यशायाह 36
पाठ
हिजकिय्याह के राज्य के चौदहवें वर्ष में अश्शूर का राजा सन्हेरीब यहूदा के गढ़वाले नगरों को निगल चुका है, और अब उसका अफसर रबशाके एक बड़ी सेना लेकर यरूशलेम की शहरपनाह के नीचे आ खड़ा होता है, ठीक उसी जगह जहाँ धोबी कपड़े धोते थे। वह हिजकिय्याह के तीन अधिकारियों से बात नहीं करना चाहता; वह जानबूझकर यहूदी भाषा में, दीवार पर बैठे साधारण लोगों के कानों में चिल्लाकर बोलता है। उसका पूरा भाषण एक ही चीज़ पर वार करता है: भरोसा। मिस्र पर भरोसा टूटी नरकट है, यहोवा पर भरोसा बेकार है, हिजकिय्याह पर भरोसा धोखा है। लोग चुप रहते हैं, और अधिकारी कपड़े फाड़े हुए लौटते हैं।
मर्म
"तू किसका भरोसा किए बैठा है?" यह प्रश्न इस अध्याय में बार-बार लौटता है, और यही इसका धर्मशास्त्रीय केंद्र है। रबशाके कोई मूर्ख नहीं; उसका तर्क अनुभव पर टिका है। हमात, अर्पाद, सपर्वैम, सामरिया, इन सबके देवता हार चुके हैं। आँकड़े उसके पक्ष में हैं। और यहीं यशायाह हमें उस जगह खड़ा कर देता है जहाँ विश्वास वास्तव में विश्वास बनता है: जब सारे दिखाई देने वाले प्रमाण उसके विरुद्ध हों। परमेश्वर पर भरोसा यहाँ किसी धार्मिक भावना का नाम नहीं, बल्कि एक राजनीतिक, सैनिक, जान पर बन आने वाला निर्णय है। रबशाके परमेश्वर को दूसरे देवताओं की कतार में खड़ा करता है, और यही उसकी असली भूल है, जो अगले अध्याय में उसे महँगी पड़ेगी।
जोड़ने वाला सूत्र
ध्यान दीजिए कि रबशाके क्या पेश करता है: अपनी दाखलता, अपना अंजीर का पेड़, अपने कुण्ड का पानी। यह भाषा परिचित है; यही तो प्रतिज्ञा किए हुए देश की तस्वीर है। शत्रु शांति और समृद्धि का वादा करता है, बस शर्त यह है कि तुम अपनी शहरपनाह छोड़कर "मेरे पास निकल आओ।" यह परीक्षा का वही ढाँचा है जो पूरे शास्त्र में लौटता है, और जो जंगल में यीशु मसीह के सामने भी रखा गया था: सही चीज़, गलत हाथ से, गलत शर्त पर। यशायाह की पुस्तक में यह अध्याय एक मोड़ है, क्योंकि यहाँ से वह दास की ओर बढ़ती है जो चुप रहता है और नहीं बचाता अपने आप को, ताकि दूसरे बचें। हिजकिय्याह के लोगों की चुप्पी उस बड़ी चुप्पी की एक धुँधली छाया है।
दर्पण
रबशाके का प्रश्न आपसे भी पूछा जाता है, और वह सटीक जगह पर उँगली रखता है। आपकी नौकरी की सुरक्षा, आपका बचत खाता, आपका बीमा, आपके संपर्क, आपकी सेहत, आपके बच्चों की पढ़ाई: इनमें से कौन-सी वह नरकट है जिस पर टेक लगाते ही वह हाथ में चुभ जाएगी? हम आमतौर पर परमेश्वर को नकारते नहीं; हम बस उन्हें अन्य सहारों के साथ मिलाकर रखते हैं, और मन ही मन जानते हैं कि असली वजन किस पर टिका है। रबशाके की सबसे क्रूर चाल यह है कि वह सीधे राजा से नहीं, दीवार पर बैठे आम लोगों से बोलता है, क्योंकि डर ऊपर से नहीं, नीचे से फैलता है। वह आवाज़ आज भी रात के तीन बजे आपके भीतर बोलती है: "यहोवा तुम्हें बचाएगा, यह मान लेना बचकानापन है।" और सबसे कठिन बात यह है कि उस वक्त आपके पास कोई करारा जवाब नहीं होता।
पहले सुननेवाले
