यशायाह 41
पाठ
परमेश्वर अदालत लगाते हैं। द्वीपों और दूर की जातियों को बुलाया जाता है कि वे चुप रहें, पास आएँ और मुकदमा लड़ें: कौन है जो इतिहास को चलाता है, कौन है जिसने पूर्व दिशा से उस विजेता को उभारा जो राजाओं को भूसे की तरह उड़ा देता है? जवाब में जातियाँ काँपती हैं और जल्दी-जल्दी मूर्तियाँ गढ़ती हैं, सुनार और बढ़ई एक दूसरे को हियाव बँधाते हैं कि कील ठोंककर देवता को गिरने से बचा लें। इसी शोर के बीच परमेश्वर अपने दास इस्राएल की ओर मुड़ते हैं, उसे अब्राहम का वंश और अपना चुना हुआ कहते हैं, और बार-बार दोहराते हैं, "मत डर, क्योंकि मैं तेरे संग हूँ।" अध्याय का अंत फिर उसी कचहरी में होता है: मूर्तियाँ भविष्य नहीं बता सकतीं, वे "वायु और मिथ्या" हैं।
मर्म
यहाँ दो दावे एक साथ खड़े होते हैं, और उन्हें अलग करना असंभव है। पहला: परमेश्वर सृष्टि और इतिहास के स्वामी हैं, "मैं यहोवा, जो सबसे पहला, और अन्त के समय रहूँगा।" दूसरा: यही परमेश्वर एक थके, टूटे, निर्वासित लोगों का दाहिना हाथ पकड़ते हैं। बड़ा धर्मशास्त्रीय बिंदु यही है कि अनुग्रह हवा में नहीं तैरता; वह उसी हाथ से आता है जो साम्राज्यों को उठाता और गिराता है। इसलिए "मत डर" कोई भावनात्मक दिलासा नहीं, बल्कि वाचा का कानूनी बयान है: मैंने तुझे चुना है और त्यागा नहीं। ध्यान दीजिए, इस्राएल को "कीड़े सरीखे याकूब" कहा जाता है, यानी उसकी योग्यता का कोई ज़िक्र नहीं। उसकी सुरक्षा उसके बल में नहीं, चुनाव में है। और यहाँ परमेश्वर का नाम बार-बार "इस्राएल का पवित्र" है, वही पवित्रता जो न्याय करती है, अब छुड़ानेवाली बनकर काम करती है। यही सुसमाचार का बीज है।
सूत्र
इस अध्याय में जो "दास" कहलाता है, वह इस्राएल है। पर यशायाह की किताब आगे चलकर इसी शब्द को एक व्यक्ति पर केंद्रित कर देती है, एक ऐसे दास पर जो वह करेगा जो इस्राएल कर न सका: चुपचाप कुचला जाना और फिर भी बहुतों को धर्मी ठहराना। यहाँ बीज पड़ता है, वहाँ फल आता है। और ध्यान दीजिए कि पद 4 का "मैं सबसे पहला, और अन्त के समय रहूँगा" प्रकाशितवाक्य में उठकर यीशु मसीह के मुँह में रखा जाता है। जो परमेश्वर बाबेल के सामने अदालत में खड़े होकर इतिहास पर अपना अधिकार जताते हैं, वही देह धरकर हमारे बीच आते हैं। रेगिस्तान में पानी और सूखी ज़मीन पर देवदार का वादा (पद 18-19) कोई खेतीबाड़ी की भविष्यवाणी नहीं; यह नई सृष्टि की झलक है, वही जो मसीह के जी उठने में शुरू हो चुकी है और जिसका पूरा होना अभी बाकी है।
दर्पण
"इधर-उधर मत ताक" वाक्य बहुत कम सुनाया जाता है, पर वही हमारी नस पकड़ता है। हम डर में सिर्फ़ काँपते नहीं, हम चारों ओर देखते हैं: कौन-सा और बीमा, कौन-सा और सम्पर्क, बच्चे की कौन-सी और क्लास, बॉस की कौन-सी और तारीफ़? यह पद 6-7 वाली हड़बड़ी है, वही कील ठोंकना ताकि हमारा छोटा-सा सहारा गिर न जाए। रिपोर्ट आने से पहले की रात, नौकरी जाने की अफ़वाह, बूढ़े माता-पिता का बढ़ता बिल, यही वे जगहें हैं जहाँ हम अपने हाथ से अपने देवता जोड़ते हैं। यह पाठ उस काम को मूर्खता नहीं, दया से देखता है, पर उसे नाम ज़रूर देता है: "वायु और मिथ्या।" आज अपनी डायरी या फ़ोन पर उस एक नाम या स्थिति को लिखिए जिससे आप इस समय सबसे ज़्यादा डरते हैं, और उसके नीचे अपना नाम लिखकर यह वाक्य ज़ोर से बोलिए: "मत डर, क्योंकि मैं तेरे संग हूँ।"
