यूहन्ना 14:17
पाठ
यीशु ने अभी-अभी एक "और सहायक" का वादा किया है, और अब वे उसका नाम खोलकर रखते हैं: सत्य की आत्मा। यही वह जन है जो सर्वदा शिष्यों के साथ रहेगा। पर उसी साँस में एक विभाजन खिंच जाता है: संसार उसे ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि संसार न उसे देखता है और न उसे जानता है। शिष्यों के साथ बात उलटी है, "तुम उसे जानते हो, क्योंकि वह तुम्हारे साथ रहता है, और वह तुम में होगा।" एक वाक्य में तीन चीज़ें रखी गई हैं: आत्मा का परिचय, संसार की असमर्थता, और शिष्यों से किया गया एक ऐसा वादा जो "साथ" से आगे बढ़कर "में" तक जाता है। यह विदाई के भोजन की मेज़ पर कहा गया है, गिरफ़्तारी से कुछ घंटे पहले।
मर्म
यहाँ परमेश्वर की उपस्थिति के बारे में कुछ ऐसा कहा जा रहा है जो पूरे बाइबल-वृत्तांत में धीरे-धीरे पकता आया था। परमेश्वर पहले अदन में मनुष्य के साथ चलते थे, फिर बादल के खंभे में इस्राएल के आगे-आगे, फिर मिलापवाले तम्बू और मन्दिर में उनके बीच बसे। अब यीशु कहते हैं: वह उपस्थिति तुम्हारे भीतर आ बसेगी। यह कोई भावनात्मक उन्नति नहीं, यह वाचा की पूर्ति है, वह नई वाचा जिसमें व्यवस्था पत्थर पर नहीं बल्कि हृदय में लिखी जाती है। और ध्यान दीजिए, यह अनुग्रह है, उपलब्धि नहीं: शिष्य आत्मा को अर्जित नहीं करते, पिता उसे देते हैं क्योंकि पुत्र विनती करते हैं। साथ ही यहाँ न्याय की एक ठंडी रेखा भी है। "संसार ग्रहण नहीं कर सकता" कोई इच्छा नहीं, असमर्थता है। जो प्रेम में खुलना नहीं चाहता, वह देख भी नहीं सकता; और न देखना ही उसका दंड बन जाता है।
सूत्र
परमेश्वर का पूरा उद्धार-कार्य एक ही दिशा में बहता है: वे अपने लोगों के बीच बसना चाहते हैं। सृष्टि में मनुष्य को उनकी संगति में रखा गया; पाप के बाद वह संगति टूटी और मनुष्य बाहर कर दिया गया। तब से बाइबल की कहानी लौटने की कहानी है, और हर पड़ाव पर परमेश्वर थोड़ा और पास आते हैं: तम्बू, मन्दिर, फिर देह। यूहन्ना ने अपने सुसमाचार के आरम्भ में ही कहा था कि वचन देहधारी होकर हमारे बीच डेरा किए हुए था। पर देह एक जगह पर होती है, और यीशु जा रहे हैं। इसलिए आत्मा का वादा पीछे हटना नहीं, आगे बढ़ना है: जो अब तक शिष्यों के बगल में खड़ा था, वह अब उनके भीतर से काम करेगा। भजनों और भविष्यद्वक्ताओं का वह स्वप्न, कि परमेश्वर हृदय पर लिखेंगे और अपना आत्मा भीतर देंगे, यहाँ मेज़ पर रखी रोटी जितना ठोस हो जाता है।
दर्पण
आप जानते हैं वह क्षण जब कमरा खाली हो जाता है। अस्पताल के गलियारे में, नौकरी छूटने के बाद की सुबह, या उस रिश्ते के बाद जिसमें आपने सब कुछ लगा दिया था। तब सबसे बड़ा डर यह नहीं होता कि परमेश्वर हैं या नहीं, बल्कि यह कि वे कहीं और हैं। यह वचन उस डर के आर-पार जाता है, पर सस्ते ढंग से नहीं। यह नहीं कहता कि आपको अच्छा लगेगा; यह कहता है कि वह आपमें रहेगा, चाहे आपको कुछ भी लगे। और यह हमारे उस गर्व को भी छीलता है जो कहता है, मैं अपनी आध्यात्मिकता खुद बना लूँगा। संसार की असमर्थता कोई दूर की बात नहीं; वह हममें भी बैठी है, हर बार जब हम खुले रहने के बजाय खुद को सँभालना चुनते हैं।
आज ही, दिन ढलने से पहले, दो मिनट चुपचाप बैठिए और ज़ोर से कहिए: "आप मुझमें रहते हैं," और फिर वह एक जगह नाम लेकर बता दीजिए जहाँ आपको लगता था कि आप अकेले हैं।
संदर्भ
