बाइबल व्याख्या

यिर्मयाह 17:9

बाइबल

पाठ

यिर्मयाह एक वाक्य में वह कह देते हैं जो हम अपने बारे में सबसे कम सुनना चाहते हैं: "मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला होता है, उसमें असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है?" तीन बातें एक साथ: हृदय छल करता है, हृदय बीमार है, और यह बीमारी इतनी गहरी बैठी है कि कोई इसकी थाह नहीं पा सकता। यह वाक्य किसी दुश्मन के बारे में नहीं है, न किसी मूर्तिपूजक पड़ोसी देश के बारे में। यह उस भीतरी जगह के बारे में है जहाँ से आपके फैसले निकलते हैं, जिसे आप सबसे ज़्यादा प्रामाणिक मानते हैं, जिस पर आप सबसे ज़्यादा भरोसा करते हैं। और अगला पद तुरंत जोड़ता है कि एक ही है जो इस बंद कमरे में देख सकता है: "मैं यहोवा मन को खोजता और हृदय को जाँचता हूँ।"

मर्म

बाइबल में "मन" या "हृदय" भावनाओं का कोना नहीं, बल्कि पूरे व्यक्ति का नियंत्रण कक्ष है: सोच, इच्छा, निर्णय, निष्ठा। यिर्मयाह यह नहीं कह रहे कि आप कभी-कभी गलती कर बैठते हैं। वे कह रहे हैं कि आपका भीतरी न्यायाधीश स्वयं रिश्वत खाया हुआ है। इब्रानी शब्द आकोब (छल करनेवाला, टेढ़ा) वही जड़ है जिससे याकूब का नाम बना, वह आदमी जो एड़ी पकड़कर जन्मा और जीवन भर चालाकी से लड़ता रहा। हमारा हृदय याकूब जैसा है: चतुर, फुर्तीला, अपने ही स्वामी को छलता हुआ। इसीलिए पद 5 और 7 का चुनाव इतना गंभीर है। जो मनुष्य पर भरोसा रखता है वह श्रापित है, और सबसे नज़दीकी मनुष्य जिस पर आप भरोसा करते हैं, वह आप स्वयं हैं। असाध्य रोग का अर्थ यह नहीं कि परमेश्वर हार गए; अर्थ यह है कि इलाज आपके भीतर से नहीं आ सकता, केवल उस चिकित्सक से आएगा जो जाँच भी करते हैं और चंगा भी।

सूत्र

यिर्मयाह निदान देते हैं, इलाज नहीं। पद 9 एक बंद दरवाज़ा है, और उसी पुस्तक में आगे चलकर परमेश्वर वादा करते हैं कि वे अपनी व्यवस्था लोगों के हृदय पर लिखेंगे, नई वाचा में, भीतर से (यिर्मयाह 31)। ध्यान दीजिए कि पद 1 में यहूदा का पाप "हृदयरूपी पटिया" पर लोहे की टाँकी से खुदा है। वही पटिया, वही सतह। जिस पर पाप उकेरा गया है, उसी पर परमेश्वर अपना वचन उकेरना चाहते हैं। यही रेखा सीधे मसीह तक जाती है। सुसमाचारों में बार-बार कहा गया है कि यीशु को किसी की गवाही की ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि वे जानते थे कि मनुष्य के भीतर क्या है। वे उस छले हुए हृदय में उतरे जिसे कोई समझ नहीं सकता था, और क्रूस पर उसका इलाज किया, बाहर से पट्टी बाँधकर नहीं, बल्कि नया हृदय देकर।

दर्पण

यह पद आपके पापों की सूची नहीं माँगता, वह आपके अच्छे कारणों को खरोंचता है। वह नौकरी बदलने का निर्णय जिसे आपने "परिवार के भले के लिए" कहा, क्या उसमें कहीं किसी को नीचा दिखाने की भूख भी थी? वह दान जिसका ज़िक्र आपने बातों-बातों में तीन लोगों से कर दिया। वह चुप्पी जिसे आपने "समझदारी" कहा, जबकि वह डर था। वह सच जो आपने प्रेम में नहीं, बदला लेने के स्वाद के साथ बोला। सबसे डरावनी बात यह नहीं कि हम झूठ बोलते हैं; डरावनी बात यह है कि हम अपने झूठ पर स्वयं विश्वास कर लेते हैं और फिर उसे आत्मा की अगुवाई कह देते हैं। यिर्मयाह यहाँ आपकी आत्म-जाँच पर भरोसा तोड़ते हैं, ताकि आप पद 10 के उस परमेश्वर के सामने खुल जाएँ जो खोजते हैं और जाँचते हैं, और पद 14 की प्रार्थना सीख सकें।

