मरकुस 1:2
पाठ
मरकुस अपनी पुस्तक यीशु के जन्म से नहीं, बल्कि एक पुराने उद्धरण से खोलते हैं। पहले पद में उन्होंने घोषणा की, "परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह के सुसमाचार का आरम्भ", और तुरन्त अगली साँस में वे पीछे मुड़कर भविष्यद्वक्ताओं की ओर इशारा करते हैं: "जैसे यशायाह भविष्यद्वक्ता की पुस्तक में लिखा है।" फिर वह वाक्य आता है जिसमें परमेश्वर स्वयं किसी को सम्बोधित करते हैं: "देख, मैं अपने दूत को तेरे आगे भेजता हूँ, जो तेरे लिये मार्ग सुधारेगा।" यानी सुसमाचार की शुरुआत में ही एक दूत है, एक रास्ता है, और एक आनेवाला है जिसके लिए वह रास्ता बनाया जा रहा है। कहानी शुरू होने से पहले ही तैयारी चल रही है।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि वाक्य का कर्ता कौन है: "मैं भेजता हूँ।" पहल परमेश्वर की है, हमारी नहीं। सुसमाचार आकस्मिक नहीं, किसी संकट की जल्दबाजी में की गई प्रतिक्रिया नहीं; वह लिखा जा चुका था, बोला जा चुका था, सदियों पहले तय हो चुका था। मरकुस यह कहकर हमें बताते हैं कि जो गलील में होने जा रहा है वह परमेश्वर की पुरानी वाचा का ही अगला अध्याय है, कोई नया धर्म नहीं।
और फिर वह छोटा-सा शब्द "तेरे" है। मलाकी में परमेश्वर कहते थे, दूत मेरे आगे रास्ता तैयार करेगा। मरकुस उसे यीशु पर लागू करते हैं। जिसका रास्ता तैयार हो रहा है, वही परमेश्वर हैं जो आ रहे हैं। राजा की सड़क बनती है क्योंकि राजा सचमुच आ रहा है। अनुग्रह पहले चलता है; आप उसे खोजें, उससे पहले वे आपके लिए मार्ग बनवा चुके हैं।
जोड़ने वाला सूत्र
यह आधा पद बाइबल के दो सिरों को एक गाँठ में बाँध देता है। मलाकी की भविष्यवाणी इस्राएल के इतिहास के आखिरी लिखित शब्दों में से थी, और उसके बाद लगभग चार सौ साल की चुप्पी आई: कोई भविष्यद्वक्ता नहीं, कोई नई आवाज़ नहीं, बस मन्दिर, कब्ज़ा करनेवाली साम्राज्यशक्तियाँ और एक थकी हुई प्रतीक्षा। मरकुस उस चुप्पी को इस उद्धरण से तोड़ते हैं, मानो कह रहे हों: परमेश्वर ने वाक्य अधूरा नहीं छोड़ा था, बस विराम लिया था।
और मार्ग बनाने का चित्र पुराना है। बेबीलोन की बँधुआई से लौटती हुई प्रजा के लिए यशायाह ने रेगिस्तान में एक राजमार्ग की बात की थी, और अगला पद उसे दोहराता है: "जंगल में एक पुकारनेवाले का शब्द हो रहा है कि प्रभु का मार्ग तैयार करो।" उद्धार हमेशा एक यात्रा रही है, और अब जो यात्रा शुरू होती है वह क्रूस तक जाएगी। सड़क बन रही है, और उसका अंत गुलगुता है।
दर्पण
अब यह पद आपकी ओर मुड़ता है, और वह जगह जहाँ यह चुभता है, शायद यह है: आप शुरुआत करना चाहते हैं। अपने विश्वास की, अपनी प्रार्थना की, अपने बदलाव की। और आप बार-बार पाते हैं कि आप देर से पहुँचे हैं, कि दूसरे आगे निकल गए, कि आपकी आत्मिक ज़िन्दगी बस टालमटोल का एक लम्बा सिलसिला है। यह पद उस पूरी गिनती को उलट देता है। जब आप सोच रहे थे कि आपको परमेश्वर तक पहुँचने का रास्ता बनाना है, वे कह रहे थे, "मैं अपने दूत को तेरे आगे भेजता हूँ।"
पर यही पद एक और चीज़ नंगी करता है। दूत का काम है "मार्ग सुधारेगा" यानी टेढ़ा सीधा करना, मलबा हटाना। कोई भी सड़क बिना खुदाई के नहीं बनती। आपके भीतर कुछ है जो उस राजा के आने के रास्ते में पड़ा है: वह पुराना गुस्सा जिसे आपने सिद्धान्त बना लिया है, वह खर्च जिसे आप किसी को दिखाते नहीं, वह रिश्ता जिसमें आप सही होना चाहते हैं, माफ़ करना नहीं। परमेश्वर आपसे सड़क बनाने को नहीं कहते; वे कहते हैं, रास्ते से हट जाइए और मलबा हटने दीजिए।
आज दस मिनट लीजिए, कागज़ पर वह एक चीज़ लिखिए जो इस समय आपके और परमेश्वर के बीच सबसे बड़ा पत्थर है, फिर उसे ज़ोर से पढ़कर कहिए: "यह रास्ता आपका है।" कागज़ फाड़िए मत, कल फिर देखिए।
पृष्ठभूमि