यह गुरुवार की रात है, यरूशलेम में, एक ऊपरी कमरे में। पैर धोए जा चुके हैं, यहूदा बाहर जा चुका है, और यीशु जानते हैं कि कुछ घंटों में सिपाही आएँगे। पहली सदी के यहूदी शिष्यों के लिए गुरु का जाना केवल भावनात्मक आघात नहीं था, यह सामाजिक विनाश था: उन्होंने घर, जाल, आमदनी और प्रतिष्ठा छोड़ी थी और अब जिस व्यक्ति के नाम पर वे टिके थे, वह मरने जा रहा है। रोमी शासन के नीचे और मन्दिर के अधिकारियों की नज़र में वे जल्द ही एक बदनाम आदमी के अनुयायी कहलाएँगे। इसी दबाव में यीशु "सर्वदा तुम्हारे साथ रहे" कहते हैं। यह वादा किसी शांत रिट्रीट में नहीं, बल्कि उस मेज़ पर दिया गया जहाँ विश्वासघात की गंध बाकी थी।
एक बारीकी
पूरे वचन का भार एक छोटे-से परिवर्तन पर टिका है: "वह तुम्हारे साथ रहता है, और वह तुम में होगा।" वर्तमान से भविष्य, और "साथ" से "में"। अभी आत्मा उनके साथ है, क्योंकि यीशु उनके साथ हैं; आत्मा उनके सामने खड़ा है, उनके गुरु की देह में। पर क्रूस, पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण के बाद कुछ बदलेगा। जो बाहर से साथ चलता था, वह भीतर से चलाएगा। यह अंतर छोटा नहीं। बाहर का साथी छूट सकता है, पीछे रह सकता है, गलत समझा जा सकता है। भीतर का निवासी आपके साथ उन कमरों में भी जाता है जहाँ आप किसी को नहीं ले जाते। और ध्यान दीजिए, यीशु इसे शर्त के साथ नहीं, वादे के साथ कहते हैं: होगा, न कि शायद हो।
मुख्य पात्र
इस वचन का केंद्रीय पात्र आत्मा है, और यीशु उसे "एक और सहायक" कहते हैं। यूनानी शब्द παράκλητος (पाराक्लेतोस) का अर्थ है वह जिसे पास बुलाया जाए: गवाह, वकील, साथ खड़ा होनेवाला। यह कोई अस्पष्ट शक्ति नहीं है; यीशु उसके लिए "वह" कहते हैं, "उसे जानते हो" कहते हैं। आत्मा को जाना जा सकता है, जैसे किसी व्यक्ति को जाना जाता है। और उसका नाम "सत्य की आत्मा" है, वही सत्य जिसके बारे में यीशु ने अभी कहा था कि वे स्वयं सत्य हैं। यानी यह आत्मा कोई नई शिक्षा नहीं लाता; वह मसीह को भीतर से सच्चा करता है। परमेश्वर अपने बारे में यहाँ यह प्रकट करते हैं कि वे केवल हमारे लिए कुछ करते नहीं, वे हममें आकर बसते हैं।
शास्त्र की गूँज
यिर्मयाह ने एक नई वाचा की बात की थी जिसमें व्यवस्था हृदय पर लिखी जाएगी, और यहेजकेल ने पत्थर के हृदय की जगह माँस के हृदय और भीतर रखे गए आत्मा का वादा किया था। दोनों निर्वासन के अंधकार में कहे गए थे, जब मन्दिर उजड़ चुका था और लगता था कि परमेश्वर चले गए। यीशु उसी घाव पर हाथ रखते हैं, उसी रात जब उनके अपने शिष्य निर्वासन जैसा कुछ अनुभव करने वाले हैं। और इसी अध्याय में, कुछ वचन आगे, वे इसे और खोलते हैं: "हम उसके पास आएँगे, और उसके साथ वास करेंगे।" वह वास, वह डेरा, मन्दिर की भाषा है। भविष्यद्वक्ताओं की आशा अब ईंट-पत्थर में नहीं, लोगों में पूरी होती है।
पहले सुननेवाले
उस मेज़ पर बैठे लोग ऐसे यहूदी थे जिनके लिए परमेश्वर का आत्मा कोई अनजानी बात नहीं थी, पर एक असाधारण बात ज़रूर थी। उनके शास्त्रों में आत्मा राजाओं, न्यायियों और भविष्यद्वक्ताओं पर उतरता था, कुछ समय के लिए, किसी काम के लिए, और हट भी सकता था। शाऊल का उदाहरण उनके सामने था। इसलिए "सर्वदा तुम्हारे साथ रहे" उनके कानों में लगभग असंभव लगा होगा। और "तुम में" तो और भी असंभव, क्योंकि परमेश्वर की उपस्थिति का घर मन्दिर था, जिसके सबसे भीतरी कक्ष में साल में एक बार एक ही आदमी जा सकता था। यीशु उस भूगोल को उलट देते हैं। जो लोग यरूशलेम में तीर्थयात्रा करने आते थे, उनसे कहा जा रहा है कि परमेश्वर की उपस्थिति अब उनके साथ घर लौटेगी।
कठिन प्रश्न
