बाइबल व्याख्या

यहूदा 1:18

बाइबल
यह वचन Zoe ministries द्वारा समर्पित है

पाठ

यहूदा अपने पाठकों को कोई नई चेतावनी नहीं दे रहे; वे उन्हें याद दिला रहे हैं कि यह सब पहले ही कहा जा चुका था। "वे तुम से कहा करते थे," वे लिखते हैं, यानी मसीह के प्रेरितों ने बार-बार, बैठकों में, विदाई के समय, चिट्ठियों में यही बात दोहराई थी: "पिछले दिनों में ऐसे उपहास करनेवाले होंगे, जो अपनी अभक्ति की अभिलाषाओं के अनुसार चलेंगे।" दो बातें एक साथ बँधी हैं, ठट्ठा और लालसा। जो हँसी उड़ाता है, वह इसलिए हँसता है क्योंकि वह जिस तरह जीना चाहता है, उस पर परमेश्वर का न्याय एक बाधा है। कल्पना कीजिए उस छोटे घरेलू कलीसिया की, तेल के दीये की गंध, साझा भोजन की थालियाँ, और बीच में बैठा कोई व्यक्ति जो प्रभु के लौटने की बात पर मुस्कराकर सिर हिला देता है।

मर्म

पहली सदी के भूमध्यसागरीय शहरों में उपहास कोई हल्का मज़ाक नहीं था; वह एक हथियार था। सम्मान और लज्जा से चलने वाले समाज में किसी को हँसी का पात्र बना देना उसे सामाजिक रूप से नंगा कर देना था। यहूदा जिन लोगों की बात करते हैं, वे बाहर से पत्थर नहीं फेंक रहे, वे प्रेम-भोज में साथ बैठकर हँस रहे हैं। और यहीं पाठ का धार्मिक मर्म खुलता है: अविश्वास हमेशा तर्क के रास्ते नहीं आता, अक्सर वह इच्छा के रास्ते आता है। पहले मनुष्य तय करता है कि वह किस तरह जीना चाहता है, फिर वह उस सत्य पर हँसने लगता है जो उसे रोकता है। परमेश्वर का अनुग्रह यहाँ "लुचपन में" बदल दिया जाता है, और ठट्ठा उस बदलाव का सार्वजनिक चेहरा बन जाता है।

सूत्र

ठट्ठा उद्धार की कहानी में नया नहीं है। नूह ने जहाज़ बनाया और पड़ोसियों ने हँसी उड़ाई; भविष्यद्वक्ताओं को दरबारों में विदूषक समझा गया; और अन्त में क्रूस पर लटके हुए मसीह के चारों ओर वही आवाज़ें गूँजीं, अपने आप को बचा ले। यहूदा जिन प्रेरितों की याद दिला रहे हैं, वे इस आवाज़ को पहचानते थे क्योंकि उन्होंने उसे गतसमनी से गुलगुता तक सुना था। इसलिए जब वे चेतावनी देते हैं कि "पिछले दिनों में ऐसे उपहास करनेवाले होंगे," तो वे केवल भविष्य की भविष्यवाणी नहीं कर रहे, वे एक पुराने ढर्रे की ओर इशारा कर रहे हैं। परमेश्वर के वचन का सामना करने का सबसे सस्ता तरीका हमेशा यही रहा है: उसे खण्डन के योग्य न मानकर हँसी के योग्य मान लेना। और परमेश्वर का उत्तर हर बार वही रहा है, धैर्य, फिर न्याय।

दर्पण

ध्यान दीजिए कि यहूदा हँसी को इच्छाओं से जोड़ते हैं, और यह जोड़ आज भी उतना ही सटीक है। जब आप किसी विवाह की पवित्रता, या पैसे के प्रति मसीह की कठोर बातों, या नम्रता के आदेश पर अपने भीतर एक हल्की मुस्कान महसूस करते हैं, तो अक्सर वह मुस्कान बौद्धिक आपत्ति नहीं होती। वह एक सौदा होती है जो आप पहले ही कर चुके हैं। ऑफिस में जिस समझौते को आपने "व्यावहारिकता" कहा, फ़ोन पर जो आदत रात को आपके अकेलेपन को भरती है, वह रिश्ता जिसमें आप कड़वाहट पालना नहीं छोड़ना चाहते: इनमें से हर एक धीरे-धीरे आपके भीतर एक छोटा-सा उपहास करनेवाला पैदा करता है, जो पवित्रता की बात पर आँखें घुमाना सिखाता है। आज दस मिनट निकालिए, बाइबल का वह एक वाक्य कागज़ पर लिखिए जिस पर आप हाल में मन ही मन हँसे हैं, और उसके नीचे लिखिए कि आप किस चीज़ को छोड़ना नहीं चाहते।