पहचान
पहले सुननेवाले वे लोग थे जिनका मंदिर जल चुका था, जिनका राजा अंधा करके ले जाया गया था, और जो बाबेल की गलियों में रहते थे जहाँ साल में एक बार देवताओं की मूर्तियाँ जुलूस में कंधों पर ढोई जाती थीं। उन्होंने पद 6-7 का व्यंग्य तुरंत पकड़ा होगा: जिस देवता को कील ठोंककर खड़ा रखना पड़े, वह किसे सँभालेगा? "कीड़े सरीखे याकूब" उन्हें बुरा नहीं लगा होगा, वह तो उनकी हालत का सटीक वर्णन था, एक हारी हुई, बिखरी हुई, गिनती में नगण्य क़ौम। और पूर्व से उठता वह विजेता, कुस्रू, उनके लिए अख़बार की सुर्खी था, कल्पना नहीं। सवाल यही था: क्या साम्राज्यों का यह उलटफेर बेतरतीब है, या इसके पीछे उनके वाचा के परमेश्वर का हाथ है?
बारीकी
पद 7 का दृश्य ठहरकर देखने लायक है। बढ़ई सुनार से कहता है, "जोड़ तो अच्छी है," और फिर "वह कील ठोंक-ठोंककर उसको ऐसा दृढ़ करता है कि वह स्थिर रहे।" मूर्ति को गिरने से बचाना पड़ता है। अब इसके ठीक बाद पद 10 और 13 पढ़िए: "अपने धर्ममय दाहिने हाथ से मैं तुझे सम्भाले रहूँगा," "मैं तेरा परमेश्वर यहोवा, तेरा दाहिना हाथ पकड़कर।" पूरा अंतर इसी एक क्रिया में है: कौन किसको थामे हुए है। झूठी आस्था में इंसान अपने परमेश्वर को खड़ा रखता है, उसकी इज़्ज़त बचाता है, उसके लिए बहाने गढ़ता है। सच्ची आस्था में परमेश्वर इंसान का हाथ पकड़ते हैं। यही फ़र्क़ धर्म और अनुग्रह के बीच है, और वह दो पदों की दूरी पर रखा गया है।
मुख्य पात्र
इस अध्याय में बोलनेवाले परमेश्वर हैं, और उनका स्वर हैरान करता है। वे वकील की तरह शुरू करते हैं, ठंडे और निर्णायक, जातियों को चुनौती देते हुए कि प्रमाण दो। फिर अचानक स्वर बदलता है और वे कहते हैं, "मेरे मित्र अब्राहम के वंश।" यह सम्बोधन बहुत कोमल है; वाचा यहाँ केवल क़ानून नहीं, दोस्ती है। जो परमेश्वर हाकिमों को कीच की तरह लताड़ते हैं, वही प्यासों का तालू याद रखते हैं और कहते हैं, "मैं यहोवा उनकी विनती सुनूँगा।" और पद 20 उनकी असली मंशा खोलता है: वे चाहते हैं कि लोग देखें, सोचें, और समझें कि यह उनके हाथ का किया हुआ है। परमेश्वर केवल बचाना नहीं चाहते, वे जाने जाना चाहते हैं।
मनन के प्रश्न
आपके जीवन में इस समय कौन-सी चीज़ है जिसे आप "कील ठोंककर" खड़ा रखने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि वह गिर न जाए?
यदि परमेश्वर ने इस्राएल को उसकी योग्यता के कारण नहीं, बल्कि "कीड़े सरीखे" हालत में चुना और थामा, तो आपकी अपनी कमज़ोरी को देखने का तरीक़ा कैसे बदलना चाहिए?
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