अय्यूब 25
पाठ
बिल्दद तीसरी और अन्तिम बार बोलता है, और उसका भाषण चौंकाने वाला छोटा है: केवल पाँच पद। वह परमेश्वर की ऊँचाई का बखान करता है, उसकी अगिनत सेनाओं का, उसके प्रकाश का जिससे कोई नहीं बचता, और फिर वही पुराना प्रश्न दोहराता है: "फिर मनुष्य परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी कैसे ठहर सकता है?" उसका निष्कर्ष निर्दयी है: यदि परमेश्वर की दृष्टि में चन्द्रमा और तारे भी मैले हैं, तो मनुष्य क्या है, "जो कीड़ा है", "जो केंचुआ है"।
मर्म
बिल्दद जो कहता है, उसमें एक भी वाक्य झूठा नहीं है। परमेश्वर वास्तव में ऊँचा है, उसकी पवित्रता वास्तव में हमारी नैतिक सफ़ाई से बड़ी है, और मनुष्य वास्तव में अपने बल से उसके सामने खड़ा नहीं हो सकता। समस्या सत्य में नहीं, सत्य के इस्तेमाल में है। बिल्दद परमेश्वर की महानता को इस तरह उठाता है कि उसके नीचे एक दुखी आदमी दब जाए। उसका परमेश्वर "प्रभुता करना और डराना" तो जानता है, पर अपने ऊँचे स्थानों में इतनी दूर बैठा है कि नीचे किसी की सिसकी उस तक नहीं पहुँचती। यही धर्मशास्त्र का सबसे सूक्ष्म पाप है: परमेश्वर के बारे में सही बात कहकर उस व्यक्ति को चुप कर देना जिसके लिए परमेश्वर ने बोलना चाहा था।
सूत्र
बिल्दद का प्रश्न हवा में लटका रह जाता है, और पूरी बाइबल उसी प्रश्न का उत्तर बनकर आगे बढ़ती है। "जो स्त्री से उत्पन्न हुआ है वह कैसे निर्मल हो सकता है?" ठीक इसी भाषा में पौलुस गलातियों में लिखता है कि समय पूरा होने पर परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा, जो स्त्री से जन्मा। एक स्त्री से जन्मा व्यक्ति सचमुच निर्मल निकला, और वही निर्मलता उन पर डाल दी गई जो कीड़े जैसे थे। अय्यूब इससे पहले ही एक ऐसे बिचवई के लिए तरस रहा था जो परमेश्वर और मनुष्य के बीच हाथ रख सके। बिल्दद कहता है, ऐसा कोई नहीं। सुसमाचार कहता है, ऐसा एक है।
आत्मदर्शन
अब आप स्वयं को पहचानिए, और सम्भव है दो जगहों पर पहचानें। पहली: वह क्षण जब आपके सामने कोई ऐसा दुख आता है जिसे आप ठीक नहीं कर सकते, कैंसर की रिपोर्ट, टूटी शादी, वह बेटा जो लौटता नहीं, और आप घबराकर एक सच्चा वाक्य बोल देते हैं जो बातचीत बन्द कर देता है। "परमेश्वर सर्वसामर्थी है।" सच है। पर आपने वह इसलिए कहा कि चुप बैठकर सुनना असहनीय था। बिल्दद का भाषण छोटा है क्योंकि उसके पास शब्द चुक गए हैं, फिर भी वह चुप नहीं होता।
दूसरी जगह: रात के दो बजे, जब आपको लगता है कि आप वास्तव में कीड़ा हैं। नौकरी में जिसने आपको बदल दिया, शरीर जिसने साथ छोड़ा, वह पाप जो लौट-लौट आता है। बिल्दद का ईश्वर आपको उसी गड्ढे में छोड़ देता है। मसीह उस गड्ढे में उतरता है।
प्रसंग
