अय्यूब 42
पाठ
अय्यूब आखिरकार चुप होता है, पर खाली हाथ नहीं। वह स्वीकार करता है कि परमेश्वर सब कुछ कर सकते हैं, कि उसने ऐसी बातें कहीं जो उसकी समझ से बाहर थीं, और वह कहता है: "मैंने कानों से तेरा समाचार सुना था, परन्तु अब मेरी आँखें तुझे देखती हैं।" फिर कहानी अचानक मुड़ती है। परमेश्वर का क्रोध अय्यूब पर नहीं, बल्कि उसके तीनों धर्मशास्त्री मित्रों पर भड़कता है, और उन्हें बलि लेकर अय्यूब के पास जाना पड़ता है, क्योंकि केवल उसी की प्रार्थना ग्रहण की जाएगी। जब अय्यूब अपने मित्रों के लिये प्रार्थना करता है, तब उसका दुःख दूर होता है और उसे पहले से दुगना मिलता है: पशु, परिवार, नाम वाली बेटियाँ, और चार पीढ़ियों तक जीवन।
मूल मर्म
ध्यान दीजिए कि परमेश्वर किसे गलत ठहराते हैं। मित्रों ने सही सुनाई देने वाली बातें कहीं: परमेश्वर न्यायी हैं, पाप दण्ड लाता है, इसलिए पीड़ित दोषी होगा। अय्यूब ने चिल्लाकर, शिकायत करके, परमेश्वर को कठघरे में खड़ा करके बात की। और फिर भी परमेश्वर कहते हैं, "जैसी ठीक बात मेरे दास अय्यूब ने मेरे विषय कही है, वैसी तुम लोगों ने नहीं कही।" परमेश्वर उस ईमानदार संघर्ष को स्वीकार करते हैं जो उनकी ओर मुड़ा हुआ है, और उस साफ-सुथरे धर्मशास्त्र को ठुकराते हैं जो उनके पीछे-पीछे बोलता है। इससे भी गहरी बात यह है कि अय्यूब का उद्धार उसके अपने लिये नहीं, बल्कि दूसरों के लिये प्रार्थना करने पर आता है। घाव अभी भरा नहीं था जब उसे अपने दोष लगाने वालों के बीच खड़ा होकर उनकी ओर से बोलना पड़ा। यहाँ कृपा लेन-देन का हिसाब तोड़ देती है।
सूत्र
यह अध्याय एक ऐसा दृश्य खड़ा करता है जो बाइबल में बार-बार लौटता है: एक निर्दोष पीड़ित व्यक्ति अपने दोष लगाने वालों और परमेश्वर के बीच खड़ा होता है, और उसकी प्रार्थना उन्हें बचाती है। बैल और मेढ़े चढ़ाए जाते हैं, पर पाठ साफ कहता है कि निर्णायक बात बलि नहीं है: "उसी की प्रार्थना मैं ग्रहण करूँगा।" बलि के साथ एक मध्यस्थ चाहिए, और वह मध्यस्थ वही है जिसने सबसे अधिक सहा है। यशायाह 53 में सेवक के विषय ठीक यही कहा गया है कि वह अपराधियों के लिये विनती करता है, और क्रूस पर यीशु मसीह अपने मारने वालों की क्षमा के लिये पिता से बोलते हैं। अय्यूब उद्धारकर्ता नहीं है; वह धूलि और राख में पश्चाताप करता है। पर वह उस आकृति की छाया है जो पूरी होकर आएगी: वह जो दुःख से गुज़रा और उसी कारण दूसरों के लिये बोल सकता है।
दर्पण
जिन मित्रों को परमेश्वर डाँटते हैं, वे बुरे लोग नहीं थे। वे सात दिन चुपचाप बैठे रहे थे। फिर उन्होंने बोलना शुरू किया, और यहीं गड़बड़ हुई। हम भी वही करते हैं। किसी की नौकरी छूटती है, किसी के बच्चे की जाँच रिपोर्ट आती है, और हमारे भीतर कारण खोजने की मशीन चालू हो जाती है, क्योंकि कारण मिल जाए तो डर कम हो जाता है। अगर उसकी गलती थी, तो मैं सुरक्षित हूँ। यह पाठ उस सुरक्षा को छीन लेता है। और दूसरी ओर, अय्यूब की जगह खड़े होकर पूछिए: जिन्होंने आपको गलत आँका, जिन्होंने आपके दुःख को आपका दोष बताया, क्या आप उनके लिये परमेश्वर से बात कर सकते हैं? अय्यूब की बहाली वहीं से शुरू हुई। आज एक काम कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसने आपके कठिन समय में आपको चोट पहुँचाई, और ज़ोर से, नाम लेकर, उसकी भलाई के लिये एक वाक्य की प्रार्थना कीजिए।
अन्तर्पाठ
