यशायाह 57
पाठ
अध्याय एक चुभती हुई शिकायत से खुलता है: "धर्मी जन नाश होता है, और कोई इस बात की चिन्ता नहीं करता।" भले लोग मर रहे हैं और किसी की आँख नम नहीं होती। इसके तुरन्त बाद स्वर बदलता है और परमेश्वर उस पीढ़ी को कठघरे में खड़ा करते हैं जो हरे वृक्षों के तले कामातुर होती है, नालों और चट्टानों की दरारों में बच्चों का वध करती है, और ऊँचे पहाड़ पर अपना बिछौना बिछाती है। यह विश्वासघाती पत्नी की भाषा है। फिर, बिना किसी चेतावनी के, वही आवाज़ कहती है कि वह ऊँचे और पवित्रस्थान में रहते हुए भी "खेदित और नम्र" लोगों के संग बसती है, चंगा करती है, शान्ति देती है। और अंत में एक दरवाज़ा बन्द होता है: "दुष्टों के लिये शान्ति नहीं है।"
मूल बात
पद 15 इस अध्याय की धुरी है, और यह परमेश्वर के बारे में दो ऐसी बातें एक साथ कहता है जिन्हें हम आमतौर पर अलग-अलग रखते हैं। जो "महान और उत्तम और सदैव स्थिर" है, जिसका नाम पवित्र है, वही टूटे हुए लोगों के घर में रहने आता है। ऊँचाई और झुकाव में यहाँ कोई विरोध नहीं; परमेश्वर की पवित्रता ही उन्हें नीचे लाती है। और इसका आधार हमारी योग्यता नहीं है: "आत्मा मेरे बनाए हुए हैं" (पद 16)। क्रोध की एक सीमा है क्योंकि सृष्टिकर्ता जानते हैं कि उनकी बनाई हुई मिट्टी कितनी देर टिक सकती है। पद 18 का छोटा-सा शब्द "तो भी" पूरे सुसमाचार का बीज है: वे भटकना देखते आए हैं, और फिर भी चंगा करने का निर्णय लेते हैं। यही अनुग्रह है, भावुकता नहीं।
मुख्य सूत्र
यह अध्याय उद्धार की कहानी में ठीक उस जगह खड़ा है जहाँ निर्वासन की धूल अभी बैठी नहीं है। पद 14 का आदेश, "पाँति बाँध बाँधकर राजमार्ग बनाओ, मेरी प्रजा के मार्ग में से हर एक ठोकर दूर करो," वही पुकार है जो यशायाह 40 में जंगल से उठी थी और जिसे बाद में यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले ने अपने कंधों पर उठाया। यशायाह में यह सड़क बाबेल से घर लौटने के लिए बनती है; सुसमाचारों में यही सड़क मसीह के आने के लिए बनती है। और पद 19 का वाक्य, "जो दूर और जो निकट हैं, दोनों को पूरी शान्ति मिले," पौलुस के हाथ में जाकर यहूदी और अन्यजाति के बीच गिरी हुई दीवार का सुसमाचार बन जाता है। परमेश्वर पहले शान्ति की घोषणा करते हैं, फिर मसीह में स्वयं वह शान्ति बनकर आते हैं।
दर्पण
पद 10 एक ऐसी थकान का वर्णन करता है जिसे हम सब पहचानते हैं: "तू अपनी यात्रा की लम्बाई के कारण थक गई, तो भी तूने न कहा कि यह व्यर्थ है।" यही आधुनिक जीवन की तस्वीर है। हम जिस चीज़ के पीछे भाग रहे हैं, वह हमें दे नहीं रही, फिर भी हम रुककर यह स्वीकार नहीं करते कि यह व्यर्थ है, क्योंकि रुकने का मतलब है मानना कि इतने साल किस दिशा में लगे। पदोन्नति, दूसरों की नज़र में सम्मान, बच्चों के ज़रिए अपनी अधूरी इच्छाएँ पूरी करना; ये आज के "नालों के चिकने पत्थर" हैं। पर पद 1 की चोट और गहरी है: भले लोग मरते हैं और कोई नहीं सोचता। आज ही किसी ऐसे विश्वासी का नाम कागज़ पर लिखिए जिसकी मृत्यु पर मंडली ने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया, और उनके परिवार के किसी एक सदस्य को अभी एक संदेश भेजिए।
एक बारीकी
पद 8 का एक ब्योरा आसानी से छूट जाता है: "तूने अपनी निशानी अपने द्वार के किवाड़ और चौखट की आड़ ही में रखी।" इस्राएल को आज्ञा थी कि परमेश्वर के वचन घर की चौखट पर लिखे जाएँ, ताकि हर बार बाहर जाते और भीतर आते समय याद रहे कि यह घर किसका है। और अब उसी चौखट के पीछे मूर्ति का चिह्न छिपा है। यह खुली बग़ावत नहीं, यह दोहरापन है, बाहर से सही घर, दरवाज़े के पीछे कुछ और। परमेश्वर की शिकायत यही है कि उन्हें उनकी अपनी जगह से हटाकर एक गुप्त प्रतिद्वंद्वी बिठा दिया गया। घर का सबसे पवित्र कोना ही सबसे बड़े झूठ की जगह बन गया।