यह भाषणों के तीसरे चक्र का हिस्सा है, और चक्र टूट रहा है। शुरू में बिल्दद के भाषण लम्बे और तर्कसंगत थे; अब पाँच पदों में सिमट गए हैं। सोफर के लिए तीसरी बारी ही नहीं आती। मित्रों का गोला-बारूद खत्म हो चुका है, पर वे अपनी बात वापस नहीं ले सकते, क्योंकि उस संस्कृति में सार्वजनिक बहस में हारना इज़्ज़त खोना था। अय्यूब राख पर बैठा है, समाज से कटा, और तीन प्रतिष्ठित पुरुष उसके सामने खड़े हैं जिनकी साख इस पर टिकी है कि अय्यूब दोषी सिद्ध हो। ध्यान दीजिए, इस पूरे अध्याय में बिल्दद अय्यूब का नाम नहीं लेता, कोई आरोप नहीं लगाता। वह ब्रह्माण्ड की ऊँचाई पर चला जाता है, क्योंकि वहाँ से नीचे देखना आसान है।
बारीकी
"कीड़ा" और "केंचुआ" दो अलग शब्द हैं। दूसरे शब्द के पीछे इब्रानी शब्द रिम्माह है, और यह कोई बगीचे का मासूम केंचुआ नहीं है। रिम्माह वह लट है जो सड़ते माँस में पैदा होती है, वही शब्द जो जंगल में पड़े मन्ना के खराब होने पर इस्तेमाल हुआ था। बिल्दद कह रहा है: मनुष्य केवल छोटा नहीं, वह गलन का उत्पाद है। और यह ठीक उस आदमी से कहा जा रहा है जिसका शरीर फोड़ों से भरा है, जो अपनी देह के सड़ने को दिन-रात देख रहा है। यह धर्मशास्त्र नहीं, यह चोट है। सच्ची बात, गलत घाव पर, गलत समय पर रखी गई।
अन्तर्पाठ
भजन संहिता का आठवाँ भजन ठीक यही प्रश्न पूछता है, "मनुष्य क्या है", पर उसका उत्तर उलटा है: परमेश्वर उसे याद करता है, उसे महिमा और प्रताप का मुकुट पहनाता है। एक ही प्रश्न, दो ईश्वर-चित्र। और भजन बाईस में वह जन कहता है, "मैं कीड़ा हूँ, मनुष्य नहीं", और नए नियम में वह वाक्य क्रूस पर लटके मसीह का बन जाता है। बिल्दद ने मनुष्य को कीड़ा कहकर परमेश्वर से दूर धकेला। परमेश्वर का पुत्र स्वयं कीड़ा बनकर उस दूरी को पार कर गया।
चिन्तन
पिछली बार आपने किसी दुखी व्यक्ति से कोई सच्ची बात कब कही थी, केवल इसलिए कि चुप रहना आपको असहनीय लग रहा था?
यदि आप ईमानदारी से देखें, तो आपके भीतर का परमेश्वर बिल्दद के ऊँचे स्थानों में बैठा है, या राख के ढेर पर आपके पास?
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Job 25 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, बिलदद का प्रश्न "फिर मनुष्य परमेश्वर की दृष्टि में क्योंकर धर्मी ठहर सकता है?" मेरे भीतर भी गूँजता है। धन्यवाद कि इसका उत्तर मेरे कामों में नहीं, मसीह के लहू में मिला। आपने मुझे निर्मल ठहराया, जबकि मैं स्वयं को साफ़ नहीं कर सकता था।
पिता, आपकी पवित्रता के सामने चाँद और तारे भी उज्ज्वल नहीं, और मैं तो कीड़ा जैसा हूँ। धन्यवाद कि आपने इस छोटे से जीवन को नज़रअंदाज़ नहीं किया, बल्कि मेरा नाम पुकारा और अपने लहू से मुझे शुद्ध किया। यह अनुग्रह मेरी समझ से बड़ा है।
तब शूही बिलदद ने कहा," और यही उसका आखिरी बार बोलना है। सिर्फ छह आयतें, फिर हमेशा की चुप्पी। तीनों दोस्तों के शब्द चुक गए, क्योंकि उनके पास सही बातें तो थीं, पर टूटे हुए आदमी के लिए दिल नहीं था। तुम्हारी बातें भी सोचो, किसी के घाव पर मरहम हैं, या बस सही जवाब?
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