यूहन्ना 14:26
पाठ
यीशु मसीह अपने शिष्यों के साथ अंतिम भोज की मेज़ पर हैं, विदाई की घड़ी में, और वे एक वादा छोड़ जाते हैं: पिता उनके नाम से एक सहायक भेजेंगे, पवित्र आत्मा। यह आत्मा दो काम करेगा, जो असल में एक ही काम के दो पहलू हैं: "वह तुम्हें सब बातें सिखाएगा, और जो कुछ मैंने तुम से कहा है, वह सब तुम्हें स्मरण कराएगा।" ध्यान दीजिए, यह वचन पद 25 से जुड़ा हुआ है, जहाँ यीशु कहते हैं कि ये बातें उन्होंने शिष्यों के साथ रहते हुए कही थीं। यानी शिक्षक जा रहा है, पर शिक्षा अनाथ नहीं छूटेगी। जो शब्द गलील की धूल में बोले गए, वे शिष्यों के भीतर जीवित रहेंगे, किसी और के द्वारा, पर उसी की ओर से।
मूल बात
यहाँ पवित्र आत्मा को कोई स्वतंत्र, नई आवाज़ नहीं कहा गया। उसका काम मसीह के वचन से बँधा हुआ है: सिखाना और स्मरण कराना। यह बात इस पद का धार्मिक केंद्र है, और यह हमें आत्मा के बारे में सबसे गहरी बात बताती है, कि वह मसीह की ओर इशारा करता है, अपनी ओर नहीं। पिता भेजते हैं, पुत्र के नाम से, और आत्मा पुत्र की बातें याद दिलाता है; तीनों एक ही उद्धार-कार्य में लगे हैं, बिना एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा किए। इसका व्यावहारिक अर्थ बड़ा है। जब कोई कहता है कि आत्मा ने उसे कुछ ऐसा बताया जो मसीह के वचन को काटता है, तो यह पद शांत मगर दृढ़ स्वर में मना कर देता है। और साथ ही यह हमें राहत भी देता है: विश्वास हमारी याददाश्त की मज़बूती पर नहीं टिका, बल्कि उस पर जो याद दिलाता है।
सारा सूत्र
बाइबल में परमेश्वर बार-बार अपने लोगों को शब्द देते हैं और फिर उस शब्द को याद रखने का बंदोबस्त करते हैं। व्यवस्थाविवरण में इस्राएल को घड़ी-घड़ी कहा जाता है, स्मरण रखो, भूल न जाओ, क्योंकि भूलना ही धर्मत्याग की पहली सीढ़ी है। और इस्राएल भूलता ही रहा; पत्थर की पटियाएँ थीं, मगर भूलने वाला हृदय भी था। यिर्मयाह ने इसीलिए एक नई वाचा की बात की, जिसमें व्यवस्था हृदय पर लिखी जाएगी। यीशु मसीह मेज़ पर बैठे उसी वादे को पूरा होते हुए बता रहे हैं: अब स्मरण कराने वाला बाहर से नहीं, भीतर से बोलेगा। यह उद्धार-योजना का सिलसिला है, कि परमेश्वर पहले वचन बोलते हैं, फिर देहधारी वचन भेजते हैं, और फिर आत्मा के द्वारा उस वचन को हमारे भीतर बसा देते हैं। क्रूस और पुनरुत्थान के बाद ही शिष्य समझ पाए कि यीशु क्या कहते रहे थे, और वह समझ आत्मा का उपहार थी।
आयना
हमारा भूलना धर्म-सिद्धांत का मामला कम, रोज़मर्रा का ज़्यादा है। सोमवार सुबह दफ़्तर में, जब कोई सहकर्मी आपका श्रेय ले लेता है, रविवार को सुनी बात का एक शब्द भी हाथ नहीं आता। अस्पताल के गलियारे में, रिपोर्ट के इंतज़ार में, वे सब आयतें जो आपने दूसरों को सांत्वना देने के लिए इस्तेमाल की थीं, अचानक खोखली लगने लगती हैं। बच्चों पर चिल्लाने के बाद जो शर्म आती है, वह हमें बताती है कि हम जानते हैं मगर उस क्षण में जानना काम नहीं आया। यह पद उस असहायता पर उँगली रखता है और साथ ही उसे उठाता भी है: आपकी याददाश्त कमज़ोर है, पर आपके भीतर एक स्मरण कराने वाला रहता है, और वह थकता नहीं। आज ही एक काम कीजिए: यीशु का कोई एक वाक्य, जो आपको सबसे ज़्यादा ज़रूरत का लगता है, कागज़ पर अपने हाथ से लिखिए और उसे वहाँ रखिए जहाँ आप कल सुबह पहले पहुँचते हैं।
मुख्य पात्र
