यूहन्ना 18
पाठ
किद्रोन के नाले के पार एक बारी में, रात के अँधेरे में, दीपकों और मशालों और हथियारों से लैस एक पूरा सैन्य-दल एक निहत्थे व्यक्ति को पकड़ने आता है, और जब वह व्यक्ति आगे बढ़कर कहता है, "मैं हूँ," तो वे पीछे हटकर भूमि पर गिर पड़ते हैं। यीशु स्वयं को सौंप देते हैं, इस शर्त पर कि उनके चेले छूट जाएँ; पतरस तलवार खींचता है और मलखुस का कान काट देता है, पर यीशु उसे रोककर पिता के दिए कटोरे की बात करते हैं। फिर बँधे हुए यीशु हन्ना और कैफा के सामने पूछताछ सहते हैं, थप्पड़ खाते हैं, बाहर आँगन में पतरस आग तापते हुए तीन बार इन्कार करता है, और भोर होते ही मुकदमा पिलातुस के किले में पहुँचता है, जहाँ राज्य और सत्य पर वह असाधारण संवाद होता है, और भीड़ राजा के बदले एक डाकू को माँग लेती है।
केंद्रीय मर्म
इस अध्याय की धुरी वे दो शब्द हैं: "मैं हूँ।" यूहन्ना जानबूझकर वही नाम यहाँ रखते हैं जो जलती झाड़ी में मूसा को सुनाया गया था, और उसका असर वही होता है जो पवित्रता के सामने हमेशा होता है: लोग खड़े नहीं रह पाते, भूमि पर गिर पड़ते हैं। यही इस पूरे अध्याय का धर्मविज्ञान है। यीशु शिकार नहीं हैं, वे स्वयं को दे रहे हैं। कोई उन्हें पकड़ नहीं सकता जब तक वे बाहर निकलकर पूछें, "किसे ढूँढ़ते हो?" पिलातुस सोचता है कि वह न्याय कर रहा है, पर सच में न्याय किया जा रहा है, और कठघरे में वह खड़ा है, न कि बंदी। परमेश्वर का राज्य यहाँ तलवार से नहीं, समर्पण से प्रकट होता है; पतरस की तलवार इस राज्य की भाषा नहीं जानती। यही अनुग्रह की विचित्र संरचना है: सर्वशक्तिमान बँधवाता है, ताकि जो बँधे हैं वे छूट जाएँ।
जोड़ने वाला सूत्र
ध्यान दें कि यूहन्ना कब घड़ी देखते हैं: यह फसह की रात है, और अध्याय के अंत में भीड़ फसह की रीति के अनुसार एक बंदी की रिहाई माँगती है। जो छूटता है वह डाकू है, और जो बँधा रहता है वह निर्दोष है। यह पूरे छुटकारे की कहानी का ढाँचा है, जिसे यूहन्ना नाटक के रूप में हमारी आँखों के सामने रख देते हैं: दोषी जाता है, निर्दोष रह जाता है। कैफा ने अनजाने में भविष्यवाणी कर दी थी, "हमारे लोगों के लिये एक पुरुष का मरना अच्छा है," और यूहन्ना उसे बिना टिप्पणी के दोहराते हैं, क्योंकि टिप्पणी की जरूरत नहीं। जिस "कटोरे" की बात यीशु पतरस से करते हैं, वह भविष्यवक्ताओं का जाना-पहचाना क्रोध का कटोरा है, जो अब मेमने के हाथ में है। मिस्र में मेमने का लहू घर बचाता था; यहाँ मेमना स्वयं कहता है, "इन्हें जाने दो।"
दर्पण
पतरस की सबसे बड़ी भूल तलवार नहीं थी, आग थी। वह दुश्मनों के बीच खड़ा होकर हाथ सेंकता है, क्योंकि रात ठंडी है और अकेले होना ठंडा होता है। यह वही ठंड है जो हमें दफ्तर की चाय-मेज पर चुप करा देती है, जब बात आस्था पर मुड़ती है; वही ठंड जो रिश्तेदारों के बीच हमें अपनी पहचान धुँधली कर लेने पर मजबूर करती है। और दूसरी ओर वे प्रधान याजक हैं जो किले के भीतर नहीं जाते, "ताकि अशुद्ध न हों परन्तु फसह खा सकें," जबकि उनके हाथ हत्या का इंतजाम कर रहे हैं। हम दोनों तरफ खड़े हैं: बाहर से पवित्र, भीतर से समझौता किए हुए। आज ही, कागज पर एक वाक्य लिखिए, वह वाक्य जो आप पिछले हफ्ते किसी के सामने कह नहीं पाए कि आप मसीह के हैं, और उसे ऊँची आवाज में एक बार पढ़कर परमेश्वर से कहिए कि अगली बार आप चुप न रहें।
मुख्य पात्र
इस अध्याय में यीशु एक भी बार अपनी सुरक्षा की बात नहीं करते। वे बाहर निकलते हैं, वे पूछते हैं, वे शर्त रखते हैं, वे चेलों को ढाल देते हैं। थप्पड़ के जवाब में न श्राप, न चुप्पी, बल्कि एक न्यायसंगत प्रश्न: "यदि मैंने बुरा कहा, तो उस बुराई पर गवाही दे।" यह किसी पत्थर जैसी निर्विकारता नहीं है; कटोरे का जिक्र बताता है कि उन्हें ठीक-ठीक मालूम है कि क्या पीना है, और वह मीठा नहीं है। यही सबसे गहरा आश्चर्य है: पूरी जानकारी के साथ, पूरी स्वतंत्रता के साथ, वे बँधवा लेते हैं। ईश्वर की सामर्थ्य यहाँ चमत्कार में नहीं, संयम में दिखती है। परमेश्वर ऐसे हैं: जो अपनी शक्ति रोक सकते हैं, प्रेम के कारण।
