यूहन्ना 14:27
यह पाठ
"मैं तुम्हें शान्ति दिए जाता हूँ, अपनी शान्ति तुम्हें देता हूँ" — यह वाक्य किसी शान्त कमरे में नहीं, बल्कि विदाई की उस रात में बोला गया जब मेज़ पर बैठे लोग यह भी नहीं जानते थे कि सुबह क्या होगा। यीशु अपने चेलों को कोई सलाह नहीं देते, वे कुछ सौंपते हैं: अपनी ही शान्ति, वैसी नहीं जैसी संसार देता है। और फिर वे उस भय को नाम देकर छूते हैं जो उस कमरे में पहले से मौजूद था: "तुम्हारा मन न घबराए और न डरे।" एक विदा लेता हुआ व्यक्ति पीछे रहने वालों को वह देता है जो उसके पास स्वयं सबसे कम बचा दिखता है।
मूल मर्म
ध्यान दीजिए, यीशु शान्ति के बारे में समझाते नहीं, वे उसे देते हैं। यह कोई मनःस्थिति नहीं जिसे आप अभ्यास से पैदा कर लें, बल्कि एक व्यक्ति की अपनी संपत्ति है जो वसीयत की तरह हस्तांतरित होती है। इब्रानी "शालोम" केवल संघर्ष की अनुपस्थिति नहीं, वह टूटी हुई चीज़ों का फिर से पूरा हो जाना है। और यहीं वह कड़वा भेद खुलता है: संसार शान्ति तब देता है जब परिस्थितियाँ अनुकूल हों, वह देकर कुछ माँगता भी है, और जब हालात बदलते हैं तो वापस ले लेता है। यीशु की शान्ति क्रूस के ठीक पहले दी जाती है, यानी सबसे प्रतिकूल क्षण में। इसका अर्थ है कि यह शान्ति परिस्थिति पर नहीं, उनकी उपस्थिति पर टिकी है। प्रश्न यह नहीं कि हमें शान्ति कैसे मिले, बल्कि यह कि जो पहले से दी जा चुकी है, उसे हम पहचानते क्यों नहीं।
कथा-सूत्र
पुराने नियम में शान्ति कभी मनुष्य की उपलब्धि नहीं थी, वह हमेशा दी जाती थी। गिनती की उस प्राचीन याजकीय आशीष में परमेश्वर अपने लोगों पर अपना मुख चमकाते हैं और उन्हें शालोम देते हैं; यानी शान्ति परमेश्वर के मुख के फिरने से आती है, हालात के सुधरने से नहीं। इस्राएल ने सदियों तक इसी आशीष को सुना और सदियों तक निर्वासन, अकाल और तलवार भी देखी। और फिर यहाँ, ऊपरी कमरे में, वही आशीष एक व्यक्ति के मुँह से पहली बार "अपनी शान्ति" कहकर दी जाती है। मानो जो आशीष अब तक याजक के हाथों से होकर गुज़रती थी, वह अब स्वयं देह बनकर मेज़ पर बैठी है। तीन दिन बाद, बन्द दरवाज़ों के पीछे छिपे उन्हीं डरे हुए चेलों के बीच खड़े होकर जी उठे प्रभु का पहला शब्द फिर यही होगा: शान्ति। पहले वादा, फिर घाव, फिर पूरा होना।
दर्पण
हम शान्ति को अक्सर स्थिति का पर्याय समझ लेते हैं। बैंक में इतना जमा हो जाए, रिपोर्ट सामान्य आ जाए, बेटा ठीक रास्ते पर लौट आए, तो मन शान्त होगा। यह संसार वाली शान्ति है, और वह झूठी नहीं है, बस अस्थायी है; वह उसी क्षण ढह जाती है जिस क्षण फ़ोन रात के दो बजे बजता है। यीशु उन लोगों को शान्ति देते हैं जिनका सबसे बुरा दिन अगली सुबह आने वाला है। यह असुविधाजनक है, क्योंकि इसका अर्थ यह हुआ कि परिस्थिति का बदलना उनके देने की शर्त नहीं। ध्यान दीजिए, वे यह नहीं कहते कि डरने जैसा कुछ है ही नहीं। वे कहते हैं, तुम्हारा मन न घबराए, यह जानते हुए कि घबराने के पूरे कारण मौजूद हैं। आज जिस एक चिंता से आपका मन सबसे ज़्यादा घबराता है, उसे कागज़ पर एक वाक्य में लिखिए, और उसके ठीक नीचे लिखिए: "अपनी शान्ति तुम्हें देता हूँ।" फिर वह कागज़ वहाँ रखिए जहाँ आपकी नज़र कल सुबह सबसे पहले पड़े।
कठिन प्रश्न
क्या भावना को आज्ञा दी जा सकती है? "तुम्हारा मन न घबराए और न डरे" एक आदेश है, और हममें से कौन है जिसने भय को इच्छाशक्ति से बन्द कर पाया हो? यदि शान्ति दी जा चुकी है, तो विश्वासी लोग अस्पताल के गलियारों में काँपते क्यों हैं? आसान उत्तर यह होगा कि उनका विश्वास कमज़ोर है, पर यह उत्तर पाठ से नहीं, हमारी शर्म से निकलता है। शायद बात यह है कि यह आज्ञा वैसी ही है जैसी किसी डूबते हुए व्यक्ति से कही गई हो कि रस्सी को थाम लो: रस्सी सचमुच वहाँ है, थामना फिर भी हाथों का काम है, और हाथ काँपते हैं। यीशु इस तनाव को सुलझाते नहीं। वे केवल यह स्पष्ट करते हैं कि जो दिया गया है, वह वापस नहीं लिया जाएगा। बाकी हमें उसी अँधेरे में जीना पड़ता है जिसमें वे चेले जिए।
