यशायाह 59:21
पाठ
अध्याय का अंत एक घोषणा से होता है, मानो परमेश्वर स्वयं अदालत में खड़े होकर अपनी ओर से एक दस्तावेज़ पढ़ रहे हों: "जो वाचा मैंने उनसे बाँधी है वह यह है, कि मेरा आत्मा तुझ पर ठहरा है, और अपने वचन जो मैंने तेरे मुँह में डाले हैं अब से लेकर सर्वदा तक वे तेरे मुँह से, और तेरे पुत्रों और पोतों के मुँह से भी कभी न हटेंगे।" दो चीज़ें दी जाती हैं और दोनों परमेश्वर की अपनी हैं: उनका आत्मा, जो ठहरता है, और उनके शब्द, जो एक मनुष्य के मुँह में रखे जाते हैं। और फिर समय की तीन पीढ़ियाँ गिनाई जाती हैं, जैसे कोई वादा करते समय आपका हाथ पकड़कर कहे, "यह सिर्फ़ तुम्हारे लिए नहीं।"
मर्म
ध्यान दीजिए कि यह वाचा किस जगह पर आती है। उसी अध्याय में कहा गया था, "तुम्हारे मुँह से तो झूठ और तुम्हारी जीभ से कुटिल बातें निकलती हैं," और बाद में लोग स्वयं स्वीकार करते हैं, "हमने झूठी बातें मन में गढ़ीं और कही भी हैं।" मुँह ही अपराध का औज़ार था। और ठीक उसी मुँह में परमेश्वर अपने वचन रखते हैं। यह वाचा सुधार की माँग नहीं, दान की घोषणा है। परमेश्वर यह नहीं कहते कि अब सच बोलना सीखो; वे कहते हैं कि मैं अपनी बात तुम्हारी ज़बान पर रख दूँगा और वह वहाँ से हटेगी नहीं। यही अनुग्रह का असली स्वाद है: वह घाव पर पट्टी नहीं बाँधता, वह टूटे हुए अंग को नया काम सौंप देता है।
सूत्र
यह आयत अकेली नहीं खड़ी; वह आयत 20 से जुड़ी है, जहाँ कहा गया, "याकूब में जो अपराध से मन फिराते हैं उनके लिये सिय्योन में एक छुड़ानेवाला आएगा।" पहले छुड़ानेवाला, फिर वाचा। उद्धार पहले, आत्मा बाद में, और यही क्रम पूरे बाइबल में दोहराता है। यशायाह की किताब में पहले भी एक व्यक्ति पर आत्मा का ठहरना बताया गया था, और यीशु ने नासरत की सभा में वही पढ़कर कहा था कि यह आज पूरा हुआ। जो आत्मा उन पर ठहरा, वही पिन्तेकुस्त के दिन उन लोगों पर उतरा जिनके मुँह से कुछ ही हफ़्ते पहले इनकार और भगदड़ निकली थी। बारह आदमी, जिनकी ज़बान भरोसे लायक नहीं थी, अचानक बोलने लगे और रुके नहीं। यही आयत 21 का पूरा होना है: परमेश्वर एक बोलता हुआ समुदाय बनाते हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है।
दर्पण
आप जानते हैं कि आपके मुँह ने क्या-क्या किया है। वह ईमेल जिसमें आपने सच को थोड़ा मोड़ा ताकि आप बेहतर दिखें। वह टिप्पणी जो घर में इसलिए की कि चोट पहुँचे। वह चुप्पी जब बोलना चाहिए था, क्योंकि बोलने की कीमत नौकरी या रिश्ता हो सकती थी। और शायद इससे गहरी बात: आप डरते हैं कि आपके बच्चे आपसे विश्वास नहीं, बस आपकी भाषा सीखेंगे, आपकी कड़वाहट, आपका व्यंग्य, आपकी बेचैनी। यह आयत उस डर को छूती है और उसे खारिज नहीं करती, पर उसके ऊपर कुछ और रख देती है: "अब से लेकर सर्वदा तक।" आपका परिवार आपकी वाक्पटुता पर नहीं, परमेश्वर की वाचा पर टिका है। पर सावधान रहिए, यह आलस्य का बहाना नहीं। जो वचन आपके मुँह में रखा गया है, वह बोलने के लिए रखा गया है। आज ही अपने बच्चे को, या किसी एक जवान व्यक्ति को, बाइबल का एक वाक्य ज़ोर से पढ़कर सुनाइए और एक पंक्ति में बताइए कि वह आपके लिए क्यों सच है।
