लूका 18
पाठ का सार
लूका 18 दो प्रार्थनाओं के बीच खिंचा हुआ अध्याय है। एक विधवा जो अधर्मी न्यायी के दरवाज़े पर हार नहीं मानती, और एक चुंगी लेनेवाला जो मन्दिर में दूर खड़ा होकर छाती पीटता है। इनके बीच यीशु बच्चों को गले लगाते हैं, एक धनी सरदार को सब कुछ छोड़ने की चुनौती देते हैं, अपनी मृत्यु और पुनरुत्थान की घोषणा करते हैं, और अन्त में यरीहो के अंधे भिखारी को दृष्टि देते हैं, जो उन्हीं शब्दों में चिल्लाया था जो चुंगी लेनेवाले के होंठों पर थे।
मूल बात
इस पूरे अध्याय की रीढ़ एक ही वाक्य है: "जो मनुष्य से नहीं हो सकता, वह परमेश्वर से हो सकता है।" उद्धार मनुष्य की उपलब्धि नहीं, परमेश्वर का असम्भव कार्य है। फरीसी के पास वह सब कुछ था जिसे धार्मिकता कहा जाता है, दो बार उपवास, पूरा दसवाँ अंश, और फिर भी वह धर्मी ठहरकर घर नहीं गया। चुंगी लेनेवाले के पास कुछ नहीं था, केवल एक याचना, और वही "धर्मी ठहरा"। यह अनुग्रह की परिभाषा है: परमेश्वर दोषी को दोषमुक्त घोषित करते हैं, उसकी योग्यता के कारण नहीं, बल्कि अपनी दया के कारण। धनी सरदार इस बात पर ठोकर खाता है, क्योंकि जो कुछ पास में है वही सबसे बड़ी बाधा बन जाती है।
बड़ी कहानी का धागा
चुंगी लेनेवाले की प्रार्थना हवा में लटकी नहीं रहती। परमेश्वर पापी को धर्मी कैसे ठहरा सकते हैं और फिर भी न्यायी बने रह सकते हैं? इस अध्याय के बीचोंबीच उत्तर पड़ा है, वहाँ जहाँ यीशु बारहों को अलग ले जाकर कहते हैं कि यरूशलेम में वह सब पूरा होगा जो भविष्यद्वक्ताओं ने लिखा: उपहास, थूक, कोड़े, मृत्यु, और तीसरे दिन जी उठना। दया मुफ़्त है, पर मुफ़्त में मिली नहीं। मन्दिर में जो प्रायश्चित की बलि चढ़ती थी, उसी की गूँज में वह चुंगी लेनेवाला खड़ा था, और वह बलि अब स्वयं परमेश्वर का पुत्र बन रहा था। पुराने नियम की हर वाचा जो टूटी थी, यहाँ एक ऐसे व्यक्ति में पूरी होती है जो हमारी जगह टूटता है।
दर्पण
आप शायद प्रार्थना में यह वाक्य कभी नहीं कहेंगे कि "मैं इस चुंगी लेनेवाले के समान नहीं हूँ", पर आप उसे सोचते हैं। जब आप किसी सहकर्मी के तलाक की खबर सुनते हैं, जब कलीसिया में कोई बार-बार गिरता है, जब आपका बच्चा वह करता है जो आपने कभी नहीं किया, तब मन में जो हल्की-सी राहत उठती है, वही फरीसी की प्रार्थना है। और धनी सरदार आपके भीतर भी बैठा है, हर उस चीज़ में जिसे आप गिनते हैं: बचत, प्रतिष्ठा, नियन्त्रण, वह छवि कि आप भरोसेमन्द व्यक्ति हैं। यीशु ने उससे नैतिकता नहीं माँगी, सुरक्षा माँगी। सवाल यह नहीं कि आपके पास कितना है, बल्कि यह कि उसे छोड़ने की बात सुनकर आपके चेहरे का रंग बदलता है या नहीं।
शास्त्र की गूँज
चुंगी लेनेवाले के शब्द भजन 51 से उठे हैं, दाऊद की वह प्रार्थना जो व्यभिचार और हत्या के बाद निकली थी: "हे परमेश्वर, अपनी करुणा के अनुसार मुझ पर अनुग्रह कर।" इसका अर्थ यह है कि यह प्रार्थना छोटे पापियों की नहीं, बड़े पापियों की है, और परमेश्वर ने उसे पहले भी सुना था। दूसरी गूँज पौलुस के पास है, जो रोमियों में यही क्रिया इस्तेमाल करता है, कि परमेश्वर भक्तिहीन को धर्मी ठहराते हैं। लूका 18 वह दृष्टान्त है जिसका धर्मशास्त्र पौलुस बाद में लिखेगा। यीशु ने कहानी सुनाई, पौलुस ने उसे नाम दिया।
