यूहन्ना 14:13
पाठ
यीशु अपने शिष्यों से विदा लेने की घड़ी में एक ऐसा वादा करते हैं जो लगभग असंभव लगता है: "और जो कुछ तुम मेरे नाम से माँगोगे, वही मैं करूँगा।" जो कुछ भी। कोई सूची नहीं, कोई शर्तों की लंबी फेहरिस्त नहीं, बस एक नाम, उनका अपना नाम। और फिर वे तुरंत इस वादे का उद्देश्य भी बता देते हैं, ताकि कोई इसे अपने मनचाहे खजाने की चाबी न समझ बैठे: "कि पुत्र के द्वारा पिता की महिमा हो।" यानी माँगना यहाँ कोई निजी लेनदेन नहीं, बल्कि उस बड़े काम में शामिल होना है जो पिता अपने पुत्र के ज़रिये संसार में कर रहे हैं। पिछले पद में जिन "बड़े कामों" का ज़िक्र हुआ, प्रार्थना उन्हीं की जड़ है।
मूल बात
यह पद हमारी प्रार्थना को दो तरफ़ से छूता है: वह उसे बेहद उदार बनाता है और साथ ही बेहद केंद्रित। उदार, क्योंकि यीशु कोई कोटा तय नहीं करते; वे शिष्यों को झिझकते हुए भिखारी नहीं, बल्कि पिता के घर के लोग मानते हैं जिन्हें माँगने का हक़ है। केंद्रित, क्योंकि "मेरे नाम से" कोई जादुई मुहर नहीं जो हम प्रार्थना के अंत में चिपका दें। बाइबल में नाम व्यक्ति के अधिकार और चरित्र को दर्शाता है। किसी के नाम से माँगना यानी उसके प्रतिनिधि के रूप में, उसके काम के लिए, उसकी मंशा के भीतर रहकर माँगना। इसलिए यहाँ परमेश्वर एक ऐसे पिता के रूप में सामने आते हैं जो देना चाहते हैं, पर जो हमें अपनी ही छोटी इच्छाओं के कैदी नहीं रहने देते। प्रार्थना का लक्ष्य हमारा आराम नहीं, पुत्र के द्वारा पिता की महिमा है, और हैरानी यह है कि उसी महिमा में हमारी सबसे गहरी ज़रूरतें भी पूरी होती हैं।
जोड़ने वाला सूत्र
पुराने नियम में परमेश्वर का नाम एक जगह से जुड़ा था: मंदिर, वह स्थान जिसे परमेश्वर ने अपने नाम के लिए चुना था, जहाँ इस्राएल पुकार सकता था और सुना जाता था। भक्त वहाँ खड़े होकर उस नाम पर भरोसा करते थे, क्योंकि नाम का मतलब था वह चरित्र जिसे परमेश्वर ने वाचा में प्रकट किया। यीशु अब उस पूरी व्यवस्था को अपने ऊपर ले लेते हैं। इसी अध्याय में वे कह चुके हैं, "मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ", और यह पद उसका व्यावहारिक नतीजा है: प्रार्थना का पता बदल गया है, मंदिर से पुत्र तक। और "महिमा" शब्द यूहन्ना में हमेशा क्रूस की ओर इशारा करता है। जिस नाम से हम माँगते हैं, वह नाम उस रात कीमत चुकाने जा रहा था।
आत्मदर्पण
ईमानदारी से पूछिए: आपकी प्रार्थना की सूची में सबसे ऊपर क्या है? तनख़्वाह, बेटे का दाख़िला, माँ की रिपोर्ट, वह रिश्ता जो टूटता जा रहा है। इनमें कुछ भी ग़लत नहीं; यीशु ने कोई विषय-सूची तय नहीं की। पर यह पद एक चुभती बात करता है। हममें से कई लोग "यीशु के नाम से" इसलिए जोड़ते हैं कि प्रार्थना पूरी लगे, या भीतर से यह उम्मीद रहती है कि यह वाक्यांश परमेश्वर पर दबाव डालेगा। और जब उत्तर नहीं आता, तो हम चुपचाप मान लेते हैं कि परमेश्वर कंजूस हैं, या हम अयोग्य। यीशु तीसरा रास्ता दिखाते हैं: पूछिए कि जो आप माँग रहे हैं, वह उस काम में कहाँ फिट होता है जो पिता अपने पुत्र के ज़रिये कर रहे हैं। यह छूट नहीं देता, यह आज़ाद करता है, क्योंकि तब प्रार्थना मेरी बेचैनी की सूची नहीं, परमेश्वर के काम में हिस्सेदारी बन जाती है।
आज यह करें: वह एक प्रार्थना काग़ज़ पर लिखिए जो आप महीनों से दोहरा रहे हैं, और उसके नीचे एक वाक्य में लिखिए कि यदि यह पूरी हो जाए तो इससे पिता की महिमा कैसे होगी। जो सच में निकले, वही लिखिए।
शास्त्र की गूँज