मुख्य पात्र
इस आयत में बोलने वाला एक ही है, और वह बार-बार "मेरा" कहता है: मेरा आत्मा, मेरे वचन, जो वाचा मैंने बाँधी है। इससे पहले आयत 16 में चौंकाने वाली बात कही गई थी कि परमेश्वर ने देखा "कि कोई भी पुरुष नहीं," कोई विनती करने वाला तक नहीं, और तब "उसने अपने ही भुजबल से उद्धार किया।" यह परमेश्वर का भावनात्मक चित्र है: वे खाली मैदान देखते हैं, हैरान होते हैं, और फिर खुद उतर पड़ते हैं। यहाँ कोई सौदेबाज़ी नहीं, कोई शर्त नहीं कि पहले तुम सुधरो। वे अपने ही संसाधनों से, अपनी धार्मिकता के कारण काम करते हैं। ऐसा परमेश्वर खतरनाक रूप से उदार है, क्योंकि उनके पास बहाना बनाने की कोई वजह नहीं थी और उन्होंने फिर भी वाचा बाँधी।
एक बारीकी
"ठहरा है" शब्द पर रुकिए। इब्रानी क्रिया का अर्थ है टिकना, बना रहना, जैसे बादल तम्बू पर ठहरता था। आत्मा का आना इस्राएल के इतिहास में अक्सर अस्थायी था: न्यायियों पर उतरा और हट गया, शाऊल पर आया और छोड़ गया। डर यही था कि आत्मा कभी भी जा सकता है। पर यहाँ परमेश्वर ठहरने की भाषा चुनते हैं और उसे "सर्वदा तक" से जोड़ते हैं। इसका मतलब आपके लिए यह है: आपकी आत्मिक सूखी सुबहें, वे दिन जब प्रार्थना में कुछ महसूस नहीं होता, आत्मा के चले जाने का प्रमाण नहीं हैं। ठहरना अनुभूति पर नहीं, वाचा पर आधारित है।
शास्त्र-संवाद
यिर्मयाह की नई वाचा की भविष्यवाणी इसी के साथ-साथ चलती है, पर वहाँ वचन मुँह में नहीं, हृदय पर लिखा जाता है; यशायाह बाहरी गवाही पर ज़ोर देते हैं, यिर्मयाह भीतरी परिवर्तन पर, और दोनों मिलकर पूरी तस्वीर बनाते हैं। दूसरी ओर इसी अध्याय की आयत 8, "शान्ति का मार्ग वे जानते ही नहीं," को पौलुस रोमियों 3 में मनुष्य के पूरे भ्रष्टाचार के सबूत के तौर पर उद्धृत करते हैं, और फिर रोमियों 11 में वही पौलुस इस अध्याय के अंत को, छुड़ानेवाले और वाचा को, इस्राएल की आशा के रूप में उद्धृत करते हैं। एक ही अध्याय, दोनों सिरे: निदान और इलाज, और पौलुस दोनों को पकड़े रहते हैं।
चिंतन
आपके मुँह से इस हफ़्ते जो निकला, उसमें से कितना आपका था और कितना परमेश्वर का रखा हुआ था?
अगर यह वाचा आपकी निष्ठा पर नहीं, परमेश्वर की "सर्वदा तक" वाली बात पर टिकी है, तो आपकी किस चिंता को आज छोड़ देना चाहिए?
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