बारीकी

"कहा करते थे" पर रुकिए। यह एक बार की घोषणा नहीं, बार-बार दोहराई गई बात है। कल्पना कीजिए उन कलीसियाओं की जिनके पास अभी नया नियम नहीं था; उनके पास स्मृति थी। कोई प्रेरित शहर आता, कुछ हफ़्ते रुकता, और जाते समय वही चेतावनी छोड़ जाता, जैसे कोई पिता घर से निकलते हुए दरवाज़े पर मुड़कर आख़िरी बात कहता है। वह बात रात के भोजन पर दोहराई जाती, नए विश्वासियों को सिखाई जाती, बूढ़े लोग युवाओं को बताते। यहूदा किसी गुप्त रहस्योद्घाटन का हवाला नहीं दे रहे, वे सामूहिक स्मृति को झकझोर रहे हैं: तुम यह जानते हो, तुमने यह सैकड़ों बार सुना है। और फिर भी जब वह घटता है, कलीसिया चौंक जाती है। जानना और तैयार होना दो अलग चीज़ें हैं।

प्रश्न

अगर प्रेरितों ने पहले ही बता दिया था, तो परमेश्वर ने रोका क्यों नहीं? यह पूछना आसान है और उत्तर देना कठिन। यहूदा इस प्रश्न को टालते नहीं, पर वे उसे सुलझाते भी नहीं। वे केवल यह कहते हैं कि जो हुआ वह अप्रत्याशित नहीं था, और अन्त में न्याय होगा। बीच का समय, जिसमें उपहास करनेवाले प्रेम-भोज की मेज़ पर बैठे रहते हैं, खुला छोड़ दिया गया है। और यहाँ एक और चुभन है: उसी पत्री में यहूदा कहते हैं कि "जो शंका में हैं" उन पर दया करो। तो किसे ठट्ठा करनेवाला कहा जाए और किसे संघर्ष करता हुआ भाई? पाठ हमें कोई परीक्षा-पद्धति नहीं देता। शायद इसलिए कि यह अधिकार हमें सौंपा ही नहीं गया, और हमारी जल्दबाज़ी हमें उसी कठोरता तक ले जाएगी जिसकी यहूदा निन्दा कर रहे हैं।

अंतर्पाठ

पतरस अपनी दूसरी पत्री के तीसरे अध्याय में लगभग यही चेतावनी देते हैं, और वहाँ उपहास का विषय साफ़ है: प्रभु का आना टलता जा रहा है, तो क्या वह कभी आएगा? यानी ठट्ठा समय की देरी से जन्म लेता है, और देरी विश्वास की सबसे बड़ी परीक्षा है। दूसरी ओर भजन संहिता का पहला भजन धन्य मनुष्य का चित्र खींचता है जो ठट्ठा करनेवालों की मण्डली में नहीं बैठता। यहूदा की स्थिति की विडम्बना यही है: अब वे मण्डली में ही आ बैठे हैं, मेज़ के भीतर। इसलिए अलग रहना अब भौगोलिक नहीं, आत्मिक बात है, और उसका उत्तर यहूदा आगे देते हैं, विश्वास में उन्नति और पवित्र आत्मा में प्रार्थना।

चिंतन

पिछले महीने में किस सच्चाई पर आपने हँसकर बात टाल दी, और उसके पीछे कौन-सी इच्छा छिपी थी?

आपकी कलीसिया या समूह में कौन "शंका में" है और कौन वास्तव में ठट्ठा कर रहा है, और आप इस अंतर को दया के साथ कैसे सँभालेंगे?

Jude में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of 2 Peter and Jude

Dick Lucas

Contending for truth when false teaching sounds convincing.

2 Peter and Jude: An Introduction and Commentary

Michael Green

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

2 Peter, Jude

Douglas Moo

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

Early Christian Letters For Everyone

N.T. Wright

James, Peter, John and Jude in short accessible readings.

