बाइबल व्याख्या

अय्यूब 19

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पाठ

अय्यूब की सबसे गहरी चोट किसी बड़े नुकसान में नहीं, बल्कि एक छोटे-से वाक्य में छिपी है: "मेरी साँस मेरी स्त्री को और मेरी गन्ध मेरे भाइयों की दृष्टि में घिनौनी लगती है।" यहीं से यह अध्याय समझ में आता है। अय्यूब अपने मित्रों की ओर मुड़कर पूछता है कि वे कब तक उसे बातों से चूर-चूर करते रहेंगे, और फिर बताता है कि परमेश्वर ने ही उसका मार्ग रूंधा, उसका मुकुट उतारा, उसकी आशा को वृक्ष के समान उखाड़ डाला। भाई, कुटुम्बी, मित्र, दास, बच्चे, सब दूर हट गए हैं; वह अपने ही घर में परदेशी है। इसी अंधकार के बीच वह चाहता है कि उसकी बातें चट्टान पर सदा के लिये खोदी जातीं, और तब वह अचानक घोषणा करता है: "मेरा छुड़ानेवाला जीवित है।"

मूल बात

यह अध्याय हमें एक ऐसे विश्वास के सामने खड़ा करता है जो अपने विरोधाभास को हल नहीं करता, बल्कि उसे थामे रहता है। अय्यूब यह नहीं कहता कि परमेश्वर निर्दोष हैं और उसकी पीड़ा किसी और की करनी है; वह साफ कहता है कि "परमेश्वर ने मुझे मारा है।" और उसी सांस में वह उसी परमेश्वर को अपना छुड़ानेवाला कहता है। यह भोली आशा नहीं, न ही दर्द से बचने का रास्ता; यह घाव के भीतर से उठी पुकार है। यहाँ परमेश्वर के बारे में कुछ ऐसा कहा जा रहा है जिसे धर्मशास्त्र की साफ-सुथरी भाषा में समेटना कठिन है: वे ही जो प्रहार करते प्रतीत होते हैं, वे ही अन्त में पृथ्वी पर खड़े होंगे। और अय्यूब की आशा किसी सुधरी हुई परिस्थिति की नहीं है, बल्कि दर्शन की: "मैं शरीर में होकर परमेश्वर का दर्शन पाऊँगा।" वह मुक़दमा जीतना नहीं चाहता; वह उस चेहरे को देखना चाहता है जिसने उसे तोड़ा।

जोड़ने वाला धागा

"छुड़ानेवाला" के पीछे जो इब्रानी शब्द है, गोएल, वह अदालत और परिवार की दुनिया से आता है। गोएल वह निकट संबंधी था जिसका कर्तव्य था कि गिरे हुए भाई का कर्ज चुकाए, उसकी बिकी हुई भूमि छुड़ाए, उसके खून का बदला माँगे। रूत की कहानी में बोअज ठीक यही भूमिका निभाता है। अय्यूब, जिसके सब भाई और कुटुम्बी उससे दूर हट चुके हैं, यह दावा करता है कि उसका एक संबंधी बाकी है, और वह जीवित है। जिस समाज में सारे रिश्ते टूट गए, वहाँ परमेश्वर स्वयं निकटतम रिश्तेदार बन जाते हैं। यहीं से वह धागा सीधे उस देह तक जाता है जो हमारी जाति में से ली गई: यीशु मसीह, जो हमारा भाई बनकर हमारा कर्ज चुकाते हैं और अन्त में सचमुच पृथ्वी पर खड़े होंगे। अय्यूब जो अंधेरे में टटोलकर कहता है, सुसमाचार उसे नाम देता है।

आयना

इस अध्याय की सबसे असहज बात मित्रों का व्यवहार है। वे झूठ नहीं बोल रहे; वे धर्मशास्त्र बोल रहे हैं, और उसी से अय्यूब चूर-चूर हो रहा है। हम भी वही करते हैं: अस्पताल के बिस्तर के पास खड़े होकर कारण खोजते हैं, तलाक की खबर सुनकर मन में फाइल बनाते हैं कि गलती किसकी थी, बेरोजगार दोस्त को सलाह देते हैं जब उसे केवल साथ चाहिए था। अय्यूब की पुकार "मुझ पर दया करो, दया करो" हमारी व्याख्याओं को तोड़ती है। और दूसरी ओर, यदि आप ही अय्यूब की जगह हैं, तो यह अध्याय आपको यह अनुमति देता है कि आप अपनी शिकायत परमेश्वर के मुँह पर कह सकें और उसी सांस में उन्हें अपना छुड़ानेवाला भी कह सकें। आज एक कागज लें, उस पर एक वाक्य में अपनी सबसे कड़वी शिकायत ईमानदारी से लिखें, और उसके नीचे लिखें: "मुझे तो निश्चय है, कि मेरा छुड़ानेवाला जीवित है।" कागज को अपनी बाइबल में रख दें।