"जिसे संसार ग्रहण नहीं कर सकता" वाला वाक्य असुविधाजनक है। क्या परमेश्वर ने कुछ लोगों के लिए दरवाज़ा बंद कर रखा है? यूहन्ना का जवाब सीधा नहीं है, और उसे सीधा बना देना बेईमानी होगी। इस सुसमाचार में "संसार" कोई भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि वह रवैया है जो अपने आप में बंद है, जो प्रकाश से मुँह फेरता है। ऐसा रवैया आत्मा को नहीं देख सकता, ठीक जैसे बंद आँख सूरज को नहीं देख सकती; और यह असमर्थता वास्तविक है, महज़ आलस नहीं। पर यही "संसार" वह है जिससे परमेश्वर ने ऐसा प्रेम किया कि अपना पुत्र दे दिया। दोनों बातें इस पुस्तक में साथ-साथ खड़ी हैं। मैं इन्हें जोड़कर एक साफ़ प्रणाली नहीं बना सकता। जो मैं कर सकता हूँ, वह यह है कि खुद को उस बंद आँख से जाँचूँ, दूसरों को उसमें गिनने के बजाय।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन-सी जगह है जहाँ आप परमेश्वर को "साथ" तो मानते हैं पर "में" नहीं, यानी जहाँ आप अकेले लड़ते हैं?
यदि आत्मा "सत्य की आत्मा" है, तो आपके भीतर इस समय कौन-सा सच है जिससे आप बचकर निकल रहे हैं?
"संसार ग्रहण नहीं कर सकता" पढ़ते समय आपका पहला विचार दूसरों की ओर जाता है या अपनी ओर, और यह आपके बारे में क्या कहता है?
पढ़ने योग्य मसीही पुस्तकें
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अगस्तीन की व्यक्तिगत साक्षी परमेश्वर की अनुग्रह से बदलने वाली शक्ति को गहराई से प्रकट करती है।
चालीस दिनों की यह यात्रा आपको परमेश्वर के दिए जीवन-उद्देश्य को खोजने और जीने में सहायता करती है।
परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास
रसोई में सेवा करते हुए भी परमेश्वर के साथ निरंतर संगति करने की सरल कला यह पुस्तक सिखाती है।
नाज़ी यातना-शिविर में भी क्षमा और विश्वास की यह सच्ची साक्षी परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की गवाही देती है।
प्रतिदिन के भक्ति-लेख यीशु की कोमल आवाज़ सुनने और उसकी शांति में विश्राम पाने में सहायता करते हैं।
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John 14:17 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यूहन्ना 14:17 का क्या अर्थ है?
यूहन्ना 14:17 किस विषय में है?
यूहन्ना 14:17 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यूहन्ना 14:17 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यूहन्ना 14:17 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
John 14 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यीशु यह नहीं कहते कि वह तुम्हें कोई पता भेज देंगे। वह कहते हैं, "फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा, कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो।" वह खुद लौटकर आएँगे। स्वर्ग की सबसे बड़ी बात सोने की गलियाँ नहीं, बल्कि यह है कि वहाँ वही होंगे जिन्होंने तुमसे प्रेम किया। आज जो अकेलापन तुम्हें काट रहा है, उसका अंत एक जगह नहीं, एक व्यक्ति है।
यहूदा का सवाल बहुत ईमानदार है, "हे प्रभु, क्या हुआ कि तू अपने आप को हम पर प्रगट करना चाहता है और संसार पर नहीं?" वह चाहता था कि यीशु सबके सामने चमक जाएँ, ताकि किसी को शक न रहे। पर यीशु का जवाब कोई तमाशा नहीं था, बल्कि एक घर था। वे उसी के पास आकर रहते हैं जो उनके वचन को मानता है। सोचो, आज तुम्हारे दिल का दरवाज़ा कितना खुला है?
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