आज यह कीजिए: एक कागज़ पर इस सप्ताह का अपना कोई एक निर्णय लिखिए और उसके नीचे वह कारण जो आपने दूसरों को बताया था। फिर परमेश्वर से ऊँची आवाज़ में कहिए, "हे यहोवा मुझे चंगा कर, तब मैं चंगा हो जाऊँगा," और चुपचाप दो मिनट बैठकर उन्हें असली कारण दिखाने दीजिए।

श्रोता

पहले सुननेवाले धर्मत्यागी नहीं, धार्मिक लोग थे। वे मन्दिर में बलि चढ़ाते थे और साथ ही हरे पेड़ों के नीचे अशेरा की वेदियों पर भी जाते थे, और उन्हें इसमें कोई विरोधाभास नहीं दिखता था। उनका हृदय उन्हें समझा चुका था कि दोनों साथ चल सकते हैं। यही इस पद की मार है: उनके लिए यह किसी नास्तिक की आलोचना नहीं थी, बल्कि उनकी अपनी भक्ति के भीतर छिपे छल का पर्दाफाश था। वे यह भी सुनते थे कि रोग "असाध्य" है, और उन्हें पता था इसका राजनीतिक अर्थ क्या है: निर्वासन, पद 4 का वह अनजाना देश। हम इसे व्यक्तिगत आत्मपरीक्षण की तरह पढ़ते हैं; उन्होंने इसे राष्ट्र की मृत्यु-सूचना की तरह सुना।

मुख्य पात्र

इस वाक्य का असली नायक वह हृदय नहीं, बल्कि वे हैं जो पद 10 में बोलते हैं। परमेश्वर यहाँ अपने बारे में एक ऐसी बात कहते हैं जो सांत्वना और खतरा, दोनों है: वे मन को खोजते और हृदय को जाँचते हैं। यह वह परमेश्वर नहीं जो केवल हमारे कामों का हिसाब रखते हैं; वे उन तहों में उतरते हैं जहाँ हमारी अपनी पहुँच नहीं। और ध्यान दीजिए, यह खोज उदासीन नहीं है। वही परमेश्वर पद 13 में "जीवन के जल के सोते" कहलाते हैं और पद 8 में उस पेड़ का वादा करते हैं जिसकी जड़ें पानी तक पहुँचती हैं। जो आपके भीतर सबसे गहरा उतरते हैं, वही सबसे गहरा सींचते भी हैं। न्यायाधीश और चिकित्सक एक ही व्यक्ति हैं।

पृष्ठभूमि

यह ईसा पूर्व सातवीं शताब्दी का अंत है, यरूशलेम में। अश्शूर ढह रहा है, बाबेल उठ रहा है, मिस्र सौदेबाज़ी कर रहा है, और यहूदा के दरबार में हर कोई हिसाब लगा रहा है कि किसके साथ संधि करने में बचाव है। पद 5 का "मनुष्य पर भरोसा" कोई दार्शनिक कथन नहीं, वह विदेश नीति थी। साथ ही मन्दिर खड़ा था, बलि चल रही थी, और लोगों को भरोसा था कि परमेश्वर अपने ही घर को गिरने नहीं देंगे। इसी आत्मसंतुष्टि के बीच यिर्मयाह खड़े होते हैं, एक ऐसा भविष्यवक्ता जिसका अपना हृदय भी टूट रहा है, जो पद 18 में अपने सतानेवालों के विनाश की माँग करता है और पद 14 में अपनी चंगाई की। वे बाहर से उपदेश नहीं दे रहे; वे उसी बीमारी के मरीज़ हैं जिसका निदान वे सुना रहे हैं।

मनन

इस सप्ताह आपने कौन सा निर्णय "परमेश्वर की अगुवाई" कहकर लिया, और क्या आप उसे परमेश्वर की जाँच के लिए फिर से खोलने को तैयार हैं?

यदि आपका हृदय आपको धोखा दे सकता है, तो आप किन ठोस तरीकों से अपने जीवन में परमेश्वर के वचन और भरोसेमंद लोगों को अपने भीतर देखने की अनुमति देते हैं?