याकूब की चिट्ठी ठीक यहीं चोट करती है: वह लिखता है कि लोग माँगते हैं और नहीं पाते, क्योंकि वे अपने भोग-विलास पर ख़र्च करने के लिए माँगते हैं। यह यीशु के वादे का खंडन नहीं, उसकी व्याख्या है; "मेरे नाम से" और "अपनी लालसाओं के लिए" एक साथ नहीं चल सकते। दूसरी ओर, यूहन्ना अपनी पहली पत्री में यही बात भरोसे की भाषा में कहता है: हमारा साहस इस पर टिका है कि जब हम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार माँगते हैं, वे सुनते हैं। दोनों जगह वही तर्क है: प्रार्थना की ताक़त उसकी तीव्रता में नहीं, उसके परमेश्वर की मंशा से मेल में है। यह प्रार्थना को कमज़ोर नहीं करता, उसे निशाना देता है।
एक बारीकी
ध्यान दीजिए कि यीशु यह नहीं कहते, "पिता वह करेंगे।" वे कहते हैं, "वही मैं करूँगा।" और अगले पद में तो साफ़ है कि माँगना उनसे ही है। यह छोटी सी बात असाधारण है। कुछ ही घंटों में यह आदमी बंधा हुआ, पिटा हुआ, क्रूस पर लटका होगा, और वह अपने डरे हुए दोस्तों से कह रहा है कि उसका नाम पुकारते ही वह स्वयं काम में उतरेगा। यहाँ यीशु किसी मध्यस्थ की तरह संदेश आगे नहीं बढ़ा रहे; वे प्रार्थना के उत्तरदाता हैं। जो प्रार्थना करने वाला कमरे में अकेला महसूस करता है, उसे यह जानना चाहिए: उत्तर देने वाला वही है जिसने कीमत चुकाई।
मुख्य पात्र
इस पूरे अध्याय में यीशु का भावनात्मक संसार अजीब तरह से उलटा है। जिनका मन व्याकुल है, वे शिष्य हैं; जिसकी रात सबसे भारी है, वह यीशु हैं। फिर भी बातचीत का पूरा भार वे शिष्यों की ओर मोड़े रखते हैं: तुम्हारा मन व्याकुल न हो, तुम बड़े काम करोगे, तुम माँगोगे और मैं करूँगा। यह विदाई भाषण अपने बारे में नहीं है। और उनकी एक ही महत्वाकांक्षा दिखती है, कि पिता की महिमा हो, और वह महिमा उनके अपने बलिदान से होकर जाती है। ऐसा परमेश्वर हमारे धार्मिक अनुमानों से बिल्कुल अलग है: उनकी महिमा देने में है, छीनने में नहीं। जो इस चेहरे को देख लेता है, उसकी प्रार्थना अपने आप बदल जाती है।
चिंतन
आपकी पिछली दस प्रार्थनाओं में से कितनी ऐसी थीं जो केवल तभी सार्थक हैं यदि यीशु जीवित हैं और राज कर रहे हैं?
अनुत्तरित प्रार्थना को आप भीतर से कैसे समझाते हैं: परमेश्वर की कंजूसी, अपनी अयोग्यता, या उनका कोई बड़ा काम जिसे आप अभी नहीं देख पा रहे?
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John 14:13 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यूहन्ना 14:13 का क्या अर्थ है?
यूहन्ना 14:13 किस विषय में है?
यूहन्ना 14:13 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यूहन्ना 14:13 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यूहन्ना 14:13 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
John 14 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यीशु यह नहीं कहते कि वह तुम्हें कोई पता भेज देंगे। वह कहते हैं, "फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा, कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो।" वह खुद लौटकर आएँगे। स्वर्ग की सबसे बड़ी बात सोने की गलियाँ नहीं, बल्कि यह है कि वहाँ वही होंगे जिन्होंने तुमसे प्रेम किया। आज जो अकेलापन तुम्हें काट रहा है, उसका अंत एक जगह नहीं, एक व्यक्ति है।
यहूदा का सवाल बहुत ईमानदार है, "हे प्रभु, क्या हुआ कि तू अपने आप को हम पर प्रगट करना चाहता है और संसार पर नहीं?" वह चाहता था कि यीशु सबके सामने चमक जाएँ, ताकि किसी को शक न रहे। पर यीशु का जवाब कोई तमाशा नहीं था, बल्कि एक घर था। वे उसी के पास आकर रहते हैं जो उनके वचन को मानता है। सोचो, आज तुम्हारे दिल का दरवाज़ा कितना खुला है?
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