शास्त्र में गूँज
विश्वासघाती पत्नी की भाषा यशायाह की अपनी खोज नहीं है; होशे और यिर्मयाह ने पहले ही इस्राएल को हर ऊँचे टीले और हरे वृक्ष के नीचे व्यभिचार करती हुई स्त्री कहा था। यशायाह इसे और आगे ले जाता है, क्योंकि यहाँ मूर्तिपूजा राजनीति भी है: तेल और सुगन्ध लेकर विदेशी राजा के पास जाना (पद 9) निष्ठा को गिरवी रखना है। दूसरी ओर पद 15 की "खेदित और नम्र" आत्मा वही है जिसे भजनकार टूटे मन की बलि कहता है, और जिसे यशायाह अपने अंतिम अध्याय में दोहराता है: परमेश्वर उसी की ओर दृष्टि करते हैं जो दीन और मन में टूटा है। पद 20 की छवि, दुष्ट "लहराते हुए समुद्र के समान" जो मैल और कीच उछालता है, यहूदा की पत्री में झूठे शिक्षकों पर लागू होती है। और पद 19 का "दूर और निकट" इफिसियों 2 में जाकर खुलता है: मसीह ने आकर दूरवालों और निकटवालों, दोनों को शान्ति का सुसमाचार सुनाया। पुराने नियम की एक पंक्ति नए नियम में कलीसिया की नींव बन जाती है।
पृष्ठभूमि
यशायाह के इस भाग की आवाज़ निर्वासन की छाया में बोलती है, उन लोगों से जो या तो बाबेल में हैं या यरूशलेम के खंडहरों के बीच लौट आए हैं। ये लोग गरीब हैं, कमज़ोर हैं, और उनके चारों ओर के धर्मों के पास मंदिर, सेना और सफलता है। ऐसे में नालों की दरारों में बच्चों की बलि देना केवल घिनौनी क्रूरता नहीं थी, वह हताश सुरक्षा-सौदा था: सबसे कीमती चीज़ देकर फ़सल और भविष्य ख़रीदने की कोशिश। पद 11 का सवाल इसी डर को पकड़ता है, "तूने किसके डर से झूठ कहा?" परमेश्वर की चुप्पी को उन्होंने अनुपस्थिति समझ लिया था। यही वह समुदाय है जिससे कहा जाता है कि जो उनकी शरण लेगा, वही देश और पवित्र पर्वत का अधिकारी होगा।
चिंतन के प्रश्न
आपके घर की "चौखट के पीछे" कौन-सी निशानी छिपी है, वह निष्ठा जिसे आप सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करेंगे पर छोड़ना भी नहीं चाहते?
पद 14 कहता है कि दूसरों के मार्ग से ठोकरें हटाई जाएँ। आपके व्यवहार में कौन-सी एक चीज़ किसी और के लिए विश्वास तक पहुँचना कठिन बना रही है?
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Isaiah 57 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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यशायाह 57 का क्या अर्थ है?
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यशायाह 57 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यशायाह 57 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Isaiah 57 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मैं अपने अच्छे कामों की गिनती करके खुद को सही ठहराना चाहता हूँ, पर तू जानता है कि उनमें कितना खोखलापन है। मेरे दिखावे को हटा दे और मुझे ऐसा सच्चा मन दे जो तुझ पर ही भरोसा करे। मेरी आशा मेरी कमाई नहीं, तेरी दया है।
यशायाह 57:17 में परमेश्वर कहते हैं, "उसके लोभ के पाप के कारण मैं क्रोधित हुआ, मैंने उसे मारा, मैंने क्रोध में अपना मुँह छिपाया; परन्तु वह पीछे हटकर अपने मनमाने मार्ग पर चलता रहा।"
सोचिए, परमेश्वर ने ताड़ना दी, फिर भी इस्राएल अपनी ही ज़िद पर चलता रहा। कभी-कभी हम भी यही करते हैं, दुख आता है, पर हम रुककर सोचते नहीं कि परमेश्वर क्या कहना चाहते हैं। क्या आज कोई ऐसी चोट है जिसे आप अनसुना कर रहे हैं?
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