मरकुस लगभग सन् 60 से 70 के दशक में लिख रहे हैं, सम्भवतः रोम में, ऐसे विश्वासियों के लिए जिनके लिए मसीह का नाम लेना जान का जोखिम बन चुका था। "सुसमाचार" शब्द उनके कानों में राजनीतिक गूँज रखता था: सम्राट की जीत या उसके सिंहासन पर बैठने की घोषणा को यही नाम दिया जाता था। मरकुस उस शब्द को छीनकर एक गलीली बढ़ई के बेटे पर लगा देते हैं।
एक बात जो पढ़ते हुए खटकती है: उद्धरण "यशायाह भविष्यद्वक्ता की पुस्तक में" कहकर शुरू होता है, पर यह पहला हिस्सा मलाकी से है और अगला यशायाह से। उस समय यह सामान्य रीति थी कि जुड़े हुए उद्धरणों को सबसे प्रमुख भविष्यद्वक्ता के नाम से दिया जाए। मरकुस लापरवाह नहीं हैं; वे पूरे भविष्यद्वक्ताओं की आवाज़ को एक स्वर में सुन रहे हैं।
मुख्य पात्र
इस पद में तीन लोग हैं, पर बोल एक ही रहा है: परमेश्वर। "मैं भेजता हूँ" में जो प्रकट होता है, वह कोई दूर बैठा, हाथ पर हाथ धरे देवता नहीं है। वे बोलते हैं, भेजते हैं, तैयारी करवाते हैं। इस्राएल का परमेश्वर ऐसा है जो पहले आने की घोषणा करता है, फिर आता है, ताकि जब वह आए तो लोग उसे पहचान सकें।
और यहाँ एक कोमलता है जिस पर हम कम रुकते हैं। परमेश्वर बिना चेतावनी के प्रकट हो सकते थे; उनकी महिमा को किसी की मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं। पर वे एक दूत भेजते हैं, ऊँट के रोम पहनने वाला, जंगल में चिल्लाने वाला एक आदमी, ताकि हमें सम्भलने का समय मिले। यह उस पिता का धैर्य है जो दरवाज़ा तोड़ता नहीं, खटखटाने से पहले आवाज़ देता है।
कठिन प्रश्न
अगर परमेश्वर सर्वशक्तिमान हैं, तो उन्हें रास्ता क्यों चाहिए? क्या हमारी तैयारी न होने से वे रुक जाते हैं? पद इस पर सीधा जवाब नहीं देता, और मुझे लगता है यह ईमानदारी है। इतिहास में परमेश्वर नहीं रुके: यूहन्ना पकड़वाया गया, यीशु फिर भी आए, अधिकांश ने पहचाना नहीं, और वे फिर भी क्रूस तक गए। उनकी आमद हमारी सहमति पर टिकी नहीं।
पर मेरे और आपके अनुभव में यह सब कुछ बदल देता है। बिना तैयारी के आदमी के लिए मसीह का आना उद्धार नहीं, खतरा महसूस होता है। वही रोशनी किसी को घर दिखाती है और किसी की आँखें चुभोती है। तो सवाल यह नहीं कि परमेश्वर आएँगे या नहीं। सवाल यह है कि जब वे आएँ, तो उनका आना आपके लिए क्या होगा। और यह बेचैनी बनी रहनी चाहिए; इसे जल्दी शान्त कर देना बेईमानी होगी।
चिंतन
आपके जीवन में वह "दूत" कौन रहा है, वह आवाज़ या व्यक्ति जिसने मसीह के लिए रास्ता साफ़ किया, और क्या आपने उसे कभी धन्यवाद कहा?
अगर परमेश्वर आपके आने से बहुत पहले चल पड़े थे, तो आपकी आत्मिक ज़िन्दगी में देर हो जाने का जो डर है, वह असल में किस बात से आता है?
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Mark 1:2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मरकुस 1:2 का क्या अर्थ है?
मरकुस 1:2 किस विषय में है?
मरकुस 1:2 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मरकुस 1:2 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मरकुस 1:2 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Mark 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
सुबह अंधेरे में यीशु सुनसान जगह में प्रार्थना कर रहे थे, तभी शमौन उन्हें ढूँढ़ता हुआ आया और बोला, "सब लोग तुझे ढूँढ़ रहे हैं।" सुनने में यह अच्छी खबर लगती है, पर असल में यह एक दबाव था। यीशु ने भीड़ की माँग नहीं, पिता की इच्छा चुनी, और आगे दूसरे गाँवों को चल दिए। तुझे भी कोई आवाज़ खींच रही है? पहले एकांत में जा, फिर तय कर।
यरूशलेम में मंदिर था, याजक थे, बलिदान की सारी व्यवस्था थी। फिर भी लोग निकलकर सुनसान जंगल में गए, "और अपने पापों को मानकर यरदन नदी में उससे बपतिस्मा लिया।" पाप मानने के लिए उन्हें शहर छोड़ना पड़ा। कहीं तुम भी तो धार्मिक भीड़ में छिपे नहीं हो? कुछ बातें कहने के लिए बाहर निकलना पड़ता है।
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