मुख्य पात्र
अंधा भिखारी इस अध्याय की सबसे स्पष्ट तस्वीर है। वह सड़क के किनारे बैठा है, समाज की हाशिये पर, आवाज़ के सहारे जीता हुआ। भीड़ उसे डाँटती है, ठीक वैसे ही जैसे चेलों ने बच्चों को डाँटा था, क्योंकि धार्मिक भीड़ हमेशा यह तय करना चाहती है कि यीशु तक कौन पहुँच सकता है। पर वह और भी ज़ोर से चिल्लाता है। उसकी पुकार में एक धर्मशास्त्रीय दावा छिपा है: "दाऊद की सन्तान"। वह देख नहीं सकता, फिर भी उसने वह पहचान लिया जो चेले नहीं समझ पाए। और जब चंगाई मिलती है, वह घर नहीं लौटता; वह पीछे हो लेता है। यही विश्वास का पूरा चक्र है: याचना, दया, और अनुगमन।
कठिन प्रश्न
यीशु कहते हैं परमेश्वर अपने चुने हुओं का न्याय "तुरन्त" चुकाएँगे। पर विधवा वर्षों पुकारती रही, और आज भी लोग वर्षों पुकारते हैं। जिन माता-पिता ने अपने बच्चे के लिए दस साल प्रार्थना की और कुछ नहीं बदला, उनके लिए यह "तुरन्त" कड़वा लग सकता है। लूका इसे मीठा नहीं करता। ध्यान दीजिए कि यीशु का अपना निष्कर्ष उत्तर नहीं, प्रश्न है: "क्या वह पृथ्वी पर विश्वास पाएगा?" यानी असली संकट परमेश्वर की देरी नहीं, हमारा थक जाना है। परमेश्वर का समय अनन्तता की घड़ी से चलता है, और वह न्याय पूरा तब होगा जब मनुष्य का पुत्र लौटेगा। तब तक हमें रहस्य के साथ जीना है, पर अकेले नहीं: वही न्यायी स्वयं क्रूस पर अन्याय सह चुका है।
मनन के प्रश्न
आपकी प्रार्थना में कौन-सा वाक्य असल में फरीसी का है, भले ही शब्द विनम्र हों?
यीशु आज आपसे पूछें कि "तू क्या चाहता है, मैं तेरे लिये करूँ", तो क्या आप ईमानदारी से उत्तर देने की हिम्मत करेंगे?
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Luke 18 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
लूका 18 का क्या अर्थ है?
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लूका 18 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
लूका 18 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
लूका 18 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Luke 18 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
धन्यवाद कि जब मैं दूर खड़ा होकर आँखें भी उठा नहीं पाता, तब भी तू सुनता है। उस चुंगी लेनेवाले की छोटी सी पुकार, "हे परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर," तूने ठुकराई नहीं। धन्यवाद कि मेरी टूटी हुई प्रार्थना भी तेरे सामने स्वीकार होती है।
यीशु ने यह दृष्टान्त उन लोगों से कहा, "जो अपने ऊपर भरोसा रखते थे, कि हम धर्मी हैं और दूसरों को तुच्छ जानते थे।" ध्यान दे, ये दो बातें साथ चलती हैं। जिस पल मैं अपनी धार्मिकता पर टिकता हूँ, उसी पल किसी और को नीचा देखना शुरू कर देता हूँ। अपने मन की जाँच का सबसे सच्चा पैमाना यही है: आज मैंने किसे तुच्छ समझा?
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