कठिन प्रश्न

पद 26 को ध्यान से पढ़िए: "अपनी खाल के इस प्रकार नाश हो जाने के बाद भी, मैं शरीर में होकर परमेश्वर का दर्शन पाऊँगा।" क्या अय्यूब मृत्यु के बाद के पुनरुत्थान की बात कर रहा है, या इसी जीवन में स्वास्थ्य लौटने की? पाठ इसे खुला छोड़ता है, और यही ईमानदार बात है। इससे भी कठिन यह है कि इतनी ऊँची घोषणा के बाद अध्याय शान्ति में नहीं, धमकी में समाप्त होता है: "तो तुम तलवार से डरो।" विश्वास का शिखर छूकर अय्यूब फिर गुस्से में लौट आता है। हमारी गवाहियाँ आमतौर पर यहाँ समाप्त होती हैं जहाँ सब सुलझ जाता है; यह पाठ ऐसा नहीं करता। शायद इसलिए कि विश्वास एक सीधी चढ़ाई नहीं, बल्कि अंधेरे में बार-बार वही एक वाक्य दोहराना है।

शास्त्र की गूँज

अय्यूब जो चाहता है, वह उसे अध्याय 42 में मिलता है: वहाँ वह कहता है कि पहले उसने कानों से सुना था, अब आँखों से देखता है। और जब वह देखता है, तो उसे कोई उत्तर नहीं मिलता, केवल उपस्थिति। इसे भजन 22 के साथ रखिए, जहाँ पुकारने वाला परमेश्वर से पूछता है कि उन्होंने उसे क्यों छोड़ दिया, और फिर उसी परमेश्वर की स्तुति मंडली के बीच करने का संकल्प करता है। वही दोहरी आवाज़, वही शिकायत और भरोसा एक साथ। क्रूस पर यीशु मसीह उसी भजन का पहला वाक्य पुकारते हैं, परमेश्वर से त्यागे जाकर, परमेश्वर को ही पुकारते हुए। अय्यूब की भाषा किसी अकेले आदमी की सनक नहीं; यह उस प्रार्थना की परंपरा है जिसका अन्तिम रूप गोलगोथा पर सुनाई देता है।

एक बारीकी

पद 23 और 24 की इच्छा पर रुकिए। अय्यूब कागज नहीं चाहता, वह चट्टान चाहता है: "लोहे की टाँकी और सीसे से वे सदा के लिये चट्टान पर खोदी जातीं।" उस समय ऐसे शिलालेख राजा अपनी विजयों के लिए बनवाते थे। अय्यूब अपनी विजय नहीं, अपनी शिकायत को पत्थर में गड़वाना चाहता है, ताकि उसकी मृत्यु के बाद भी गवाही खड़ी रहे। यही उसकी सबसे गहरी पीड़ा है: कि वह चुपचाप मिट जाएगा और उसका मुँह हमेशा के लिए बंद कर दिया जाएगा। और यहाँ पाठ की सबसे शान्त विडंबना है: उसकी इच्छा पूरी हुई। हम आज उसके शब्द पढ़ रहे हैं, हजारों साल बाद, पुस्तक में लिखे हुए। परमेश्वर ने उसकी शिकायत को मिटाया नहीं, उसे शास्त्र बना दिया।

चिंतन के प्रश्न

जब आपने पिछली बार किसी दुखी व्यक्ति के साथ बैठकर बात की, तो आप अय्यूब के मित्रों की तरह समझा रहे थे या केवल साथ थे?

अगर आपकी सबसे ईमानदार शिकायत चट्टान पर खुद जाती, तो क्या आप उसके नीचे "मेरा छुड़ानेवाला जीवित है" लिखने का साहस करते?

