बाइबल व्याख्या

मत्ती 14

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

हेरोदेस अपने जन्मदिन के भोज में एक नाचती हुई लड़की से खुश होकर शपथ खाता है, और उस शपथ की कीमत यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले का सिर बनता है, जो थाल में परोसा जाता है। यूहन्ना के चेले यीशु को यह समाचार देते हैं, और यीशु "नाव पर चढ़कर वहाँ से किसी सुनसान जगह को, एकान्त में चला गया।" पर एकान्त उन्हें नहीं मिलता: भीड़ पीछे आ जाती है, और वे पाँच रोटियों और दो मछलियों से हज़ारों को तृप्त करते हैं। उसी रात, जब चेलों की नाव विपरीत हवा में डगमगाती है, वे पानी पर चलते हुए उनके पास आते हैं और पतरस को डूबते हुए थाम लेते हैं।

मर्म

इस अध्याय में दो भोज आमने-सामने रखे गए हैं, और यही इसका धड़कता हुआ हृदय है। एक भोज महल में है, जहाँ शराब, नाच और शपथ हैं, और अन्त में एक कटा हुआ सिर। दूसरा भोज घास पर है, जहाँ कुछ भी नहीं है, केवल पाँच रोटियाँ, और अन्त में "सब खाकर तृप्त हो गए"। दो प्रकार की सत्ता, दो प्रकार का राज्य। हेरोदेस की मेज़ पर जीवन छीना जाता है, यीशु की मेज़ पर जीवन बाँटा जाता है। परमेश्वर का राज्य ज़ोर से नहीं आता; वह तरस खाने से आता है, तोड़ने और देने से आता है। और ध्यान दीजिए, मत्ती हमें यह बताने की जल्दी में नहीं है कि यूहन्ना क्यों नहीं बचाया गया। वह प्रश्न खुला छोड़ दिया गया है, जैसे कई प्रश्न हमारे जीवन में खुले छूट जाते हैं।

सूत्र

यीशु का हाथ रोटियों पर वही करता है जो बाद में ऊपरी कमरे में करेगा: लिया, धन्यवाद किया, तोड़ा, दिया। मत्ती यह क्रम जानबूझकर दोहराते हैं। जो व्यक्ति यहाँ रोटी तोड़ रहा है, वही आगे चलकर स्वयं टूटेगा। और सुनसान जगह में भीड़ को खिलाना इस्राएल की सबसे पुरानी स्मृति को जगाता है, जब जंगल में मन्ना गिरता था और कोई भूखा नहीं रहा। जो परमेश्वर उजाड़ में मेज़ सजाते थे, वे अब घास पर बैठे लोगों के बीच खड़े हैं। पानी पर चलने में वही सूत्र और गहरा हो जाता है: समुद्र, जो पुराने नियम में अराजकता और मृत्यु का चिह्न है, यीशु के पाँवों के नीचे रास्ता बन जाता है। यूहन्ना की कब्र के साये में मत्ती हमें दिखाते हैं कि मृत्यु का पानी किसे उठा सकता है।

दर्पण

आपने भी कभी वह चाहा होगा जो यीशु ने चाहा: थोड़ी देर अकेले रहना, क्योंकि कोई ख़बर आई है जिसे पचाना है। और आपको भी शायद वह नहीं मिला। बच्चा दरवाज़ा खटखटाता है, फ़ोन बजता है, भीड़ पैदल पीछे चली आती है। यह पाठ आपको यह नहीं सिखाता कि दुःख को दबा दीजिए; यह दिखाता है कि यीशु ने दुःख के भीतर से तरस खाया, न कि दुःख को अनदेखा करके। और चेलों का वाक्य हमारे अपने हिसाब-किताब जैसा लगता है: "यहाँ हमारे पास पाँच रोटी और दो मछलियों को छोड़ और कुछ नहीं है।" हम भी अपनी कमी गिनकर ज़िम्मेदारी टालते हैं, समय की कमी, पैसे की कमी, धीरज की कमी। यीशु उस गिनती को नकारते नहीं। वे कहते हैं, "उनको यहाँ मेरे पास ले आओ।"

एक बारीकी

पद 27 में जो शब्द हिन्दी में "मैं हूँ" पढ़ा जाता है, वह मूल यूनानी में एगो एइमि है, और यह वही वाक्यांश है जिससे जलती हुई झाड़ी में परमेश्वर ने अपना नाम बताया था। पानी पर चलती हुई आकृति केवल यह नहीं कह रही, "घबराओ मत, यह मैं ही हूँ, तुम्हारा गुरु।" वह कह रही है कुछ ऐसा जो चेलों के भीतर धीरे-धीरे उतरता है और अन्त में उनसे कहलवाता है, "सचमुच, तू परमेश्वर का पुत्र है।" अँधेरे में, रात के चौथे पहर, विपरीत हवा में, पहचान का यह क्षण आता है। रोशनी में नहीं। और यह भी ध्यान दीजिए: वे पहले नाम बताते हैं, फिर तूफ़ान थमता है। भरोसा हालात बदलने से पहले माँगा जाता है।