शहरपनाह पर बैठे लोगों के लिए यह कोई धर्मशास्त्रीय बहस नहीं थी। वे जानते थे कि घेराबंदी का अर्थ क्या होता है, और रबशाके ने उन्हें बेरहमी से याद दिलाया: "अपनी विष्ठा खाना और अपना मूत्र पीना।" यह अभद्रता नहीं, रणनीति थी। उन्हें यह भी पता था कि सामरिया, उनके अपने उत्तरी भाई, कुछ ही साल पहले इसी सेना के हाथों मिटा दिए गए थे। और रबशाके का सातवाँ पद वाला ताना भी चुभा होगा, क्योंकि हिजकिय्याह ने सचमुच ऊँचे स्थान गिराए थे; कई लोगों को लगा होगा कि राजा ने ही परमेश्वर को नाराज़ किया है। यशायाह की किताब पढ़ने वाली बाद की पीढ़ियाँ, जो बेबीलोन का निर्वासन देख चुकी थीं, इसे और गहराई से सुनतीं: साम्राज्य बोलते हैं, पर अंतिम शब्द उनका नहीं होता।
कठिन प्रश्न
पद दस काँटे की तरह अटकता है: "यहोवा ने मुझसे कहा है, उस देश पर चढ़ाई करके उसे उजाड़ दे।" क्या यह झूठ है? पूरी तरह नहीं। यशायाह स्वयं पहले कह चुका है कि अश्शूर परमेश्वर के क्रोध का डंडा है। तो शत्रु के मुँह में आधा सच है, और आधा सच सबसे खतरनाक हथियार है। यहाँ कोई आसान नियम नहीं मिलता जिससे आप हमेशा पहचान लें कि परमेश्वर की आवाज़ कौन-सी है और उसकी नकल कौन-सी। हिजकिय्याह के पास भी नहीं था; इसीलिए उसने अपने आदमियों को उत्तर देने से मना किया और खुद परमेश्वर के सामने जाना चुना। कभी-कभी विवेक बहस जीतने से नहीं, बहस से हटकर प्रार्थना में जाने से आता है। यह असुविधाजनक उत्तर है, पर ईमानदार है।
शास्त्र की गूँज
यशायाह 30 में परमेश्वर पहले ही चेता चुके थे कि मिस्र की सहायता खोखली है, और अब यह चेतावनी शत्रु के मुँह से लौटती है, जो दिखाता है कि परमेश्वर का सच तब भी सच रहता है जब गलत लोग उसे बोलें। दूसरी ओर, भजन 46 का "परमेश्वर हमारा शरणस्थान है" ठीक इसी तरह की घेराबंदी की भाषा में लिखा गया है, और वह इस अध्याय का उलटा जवाब है: शहरपनाह पर बैठे डरे हुए लोगों को एक दिन गाना सिखाया जाएगा। इन दोनों के बीच में यह अध्याय खड़ा है, बिना समाधान के, चुप्पी और फटे कपड़ों पर खत्म होता हुआ।
चिंतन
आज आपके जीवन में वह कौन-सी "कुचली हुई नरकट" है जिस पर आप वजन डाल रहे हैं, और आप उसे छोड़ने से क्यों डरते हैं?
जब भीतर की आवाज़ आपके विश्वास पर आधे सच के साथ हमला करती है, तो आप बहस करते हैं या हिजकिय्याह की तरह चुप होकर परमेश्वर के सामने जाते हैं?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि एल्याकीम, शेब्ना और योआह ने रब्शाके की बातें अपने मन में दबाकर नहीं रखीं, बल्कि वस्त्र फाड़े हुए हिजकिय्याह के पास ले गए। धन्यवाद कि हमें भी ताने और धमकियाँ अकेले नहीं ढोनी पड़तीं, हम उन्हें ज्यों की त्यों तेरे सामने रख सकते हैं।
पिता, जब डर की आवाज़ें दरवाज़े तक आ पहुँचती हैं, तब मुझे भी बाहर निकलकर उनका सामना करना पड़ता है। मुझे अकेला मत छोड़ना। जो ज़िम्मेदारी तूने मेरे कंधों पर रखी है, उसे संभालने के लिए शांत मन और सही शब्द दे। मेरा भरोसा तुझी पर टिका रहे।
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