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Job 19 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

अय्यूब 19 का क्या अर्थ है?
अय्यूब की सबसे गहरी चोट किसी बड़े नुकसान में नहीं, बल्कि एक छोटे-से वाक्य में छिपी है: "मेरी साँस मेरी स्त्री को और मेरी गन्ध मेरे भाइयों की दृष्टि में घिनौनी लगती है।" यहीं से यह अध्याय समझ में आता है। अय्यूब अपने मित्रों की ओर मुड़कर पूछता है कि वे कब तक उसे बातों से चूर-चूर करते रहेंगे, और फिर बताता है कि परमेश्वर ने ही उसका मार्ग रूंधा, उसका मुकुट उतारा, उसकी आशा को वृक्ष के समान उखाड़ डाला। भाई, कुटुम्बी, मित्र, दास, बच्चे, सब दूर हट गए हैं; वह अपने ही घर में परदेशी है। इसी अंधकार के बीच वह चाहता है कि उसकी बातें चट्टान पर सदा के लिये खोदी जातीं, और तब वह अचानक घोषणा करता है: "मेरा छुड़ानेवाला जीवित है।"
अय्यूब 19 किस विषय में है?
"छुड़ानेवाला" के पीछे जो इब्रानी शब्द है, गोएल, वह अदालत और परिवार की दुनिया से आता है। गोएल वह निकट संबंधी था जिसका कर्तव्य था कि गिरे हुए भाई का कर्ज चुकाए, उसकी बिकी हुई भूमि छुड़ाए, उसके खून का बदला माँगे। रूत की कहानी में बोअज ठीक यही भूमिका निभाता है। अय्यूब, जिसके सब भाई और कुटुम्बी उससे दूर हट चुके हैं, यह दावा करता है कि उसका एक संबंधी बाकी है, और वह जीवित है। जिस समाज में सारे रिश्ते टूट गए, वहाँ परमेश्वर स्वयं निकटतम रिश्तेदार बन जाते हैं। यहीं से वह धागा सीधे उस देह तक जाता है जो हमारी जाति में से ली गई: यीशु मसीह, जो हमारा भाई बनकर हमारा कर्ज चुकाते हैं और अन्त में सचमुच पृथ्वी पर खड़े होंगे। अय्यूब जो अंधेरे में टटोलकर कहता है, सुसमाचार उसे नाम देता है।
अय्यूब 19 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पद 26 को ध्यान से पढ़िए: "अपनी खाल के इस प्रकार नाश हो जाने के बाद भी, मैं शरीर में होकर परमेश्वर का दर्शन पाऊँगा।" क्या अय्यूब मृत्यु के बाद के पुनरुत्थान की बात कर रहा है, या इसी जीवन में स्वास्थ्य लौटने की? पाठ इसे खुला छोड़ता है, और यही ईमानदार बात है। इससे भी कठिन यह है कि इतनी ऊँची घोषणा के बाद अध्याय शान्ति में नहीं, धमकी में समाप्त होता है: "तो तुम तलवार से डरो।" विश्वास का शिखर छूकर अय्यूब फिर गुस्से में लौट आता है। हमारी गवाहियाँ आमतौर पर यहाँ समाप्त होती हैं जहाँ सब सुलझ जाता है; यह पाठ ऐसा नहीं करता। शायद इसलिए कि विश्वास एक सीधी चढ़ाई नहीं, बल्कि अंधेरे में बार-बार वही एक वाक्य दोहराना है।
अय्यूब 19 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पद 23 और 24 की इच्छा पर रुकिए। अय्यूब कागज नहीं चाहता, वह चट्टान चाहता है: "लोहे की टाँकी और सीसे से वे सदा के लिये चट्टान पर खोदी जातीं।" उस समय ऐसे शिलालेख राजा अपनी विजयों के लिए बनवाते थे। अय्यूब अपनी विजय नहीं, अपनी शिकायत को पत्थर में गड़वाना चाहता है, ताकि उसकी मृत्यु के बाद भी गवाही खड़ी रहे। यही उसकी सबसे गहरी पीड़ा है: कि वह चुपचाप मिट जाएगा और उसका मुँह हमेशा के लिए बंद कर दिया जाएगा। और यहाँ पाठ की सबसे शान्त विडंबना है: उसकी इच्छा पूरी हुई। हम आज उसके शब्द पढ़ रहे हैं, हजारों साल बाद, पुस्तक में लिखे हुए। परमेश्वर ने उसकी शिकायत को मिटाया नहीं, उसे शास्त्र बना दिया।
अय्यूब 19 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
अगर आपकी सबसे ईमानदार शिकायत चट्टान पर खुद जाती, तो क्या आप उसके नीचे "मेरा छुड़ानेवाला जीवित है" लिखने का साहस करते?
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Job 19 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 22

अय्यूब अपने मित्रों से कहता है, "तुम क्यों परमेश्वर के समान मुझे सताते हो? और मेरे माँस से क्यों तृप्त नहीं हुए?" घाव पहले से खुला है, और शब्द उसमें नमक भर रहे हैं। सोचो, कहीं तुम्हारी सही बात किसी टूटे हुए इंसान पर परमेश्वर का हाथ बनकर तो नहीं गिर रही? कभी-कभी दुखी व्यक्ति को उत्तर नहीं, बस साथ बैठा कोई चाहिए।

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