पृष्ठभूमि
यह फ़सह का सप्ताह है, यरूशलेम तीर्थयात्रियों से भरा है, और शहर पर रोमी शासन की छाया है। रोम अपनी व्यवस्था को "पैक्स रोमाना" कहता था, यानी वह शान्ति जो भालों के बल पर बनाए रखी जाती है और जिसे कर चुकाकर खरीदा जाता है। "जैसे संसार देता है" इन शब्दों में उस साम्राज्य की गूँज है। दूसरी ओर, यहूदी परंपरा में शालोम रोज़ का अभिवादन और विदाई का शब्द दोनों था, वैसे ही जैसे हम "नमस्ते" कहते हैं। तो यीशु एक साधारण विदाई-वाक्य उठाते हैं और उसे भर देते हैं। यह भाषण उस साहित्यिक रूप में ढला है जिसे उस समय के लोग पहचानते थे: मरता हुआ पिता अपने बेटों को अन्तिम वसीयत सुनाता है। केवल यहाँ विरासत ज़मीन या नाम नहीं, स्वयं देने वाले की शान्ति है।
केन्द्रीय व्यक्ति
सबसे मार्मिक बात यह है कि जो व्यक्ति कह रहे हैं "मन न घबराए", उन्हीं का मन इसी सुसमाचार में एक से अधिक बार व्याकुल हुआ बताया गया है; कब्र के सामने, और इसी रात मेज़ पर, विश्वासघात की बात करते हुए। यह कोई भावनाओं से ऊपर उठा हुआ ऋषि नहीं है जो अनासक्ति सिखा रहा हो। यह वह है जो जानता है कि घबराहट कैसी लगती है, और फिर भी अपनी शान्ति बाँट देता है, जैसे कोई भूखा आदमी अपनी रोटी तोड़कर दे। उनकी शान्ति पिता के साथ उनके अटूट रिश्ते से आती है, इसी अध्याय में वे बार-बार यही दोहराते हैं कि वे पिता में हैं और पिता उनमें। इसलिए जो वे देते हैं, वह अंततः कोई वस्तु नहीं, बल्कि उसी रिश्ते में हिस्सा है। और यह देना उनकी अन्तिम स्वतंत्र क्रिया है, इससे पहले कि उनके हाथ बाँध दिए जाएँ।
चिंतन के प्रश्न
आज आपके जीवन में शान्ति की जो परिभाषा चल रही है, वह "संसार जैसी" है या "उनकी अपनी"? इसे कैसे पहचानेंगे?
यदि यह शान्ति क्रूस से ठीक पहले दी गई थी, तो आपके सबसे कठिन दिन में वह किस रूप में उपस्थित थी, भले आपने उस समय उसे न पहचाना हो?
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John 14:27 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यूहन्ना 14:27 का क्या अर्थ है?
यूहन्ना 14:27 किस विषय में है?
यूहन्ना 14:27 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यूहन्ना 14:27 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यूहन्ना 14:27 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
John 14 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यीशु यह नहीं कहते कि वह तुम्हें कोई पता भेज देंगे। वह कहते हैं, "फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा, कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो।" वह खुद लौटकर आएँगे। स्वर्ग की सबसे बड़ी बात सोने की गलियाँ नहीं, बल्कि यह है कि वहाँ वही होंगे जिन्होंने तुमसे प्रेम किया। आज जो अकेलापन तुम्हें काट रहा है, उसका अंत एक जगह नहीं, एक व्यक्ति है।
यहूदा का सवाल बहुत ईमानदार है, "हे प्रभु, क्या हुआ कि तू अपने आप को हम पर प्रगट करना चाहता है और संसार पर नहीं?" वह चाहता था कि यीशु सबके सामने चमक जाएँ, ताकि किसी को शक न रहे। पर यीशु का जवाब कोई तमाशा नहीं था, बल्कि एक घर था। वे उसी के पास आकर रहते हैं जो उनके वचन को मानता है। सोचो, आज तुम्हारे दिल का दरवाज़ा कितना खुला है?
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