नया नियम अय्यूब को एक बार सीधे याद करता है, याकूब की पत्री में, जहाँ उसके धीरज और प्रभु के अन्त में दिखाए गए करुणा-भरे व्यवहार की बात होती है। ध्यान दीजिए, याकूब "समझ" की नहीं, "अन्त" की बात करते हैं: परमेश्वर ने अय्यूब को उत्तर नहीं, उपस्थिति दी। दूसरी गूँज और भी तीखी है। लूका के सुसमाचार में क्रूस पर लटके यीशु मसीह उन्हीं के लिये क्षमा माँगते हैं जिन्होंने उन्हें वहाँ चढ़ाया। अय्यूब की प्रार्थना अपने आरोप लगाने वालों के लिये उसी दिशा में इशारा करती है, पर एक बड़े अन्तर के साथ: अय्यूब को प्रार्थना करने के बाद दुगना मिला, मसीह ने प्रार्थना करते हुए सब कुछ खो दिया, ताकि दुगना हमें मिले।
पहले सुनने वाले
पहले पाठक ऐसे समाज में रहते थे जहाँ यह मान्यता पत्थर की लकीर थी: धर्मी फलता-फूलता है, दुष्ट नष्ट होता है। मन्दिर, बलि, याजक, सब इसी व्यवस्था के इर्द-गिर्द घूमते थे। उनके कानों में सबसे चौंकाने वाली बात यह नहीं थी कि अय्यूब को दुगना मिला, बल्कि यह थी कि परमेश्वर ने उन तीनों को, जो हर वाक्य में परमेश्वर का बचाव कर रहे थे, "मूर्खता" का दोषी ठहराया। और उससे भी बड़ी बात: अय्यूब इस्राएली नहीं था, न याजक था, फिर भी परमेश्वर ने उसकी प्रार्थना ग्रहण की। निर्वासन से लौटे लोगों के लिये, जिन्होंने अपनी पीड़ा का कोई साफ हिसाब नहीं पाया था, यह पाठ साँस लेने की जगह था: परमेश्वर के सामने रोना विश्वासघात नहीं है।
एक बारीकी
बेटों के नाम नहीं लिखे गए, बेटियों के लिखे गए, और कैसे नाम। यमीमा का अर्थ कबूतरी या दिन के उजाले से जुड़ा है, कसीआ एक सुगन्धित मसाले का नाम है, और केरेन्हप्पूक का अर्थ है काजल रखने की डिबिया। धूलि और राख में पश्चाताप करने वाला आदमी अपनी बेटियों के नाम इत्र और सौन्दर्य के शब्दों से रखता है। यह विवरण सजावट नहीं, गवाही है: वह आदमी जो अपने जन्मदिन को शाप दे चुका था, अब जीवन को नाम देता है। और आगे लिखा है कि उसने उन्हें "उनके भाइयों के संग ही सम्पत्ति दी", जो उस युग में लगभग अनसुना था। परमेश्वर से मिलने के बाद अय्यूब केवल धनी नहीं हुआ, वह उदार हुआ, और उसकी उदारता ने पुराने नियमों को तोड़ा।
मनन
मैं दूसरों के दुःख को समझाने की कोशिश क्यों करता हूँ, और उस कोशिश के पीछे मेरा अपना कौन सा डर छिपा है?
"मैंने कानों से तेरा समाचार सुना था, परन्तु अब मेरी आँखें तुझे देखती हैं": मेरे जीवन में कौन सी बात अभी तक केवल सुनी हुई है, और मैं उसे देखने की इच्छा कहाँ से शुरू कर सकता हूँ?
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Job 42 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Job 42 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
अय्यूब के किसी भी "क्यों" का जवाब परमेश्वर ने नहीं दिया। फिर भी वह कहता है, "मैंने तो जो नहीं समझता था वही कहा।" उसकी शांति उत्तर मिलने से नहीं, परमेश्वर के मिलने से आई। कभी कभी हमारा मन भी चुप तब होता है जब सब समझ आ जाए, पर असली चैन तब है जब हम कहें, मुझे समझ नहीं आता, फिर भी तू भला है।
पिता, कितनी बड़ी बात है कि जिनसे मुझे चोट पहुँची, उनके लिए भी मैं प्रार्थना कर सकता हूँ। मेरे मन की कड़वाहट को नरम कर दे, और जब कोई मेरे लिए दुआ माँगे तो मुझे भी झुकना सिखा। तेरी क्षमा हम सबको फिर से जोड़ दे।
अय्यूब ने परमेश्वर से बहस की, चिल्लाया, सवाल किए। उसके मित्रों ने शालीन धर्मशास्त्र सुनाया। फिर भी परमेश्वर कहते हैं, "तुम लोगों ने मेरे विषय में मेरे दास अय्यूब की सी सच्ची बात नहीं कही।" सोच, कहीं तुम्हारी सजी सजी बातें उस टूटी हुई ईमानदार पुकार से कमज़ोर तो नहीं, जो परमेश्वर से मुँह मोड़े बिना रोती है?
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