पहले सुननेवाले

मत्ती जिन यहूदी विश्वासियों के लिए लिख रहे थे, वे हेरोदेस जैसे शासकों को अच्छी तरह जानते थे: ऐसे राजा जो लोगों से डरते थे पर मेहमानों के सामने शर्मिंदा होने से और ज़्यादा डरते थे। "राजा दुःखित हुआ, पर अपनी शपथ के, और साथ बैठनेवालों के कारण, आज्ञा दी" — यह वाक्य उन्हें अपने समय के हर कायर अधिकारी की याद दिलाता होगा। और वे स्वयं सता झेल रहे थे। उनके लिए यूहन्ना की मौत कोई दूर की कहानी नहीं थी, बल्कि उनका अपना संभावित अन्त था। इसीलिए डगमगाती नाव उनके लिए केवल एक चमत्कार-कथा नहीं थी। वह उनकी अपनी मण्डली थी: विपरीत हवा, रात, और यह प्रश्न कि क्या प्रभु सचमुच आएँगे।

मुख्य पात्र

इस पूरे अध्याय में यीशु की एक ही मुद्रा बार-बार लौटती है: वे लोगों की ओर बढ़ते हैं। दुःख की ख़बर सुनकर वे पीछे हटते हैं, पर भीड़ देखकर "उन पर तरस खाया"। रात भर प्रार्थना में अकेले रहने के बाद वे झील पार करके चेलों के पास आते हैं। पतरस डूबने लगता है और "यीशु ने तुरन्त हाथ बढ़ाकर उसे थाम लिया"। यह हाथ पहले बढ़ता है, प्रश्न बाद में आता है: "तूने क्यों सन्देह किया?" यही क्रम सुसमाचार है। और फिर भी यह व्यक्ति रहस्य बना रहता है: जो पहाड़ पर अकेले प्रार्थना करते हैं, जो शोक करते हैं, जो लहरों पर चलते हैं। हम उन्हें पूरी तरह समझ नहीं पाते; हम केवल उनके बढ़े हुए हाथ को पकड़ सकते हैं।

मनन के प्रश्न

आपके हाथ में इस समय कौन-सी "पाँच रोटियाँ" हैं जिन्हें आप बहुत थोड़ा मानकर छिपाए बैठे हैं, और उन्हें यीशु के पास ले आने का व्यावहारिक अर्थ आपके लिए क्या होगा?

पतरस डूबते समय चिल्लाया, "हे प्रभु, मुझे बचा।" आपके जीवन में वह कौन-सी जगह है जहाँ आपने अब तक यह पुकार लगाने से इनकार किया है, और क्यों?

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Matthew For Everyone, Part 1

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The Message of Matthew

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The King and his kingdom, traced through the whole Gospel.

Matthew: An Introduction and Commentary

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A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Matthew

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The Message of the Sermon on the Mount