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Jude 1:18 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यहूदा 1:18 का क्या अर्थ है?
यहूदा अपने पाठकों को कोई नई चेतावनी नहीं दे रहे; वे उन्हें याद दिला रहे हैं कि यह सब पहले ही कहा जा चुका था। "वे तुम से कहा करते थे," वे लिखते हैं, यानी मसीह के प्रेरितों ने बार-बार, बैठकों में, विदाई के समय, चिट्ठियों में यही बात दोहराई थी: "पिछले दिनों में ऐसे उपहास करनेवाले होंगे, जो अपनी अभक्ति की अभिलाषाओं के अनुसार चलेंगे।" दो बातें एक साथ बँधी हैं, ठट्ठा और लालसा। जो हँसी उड़ाता है, वह इसलिए हँसता है क्योंकि वह जिस तरह जीना चाहता है, उस पर परमेश्वर का न्याय एक बाधा है। कल्पना कीजिए उस छोटे घरेलू कलीसिया की, तेल के दीये की गंध, साझा भोजन की थालियाँ, और बीच में बैठा कोई व्यक्ति जो प्रभु के लौटने की बात पर मुस्कराकर सिर हिला देता है।
यहूदा 1:18 किस विषय में है?
ठट्ठा उद्धार की कहानी में नया नहीं है। नूह ने जहाज़ बनाया और पड़ोसियों ने हँसी उड़ाई; भविष्यद्वक्ताओं को दरबारों में विदूषक समझा गया; और अन्त में क्रूस पर लटके हुए मसीह के चारों ओर वही आवाज़ें गूँजीं, अपने आप को बचा ले। यहूदा जिन प्रेरितों की याद दिला रहे हैं, वे इस आवाज़ को पहचानते थे क्योंकि उन्होंने उसे गतसमनी से गुलगुता तक सुना था। इसलिए जब वे चेतावनी देते हैं कि "पिछले दिनों में ऐसे उपहास करनेवाले होंगे," तो वे केवल भविष्य की भविष्यवाणी नहीं कर रहे, वे एक पुराने ढर्रे की ओर इशारा कर रहे हैं। परमेश्वर के वचन का सामना करने का सबसे सस्ता तरीका हमेशा यही रहा है: उसे खण्डन के योग्य न मानकर हँसी के योग्य मान लेना। और परमेश्वर का उत्तर हर बार वही रहा है, धैर्य, फिर न्याय।
यहूदा 1:18 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
"कहा करते थे" पर रुकिए। यह एक बार की घोषणा नहीं, बार-बार दोहराई गई बात है। कल्पना कीजिए उन कलीसियाओं की जिनके पास अभी नया नियम नहीं था; उनके पास स्मृति थी। कोई प्रेरित शहर आता, कुछ हफ़्ते रुकता, और जाते समय वही चेतावनी छोड़ जाता, जैसे कोई पिता घर से निकलते हुए दरवाज़े पर मुड़कर आख़िरी बात कहता है। वह बात रात के भोजन पर दोहराई जाती, नए विश्वासियों को सिखाई जाती, बूढ़े लोग युवाओं को बताते। यहूदा किसी गुप्त रहस्योद्घाटन का हवाला नहीं दे रहे, वे सामूहिक स्मृति को झकझोर रहे हैं: तुम यह जानते हो, तुमने यह सैकड़ों बार सुना है। और फिर भी जब वह घटता है, कलीसिया चौंक जाती है। जानना और तैयार होना दो अलग चीज़ें हैं।
यहूदा 1:18 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पतरस अपनी दूसरी पत्री के तीसरे अध्याय में लगभग यही चेतावनी देते हैं, और वहाँ उपहास का विषय साफ़ है: प्रभु का आना टलता जा रहा है, तो क्या वह कभी आएगा? यानी ठट्ठा समय की देरी से जन्म लेता है, और देरी विश्वास की सबसे बड़ी परीक्षा है। दूसरी ओर भजन संहिता का पहला भजन धन्य मनुष्य का चित्र खींचता है जो ठट्ठा करनेवालों की मण्डली में नहीं बैठता। यहूदा की स्थिति की विडम्बना यही है: अब वे मण्डली में ही आ बैठे हैं, मेज़ के भीतर। इसलिए अलग रहना अब भौगोलिक नहीं, आत्मिक बात है, और उसका उत्तर यहूदा आगे देते हैं, विश्वास में उन्नति और पवित्र आत्मा में प्रार्थना।
यहूदा 1:18 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपकी कलीसिया या समूह में कौन "शंका में" है और कौन वास्तव में ठट्ठा कर रहा है, और आप इस अंतर को दया के साथ कैसे सँभालेंगे?
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Jude 1 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 16

पिता, धन्यवाद कि आपने कुड़कुड़ाने की जगह मेरे मन में संतोष रखा है। धन्यवाद कि मुझे लाभ के लिये मुँह देखा व्यवहार करने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि मेरी ज़रूरतें आप पूरी करते हैं। धन्यवाद कि घमण्ड की बातों के बदले आपने सच्चाई और नम्रता से बोलना सिखाया।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 4

चुपके से हम में आ मिले हैं" यहूदा लिखता है। बाहर से हमला नहीं, भीतर की कुर्सियों पर बैठकर। खतरा यह था कि अनुग्रह को लुचपन में बदल दिया गया, यानी जिस क्षमा ने हमें आज़ाद किया, उसी को पाप का बहाना बना लिया गया। अपने आप से पूछो: क्या मैं किसी आदत को इसलिए पाले हूँ क्योंकि "परमेश्वर तो माफ कर ही देगा"? वह सोच बाहर से नहीं, मेरे अपने मन से चुपके से आती है।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 19

पिता, मुझे ऐसा दिल दीजिए जो जोड़े, तोड़े नहीं। जहाँ मेरी बातों से दरार पड़ी हो, वहाँ मुझे माफी माँगने की हिम्मत दीजिए। मेरे भीतर अपनी आत्मा का काम कीजिए, ताकि मैं सिर्फ अपनी समझ और अपने स्वार्थ से न जिऊँ, बल्कि आपकी अगुवाई में चलूँ।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 7

पिता, बीते समय की चेतावनियाँ मुझे डराने नहीं, जगाने के लिए हैं। जहाँ मेरा मन गलत राहों की ओर खिंचता है, वहाँ मुझे थाम ले। मुझे ऐसा जीवन दे जो तेरी पवित्रता से मेल खाए, और तेरी दया पर भरोसा करना सिखा।

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