कठिन प्रश्न
पिलातुस पूछता है, "सत्य क्या है?" और यीशु जवाब नहीं देते। यह चुप्पी खटकती है। हम चाहते हैं कि इसी जगह एक साफ परिभाषा आए, कुछ ऐसा जो हम अपनी नोटबुक में लिख लें। पर पाठ हमें वह नहीं देता। कुछ लोग कहते हैं कि उत्तर वहीं खड़ा था, बँधा हुआ, और यह सच है; फिर भी यूहन्ना पिलातुस को उस उत्तर तक पहुँचते नहीं दिखाते। शायद इसलिए कि पिलातुस पूछ नहीं रहा था, वह बात टाल रहा था। सत्ता के पास प्रश्न होते हैं, जिज्ञासा नहीं। और यहीं यह अध्याय हमें असहज छोड़ देता है: सत्य आपके सामने खड़ा हो सकता है और आप उसे "मैं तो उसमें कुछ दोष नहीं पाता" कहकर भीड़ के हवाले कर सकते हैं। यह रहस्य नहीं, चेतावनी है।
पृष्ठभूमि
फसह की रात, यरूशलेम तीर्थयात्रियों से भरा, रोमी शासन तनाव में। किद्रोन का नाला शहर और जैतून के पहाड़ के बीच है; बारी वहीं है जहाँ यीशु आते-जाते थे, इसलिए यहूदा को पता था। "सैन्य-दल" के साथ मंदिर के प्यादे आते हैं, यानी रोमी और यहूदी सत्ता एक साथ। हन्ना पद से हटाया गया महायाजक था पर असली ताकत उसी के पास थी, और कैफा उसका दामाद; परिवार का धंधा था धर्म और राजनीति। महासभा को मृत्युदंड देने का अधिकार नहीं था, इसलिए मामला भोर में पिलातुस के पास जाता है, क्योंकि रोमी अधिकारी सूर्योदय के साथ काम शुरू करते थे। बरअब्बा "डाकू" था, उस समय की भाषा में संभवतः रोम-विरोधी विद्रोही, यानी भीड़ ने तलवार वाले राजा को चुना और समर्पण करने वाले को ठुकरा दिया।
चिंतन के प्रश्न
आपके जीवन में वह कौन-सी "आग" है जिसके पास खड़े रहने की गर्मी के बदले आप अपनी पहचान धीमी कर देते हैं?
यीशु का राज्य "इस जगत का नहीं" है, यह सुनकर आपको राहत मिलती है या बेचैनी, और क्यों?
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John 18 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यूहन्ना 18 का क्या अर्थ है?
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यूहन्ना 18 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यूहन्ना 18 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यूहन्ना 18 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
John 18 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, भीड़ ने उस दिन गलत चुनाव किया, और मैं जानता हूँ कि मेरे भीतर भी वही डर और दबाव रहता है। मुझे सच्चाई चुनने का साहस दे। धन्यवाद कि जो दोषी था वह छूट गया और तू मेरी जगह खड़ा हो गया। मेरा मन तुझे ही चुने, हर दिन।
प्रभु यीशु, जब तुझे ढूँढ़ने वाले अँधेरे में मशालें लिए आए, तू छिपा नहीं, आगे बढ़कर बोला कि मैं ही हूँ। मेरे डर के पलों में भी तू ऐसे ही सामने आता है। मुझे भरोसा दे कि तेरी उपस्थिति मेरे हर अँधेरे से बड़ी है, और मैं भी छिपने के बजाय तेरे पीछे चल सकूँ।
पिता, धन्यवाद कि पतरस का "मैं नहीं हूँ" कहना उसकी कहानी का अंत नहीं था। आप जानते थे कि वह डर के मारे मुकर जाएगा, फिर भी आपने उसे चुना और बाद में फिर से अपनाया। मेरी कमजोरी और चुप्पी के पलों में भी आपका प्रेम मुझे थामे रखता है, इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ।
पिता, यीशु जानते थे कि उस बगीचे में क्या इंतज़ार कर रहा है, फिर भी वे पीछे नहीं हटे। जब मेरे सामने कोई कठिन रास्ता खुलता है, मुझे भी वैसी ही हिम्मत दे कि मैं भागूँ नहीं, बल्कि आपके साथ आगे बढ़ूँ। मैं अकेला नहीं हूँ, यह भरोसा मेरे मन में बनाए रखिए।
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