यिर्मयाह 17
पाठ
यहूदा का पाप किसी मिटने वाली स्याही से नहीं, बल्कि "लोहे की टाँकी और हीरे की नोक से" खुदा है, हृदय की पटिया पर और वेदियों के सींगों पर। इसके बाद यिर्मयाह दो मनुष्यों का चित्र खींचते हैं: एक जो मनुष्य पर भरोसा रखता है और मरुभूमि की झाड़ी बन जाता है, दूसरा जो परमेश्वर पर भरोसा रखता है और नदी किनारे लगे वृक्ष जैसा फलता है। फिर हृदय की गहरी बीमारी, भविष्यद्वक्ता की अपनी पीड़ा भरी प्रार्थना, और अन्त में नगर के सदर फाटक पर खड़े होकर विश्रामदिन के विषय में एक तीखी चेतावनी।
मर्म
यह अध्याय एक ही प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमता है: तुम्हारा भार कौन उठाता है? यहूदा ने अपनी सुरक्षा मिस्र की संधियों, अपने राजाओं और अपनी वेदियों में ढूँढ़ी थी, और परमेश्वर उसे "श्रापित" कहते हैं। यह क्रोध का विस्फोट नहीं, यथार्थ का वर्णन है: जो सोता से कट जाता है वह सूख जाता है, चाहे वह इसे स्वीकारे या न करे। और सबसे असहज बात यह है कि पाप बाहर की वेदियों से पहले भीतर हृदय पर खुदा है। इसीलिए परमेश्वर कहते हैं कि वे "मन को खोजता और हृदय को जाँचता" हैं। धर्म का बाहरी ढाँचा अछूता रह सकता है जबकि भीतर की जड़ें सूख चुकी हों।
सूत्र
पद 9 में जिस शब्द का अनुवाद "धोखा देनेवाला" हुआ है, वह इब्रानी में आकोब है, वही ध्वनि जो याकूब के नाम में गूँजती है, वह छल करने वाला पुरुष जिसका नाम परमेश्वर ने बदला। यानी यह केवल यहूदा की समस्या नहीं, यह पूरे मानव वंश की कहानी है, और इसका इलाज केवल परमेश्वर के हाथ में है। यिर्मयाह इसका उत्तर नहीं दे पाते, वे केवल पुकारते हैं: "हे यहोवा मुझे चंगा कर, तब मैं चंगा हो जाऊँगा।" उसी यिर्मयाह को आगे चलकर नई वाचा का वचन मिलेगा, जहाँ व्यवस्था पत्थर पर नहीं हृदय पर लिखी जाएगी। मसीह में वही हुआ: जिस हृदय-पटिया पर पाप खुदा था, उसी पर परमेश्वर अपनी उँगली से क्षमा लिखते हैं।
दर्पण
"जिसका मन यहोवा से भटक जाता है" यह भटकना शायद ही कभी नाटकीय होता है। यह उस क्षण में होता है जब आप नौकरी की असुरक्षा में सबसे पहले किसी प्रभावशाली परिचित को फोन मिलाते हैं, प्रार्थना बाद में। जब आप बच्चों के भविष्य की गणना बीमा और डिग्री के आधार पर करते हैं, और यह सोचकर चैन पाते हैं। पद 11 का तीतर, जो दूसरे के अंडे सेता है और अन्त में खाली रह जाता है, वह हर उस व्यक्ति का चित्र है जिसने आधी उम्र गँवाकर पाया कि जो जमा किया था वह उसका था ही नहीं। यिर्मयाह पूछते हैं: सूखे वर्ष में आपके पत्ते हरे रहेंगे या नहीं? उत्तर आज नहीं, उस वर्ष मिलेगा।
प्रसंग
कल्पना कीजिए: यरूशलेम, सातवीं सदी ईसा पूर्व का अन्तिम भाग। बाबेल पूर्व में उठ रहा है, मिस्र दक्षिण में सौदेबाज़ी कर रहा है, और दाऊद के वंश का राजा एक छोटे से राज्य पर बैठा है जो बड़ी शक्तियों के बीच पिस रहा है। पहाड़ी टीलों पर हरे पेड़ों के नीचे अशेरा के खम्भे खड़े हैं, और यहोवा के मन्दिर में भी बलिदान चल रहे हैं, दोनों साथ-साथ। लोगों को लगता है मन्दिर ही उनकी गारंटी है। यिर्मयाह को इसी भीड़ के बीच, सदर फाटक पर खड़ा किया जाता है, जहाँ व्यापारी बोझ लादे आते-जाते हैं, जहाँ न्याय होता है और सौदे पटते हैं। शहर का सबसे व्यस्त कोना, सबसे असुविधाजनक मंच।
अन्तर्पाठ
भजन संहिता का पहला भजन लगभग यही चित्र देता है: दुष्टों की सलाह से दूर रहने वाला मनुष्य बहती नदियों के किनारे लगे वृक्ष जैसा है। पर यिर्मयाह एक कड़ी बात जोड़ते हैं जो वहाँ नहीं है, "सूखे वर्ष" की। यानी सूखा आएगा ही; प्रश्न यह नहीं कि आप संकट से बचेंगे, प्रश्न यह है कि आपकी जड़ें कहाँ तक पहुँची हैं। दूसरी ओर, यूहन्ना के सुसमाचार में यीशु मसीह पर्व के बीच खड़े होकर पुकारते हैं कि प्यासा उनके पास आए, और उनमें से जीवन के जल की नदियाँ बहेंगी। यिर्मयाह जिस "जीवन के जल के सोते" को छोड़े जाने का शोक मनाते हैं, वह सोता एक दिन स्वयं चलकर उसी मन्दिर के आँगन में आ खड़ा हुआ।
श्रोता
जो लोग फाटक पर यह सुन रहे थे, वे धर्मत्यागी नास्तिक नहीं थे। वे उपासक थे, बलिदान लाने वाले लोग। उनके कानों में पद 25 का वचन सबसे तेज़ बजा होगा: दाऊद की गद्दी, रथ, घोड़े, फाटकों से आता-जाता राजसी जुलूस। यह उनका राष्ट्रीय स्वप्न था, और यिर्मयाह उसे विश्रामदिन जैसी छोटी सी बात से जोड़ देते हैं। उन्हें यह अपमानजनक लगा होगा। पर विश्रामदिन कोई नियम-पालन की परीक्षा नहीं था, वह एक साप्ताहिक स्वीकारोक्ति थी कि यह देश हमारी मेहनत से नहीं, परमेश्वर के दान से चलता है। बोझ उठाकर फाटक से घुसना कहना था: हम अपना जीवन स्वयं सँभालेंगे। और परमेश्वर ने कहा, तब फाटक ही जल जाएँगे। कुछ ही वर्षों बाद वे सचमुच जल गए।
चिन्तन
आपके जीवन का कौन-सा "सूखा वर्ष" यह दिखाएगा कि आपकी जड़ें असल में कहाँ तक पहुँची हैं?
आपके सप्ताह में ऐसा कौन-सा ठहराव है जो सचमुच स्वीकार करता है कि सब कुछ आप पर टिका नहीं है?
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Jeremiah 17 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
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