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The Message of Jeremiah

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Jeremiah and Lamentations: An Introduction and Commentary

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Jeremiah 17:9 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यिर्मयाह 17:9 का क्या अर्थ है?
यिर्मयाह एक वाक्य में वह कह देते हैं जो हम अपने बारे में सबसे कम सुनना चाहते हैं: "मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला होता है, उसमें असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है?" तीन बातें एक साथ: हृदय छल करता है, हृदय बीमार है, और यह बीमारी इतनी गहरी बैठी है कि कोई इसकी थाह नहीं पा सकता। यह वाक्य किसी दुश्मन के बारे में नहीं है, न किसी मूर्तिपूजक पड़ोसी देश के बारे में। यह उस भीतरी जगह के बारे में है जहाँ से आपके फैसले निकलते हैं, जिसे आप सबसे ज़्यादा प्रामाणिक मानते हैं, जिस पर आप सबसे ज़्यादा भरोसा करते हैं। और अगला पद तुरंत जोड़ता है कि एक ही है जो इस बंद कमरे में देख सकता है: "मैं यहोवा मन को खोजता और हृदय को जाँचता हूँ।"
यिर्मयाह 17:9 किस विषय में है?
यिर्मयाह निदान देते हैं, इलाज नहीं। पद 9 एक बंद दरवाज़ा है, और उसी पुस्तक में आगे चलकर परमेश्वर वादा करते हैं कि वे अपनी व्यवस्था लोगों के हृदय पर लिखेंगे, नई वाचा में, भीतर से (यिर्मयाह 31)। ध्यान दीजिए कि पद 1 में यहूदा का पाप "हृदयरूपी पटिया" पर लोहे की टाँकी से खुदा है। वही पटिया, वही सतह। जिस पर पाप उकेरा गया है, उसी पर परमेश्वर अपना वचन उकेरना चाहते हैं। यही रेखा सीधे मसीह तक जाती है। सुसमाचारों में बार-बार कहा गया है कि यीशु को किसी की गवाही की ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि वे जानते थे कि मनुष्य के भीतर क्या है। वे उस छले हुए हृदय में उतरे जिसे कोई समझ नहीं सकता था, और क्रूस पर उसका इलाज किया, बाहर से पट्टी बाँधकर नहीं, बल्कि नया हृदय देकर।
यिर्मयाह 17:9 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज यह कीजिए: एक कागज़ पर इस सप्ताह का अपना कोई एक निर्णय लिखिए और उसके नीचे वह कारण जो आपने दूसरों को बताया था। फिर परमेश्वर से ऊँची आवाज़ में कहिए, "हे यहोवा मुझे चंगा कर, तब मैं चंगा हो जाऊँगा," और चुपचाप दो मिनट बैठकर उन्हें असली कारण दिखाने दीजिए।
यिर्मयाह 17:9 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इस वाक्य का असली नायक वह हृदय नहीं, बल्कि वे हैं जो पद 10 में बोलते हैं। परमेश्वर यहाँ अपने बारे में एक ऐसी बात कहते हैं जो सांत्वना और खतरा, दोनों है: वे मन को खोजते और हृदय को जाँचते हैं। यह वह परमेश्वर नहीं जो केवल हमारे कामों का हिसाब रखते हैं; वे उन तहों में उतरते हैं जहाँ हमारी अपनी पहुँच नहीं। और ध्यान दीजिए, यह खोज उदासीन नहीं है। वही परमेश्वर पद 13 में "जीवन के जल के सोते" कहलाते हैं और पद 8 में उस पेड़ का वादा करते हैं जिसकी जड़ें पानी तक पहुँचती हैं। जो आपके भीतर सबसे गहरा उतरते हैं, वही सबसे गहरा सींचते भी हैं। न्यायाधीश और चिकित्सक एक ही व्यक्ति हैं।
यिर्मयाह 17:9 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
इस सप्ताह आपने कौन सा निर्णय "परमेश्वर की अगुवाई" कहकर लिया, और क्या आप उसे परमेश्वर की जाँच के लिए फिर से खोलने को तैयार हैं?
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Jeremiah 17 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 24

पिता, धन्यवाद कि तूने विश्रामदिन देकर हमें बोझ उठाते रहने से छुड़ाया। तेरी वाणी "ध्यान धरके मेरी सुनो" हमें ठहरना सिखाती है। धन्यवाद कि तू हमारे काम से नहीं, अपनी कृपा से हमें थामे रखता है, और आज्ञा मानने में ही हमारी भलाई रखता है।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 9

पिता, मेरा अपना मन कई बार मुझे ही धोखा दे जाता है। जो सही लगता है, वह हमेशा सही नहीं होता। तू मुझे भीतर तक जानता है, इसलिए तू ही मुझे दिखा कि कहाँ मैं खुद से बहाने बना रहा हूँ। मेरे मन को साफ कर और अपनी सच्चाई में थामे रख।

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