इस पद में केंद्र में यीशु मसीह हैं, और उनका आत्मविश्वास चौंकाने वाला है। मरने से कुछ घंटे पहले, विश्वासघात की छाया मेज़ पर पड़ी है, और वे शिष्यों के भविष्य की पाठशाला की व्यवस्था कर रहे हैं। उनके स्वर में घबराहट नहीं, इंतज़ाम है। ध्यान दीजिए कि वे अपने वचनों को कितनी गंभीरता से लेते हैं: "जो कुछ मैंने तुम से कहा है" इतना महत्वपूर्ण है कि परमेश्वर स्वयं उसे संभालने आएँगे। कोई साधारण शिक्षक अपने शब्दों के बारे में ऐसा नहीं कहेगा। साथ ही उनमें एक कोमलता भी है, जो पद 18 में खुलती है, "मैं तुम्हें अनाथ न छोड़ूँगा।" यह उस व्यक्ति का चेहरा है जो जाते हुए भी छोड़ता नहीं, जो अपनी मृत्यु के इंतज़ाम में दूसरों की तनहाई का हिसाब रखता है।
श्रोताओं की दुनिया
पहले सुनने वाले ग्यारह घबराए हुए यहूदी पुरुष थे, जिनके लिए गुरु का साथ छूटना केवल भावनात्मक नुकसान नहीं था। रब्बी की परंपरा में शिष्य गुरु के साथ रहकर सीखता था, उसके शब्द रटता था, उसकी चाल-ढाल तक उतार लेता था। गुरु के जाने का मतलब था परंपरा का टूटना, अधिकार का खो जाना, और यह सवाल कि अब कौन बताएगा कि वे किसी बात को ठीक समझे हैं या नहीं। और जब यूहन्ना अपना सुसमाचार लिख रहे थे, उस पीढ़ी के लिए एक और डर था: चश्मदीद गवाह मर रहे थे। यह पद उन्हें बताता है कि स्मरण की डोर मनुष्यों की उम्र पर नहीं लटकी है। जो सुरक्षा हम पुस्तकालयों और परंपराओं से चाहते हैं, वह उन्हें आत्मा में दी गई।
कठिन सवाल
अगर आत्मा सब बातें सिखाता है, तो कलीसिया इतनी बुरी तरह बँटी क्यों है? एक ही आत्मा का दावा करने वाले लोग एक-दूसरे को धर्मभ्रष्ट कहते रहे हैं, और यह पद उस विरोधाभास को आसान नहीं बनाता। एक बात कहनी होगी: यह वादा पहले उन ग्यारह से किया गया है, उन बातों के बारे में जो यीशु ने उनसे कही थीं, न कि हर विषय पर सर्वज्ञता का पट्टा हमें देने के लिए। "सब बातें" का दायरा मसीह है, हमारी सारी जिज्ञासाएँ नहीं। मगर इससे दर्द पूरा नहीं मिटता, क्योंकि मसीह के बारे में भी हम बँटे हैं। मुझे लगता है सच्चा उत्तर विनम्रता की तरफ़ ले जाता है, न कि व्याख्या की तरफ़: जहाँ मैं आत्मा की शिक्षा का दावा अपने पक्ष के हथियार के रूप में करता हूँ, वहाँ मैं शायद सिखाया नहीं जा रहा हूँ, केवल जीतना चाह रहा हूँ। यह प्रश्न खुला रहता है, और उसे खुला रहना चाहिए।
चिंतन
यीशु मसीह की कौन सी बात है जिसे आप जानते हैं, मगर दबाव के क्षणों में वह हमेशा आपके हाथ से फिसल जाती है?
आपने पिछली बार कब जाँचा था कि जो "मन में आया" उसे आप आत्मा की आवाज़ कहते हैं, वह मसीह के वचन के साथ मेल खाता है या नहीं?
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John 14:26 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यूहन्ना 14:26 का क्या अर्थ है?
यूहन्ना 14:26 किस विषय में है?
यूहन्ना 14:26 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यूहन्ना 14:26 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यूहन्ना 14:26 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
John 14 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यीशु यह नहीं कहते कि वह तुम्हें कोई पता भेज देंगे। वह कहते हैं, "फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा, कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो।" वह खुद लौटकर आएँगे। स्वर्ग की सबसे बड़ी बात सोने की गलियाँ नहीं, बल्कि यह है कि वहाँ वही होंगे जिन्होंने तुमसे प्रेम किया। आज जो अकेलापन तुम्हें काट रहा है, उसका अंत एक जगह नहीं, एक व्यक्ति है।
यहूदा का सवाल बहुत ईमानदार है, "हे प्रभु, क्या हुआ कि तू अपने आप को हम पर प्रगट करना चाहता है और संसार पर नहीं?" वह चाहता था कि यीशु सबके सामने चमक जाएँ, ताकि किसी को शक न रहे। पर यीशु का जवाब कोई तमाशा नहीं था, बल्कि एक घर था। वे उसी के पास आकर रहते हैं जो उनके वचन को मानता है। सोचो, आज तुम्हारे दिल का दरवाज़ा कितना खुला है?
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