्वर उन्हें हमारे साथ, एक ही दिन, एक ही पुनरुत्थान में पूरा करेंगे। यह जोड़ सुंदर है: आपकी अधूरी प्रार्थना उनकी अधूरी प्रतीक्षा के साथ एक ही सूची में दर्ज है।
चिंतन
आपके जीवन में इस समय कौन-सा "छुटकारा" खुला पड़ा है, जिसे लेने पर तुरंत राहत मिलेगी पर कुछ टूट जाएगा?
अगर परमेश्वर आपकी वह प्रार्थना इस जीवन में पूरी न करें, तो क्या उत्तम पुनरुत्थान का वादा आपके लिए काफ़ी होगा, और ईमानदारी से कहिए, क्यों या क्यों नहीं?
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Hebrews 11:35 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
इब्रानियों 11:35 का क्या अर्थ है?
इब्रानियों 11:35 किस विषय में है?
इब्रानियों 11:35 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इब्रानियों 11:35 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इब्रानियों 11:35 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Hebrews 11 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि गिदोन, बाराक, शिमशोन, यिप्तह, दाऊद और शमूएल जैसे कमजोर और डरे हुए लोगों को भी आपने विश्वास की सूची में जगह दी। धन्यवाद कि आप मेरी कमियों के बावजूद मुझे भी काम में लाते हैं, और मेरा नाम भी आपके सामने याद रखा जाता है।
पिता, धन्यवाद कि अब्राहम "मरा हुआ सा था", फिर भी आपने उससे आकाश के तारों और समुद्र तट की बालू के समान अनगिनत वंश उठाया। धन्यवाद कि मेरी थकी, सूखी सी परिस्थिति भी आपके हाथ में बाँझ नहीं रहती, और आपकी प्रतिज्ञा मेरी कमज़ोरी से बड़ी है।
पिता, धन्यवाद कि मूसा के माता-पिता ने विश्वास से उसे तीन महीने छिपाए रखा और राजा की आज्ञा से न डरे। धन्यवाद कि आज भी आप माता-पिता को ऐसा साहस देते हैं कि वे डर के बीच अपने बच्चों को आपके हाथों में सौंप दें, और आप उनकी रक्षा करते हैं।
कुछ लोगों ने ठट्ठों में उड़ाए जाने और कोड़े खाने; वरन् बाँधे जाने और कैद में पड़ने का भी अनुभव किया।" गौर करो, सूची ठट्ठों से शुरू होती है, कोड़ों से नहीं। परमेश्वर जानता है कि हँसी उड़ाया जाना भी एक घाव है। तेरे विश्वास पर जो ताने कसे जाते हैं, वे स्वर्ग में दर्ज हैं, और तू उन्हीं की कतार में खड़ा है जिनके योग्य यह संसार न था।
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