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Matthew 14 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 14 का क्या अर्थ है?
हेरोदेस अपने जन्मदिन के भोज में एक नाचती हुई लड़की से खुश होकर शपथ खाता है, और उस शपथ की कीमत यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले का सिर बनता है, जो थाल में परोसा जाता है। यूहन्ना के चेले यीशु को यह समाचार देते हैं, और यीशु "नाव पर चढ़कर वहाँ से किसी सुनसान जगह को, एकान्त में चला गया।" पर एकान्त उन्हें नहीं मिलता: भीड़ पीछे आ जाती है, और वे पाँच रोटियों और दो मछलियों से हज़ारों को तृप्त करते हैं। उसी रात, जब चेलों की नाव विपरीत हवा में डगमगाती है, वे पानी पर चलते हुए उनके पास आते हैं और पतरस को डूबते हुए थाम लेते हैं।
मत्ती 14 किस विषय में है?
यीशु का हाथ रोटियों पर वही करता है जो बाद में ऊपरी कमरे में करेगा: लिया, धन्यवाद किया, तोड़ा, दिया। मत्ती यह क्रम जानबूझकर दोहराते हैं। जो व्यक्ति यहाँ रोटी तोड़ रहा है, वही आगे चलकर स्वयं टूटेगा। और सुनसान जगह में भीड़ को खिलाना इस्राएल की सबसे पुरानी स्मृति को जगाता है, जब जंगल में मन्ना गिरता था और कोई भूखा नहीं रहा। जो परमेश्वर उजाड़ में मेज़ सजाते थे, वे अब घास पर बैठे लोगों के बीच खड़े हैं। पानी पर चलने में वही सूत्र और गहरा हो जाता है: समुद्र, जो पुराने नियम में अराजकता और मृत्यु का चिह्न है, यीशु के पाँवों के नीचे रास्ता बन जाता है। यूहन्ना की कब्र के साये में मत्ती हमें दिखाते हैं कि मृत्यु का पानी किसे उठा सकता है।
मत्ती 14 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पद 27 में जो शब्द हिन्दी में "मैं हूँ" पढ़ा जाता है, वह मूल यूनानी में एगो एइमि है, और यह वही वाक्यांश है जिससे जलती हुई झाड़ी में परमेश्वर ने अपना नाम बताया था। पानी पर चलती हुई आकृति केवल यह नहीं कह रही, "घबराओ मत, यह मैं ही हूँ, तुम्हारा गुरु।" वह कह रही है कुछ ऐसा जो चेलों के भीतर धीरे-धीरे उतरता है और अन्त में उनसे कहलवाता है, "सचमुच, तू परमेश्वर का पुत्र है।" अँधेरे में, रात के चौथे पहर, विपरीत हवा में, पहचान का यह क्षण आता है। रोशनी में नहीं। और यह भी ध्यान दीजिए: वे पहले नाम बताते हैं, फिर तूफ़ान थमता है। भरोसा हालात बदलने से पहले माँगा जाता है।
मत्ती 14 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इस पूरे अध्याय में यीशु की एक ही मुद्रा बार-बार लौटती है: वे लोगों की ओर बढ़ते हैं। दुःख की ख़बर सुनकर वे पीछे हटते हैं, पर भीड़ देखकर "उन पर तरस खाया"। रात भर प्रार्थना में अकेले रहने के बाद वे झील पार करके चेलों के पास आते हैं। पतरस डूबने लगता है और "यीशु ने तुरन्त हाथ बढ़ाकर उसे थाम लिया"। यह हाथ पहले बढ़ता है, प्रश्न बाद में आता है: "तूने क्यों सन्देह किया?
मत्ती 14 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पतरस डूबते समय चिल्लाया, "हे प्रभु, मुझे बचा।" आपके जीवन में वह कौन-सी जगह है जहाँ आपने अब तक यह पुकार लगाने से इनकार किया है, और क्यों?
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Matthew 14 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 3

यूहन्ना ने कोई विद्रोह नहीं किया था, कोई सेना खड़ी नहीं की थी। उसने बस सच कहा था। "क्योंकि हेरोदेस ने अपने भाई फिलिप्पुस की पत्नी हेरोदियास के कारण यूहन्ना को पकड़कर बाँधा और बन्दीगृह में डाल दिया था।" एक स्त्री के कारण, यानी एक ऐसे पाप के कारण जिसे हेरोदेस छोड़ना नहीं चाहता था। सोचो, क्या तुम्हारे जीवन में भी कोई सच है जिसे तुमने चुप करा दिया है, सिर्फ इसलिए कि वह तुम्हें बदलने को कहता है?

प्रार्थना संपादकीय पर पद 12

पिता, जब दिल टूटता है और शब्द नहीं मिलते, हमें बस यही रास्ता याद रहे कि सीधे तेरे पास आ जाएँ। हमारे आँसू, हमारा खालीपन, हमारे अनकहे सवाल, सब तेरे सामने रख देते हैं। तू सुनता है, यही हमारे लिए काफी है। हमें थामे रख।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 27

तूफान थमा नहीं था जब यीशु ने कहा, "ढाढ़स बाँधो! मैं हूँ; डरो मत।" लहरें वैसी ही ऊँची थीं, हवा वैसी ही तेज़। बदला सिर्फ़ इतना कि वे अब अकेले नहीं थे। ध्यान दे, चेलों ने उन्हें देखकर चिल्लाया था, क्योंकि डर में हम अपने उद्धारकर्ता को भी भूत समझ बैठते हैं। तेरी रात के जिस पहर में डर सबसे गहरा है, वहीं वे चल कर आते हैं।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 16

यीशु ने चेलों से कहा, "उनका जाना ज़रूरी नहीं, तुम ही उन्हें खाने को दो।" कितनी अजीब बात है। भीड़ भूखी थी, और चेलों के पास सिर्फ़ पाँच रोटी और दो मछली थीं। फिर भी यीशु ने ज़िम्मेदारी उन्हीं के हाथ में थमा दी।

आज भी वह यही करता है। तेरे पास जो थोड़ा है, वही उसके हाथ में रख। कमी तेरी नहीं, उसकी चिंता है। तू बस देना शुरू कर।

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