बाइबल व्याख्या

मत्ती 18:18

बाइबल

पाठ

चेलों के बीच जो भाई सुनने से इनकार करता है, उसके बारे में यीशु अभी-अभी कठोर बात कह चुके हैं: "तो तू उसे अन्यजाति और चुंगी लेनेवाले के जैसा जान।" और ठीक उसी साँस में, बिना रुके, वे एक और वाक्य जोड़ते हैं जो उस कठोरता को स्वर्ग तक उठा ले जाता है: "मैं तुम से सच कहता हूँ, जो कुछ तुम पृथ्वी पर बाँधोगे, वह स्वर्ग पर बँधेगा और जो कुछ तुम पृथ्वी पर खोलोगे, वह स्वर्ग में खुलेगा।" यानी शिष्यों की छोटी-सी मंडली जब किसी को दूर रखती है या फिर से गले लगाती है, तो वह निर्णय केवल धरती की बहीखाता में दर्ज नहीं होता। यह पद कोई अलग-थलग सूत्र नहीं है; यह उस भटकी भेड़ वाली कहानी और सत्तर गुना सात बार क्षमा करने की माँग के बीच खड़ा है।

मूल बात

"बाँधना" और "खोलना" यीशु के समय की जानी-पहचानी भाषा थी: रब्बी इन्हीं शब्दों से कहते थे कि कोई बात वर्जित है या अनुमत, कोई व्यक्ति समुदाय से बाहर है या भीतर। यीशु यह अधिकार किसी मंदिर, किसी महासभा, किसी पद को नहीं, बल्कि उस मंडली को सौंपते हैं जो दो-तीन की संख्या में उनके नाम पर इकट्ठी होती है। यहाँ परमेश्वर के बारे में कुछ चौंकाने वाला कहा जा रहा है: वे अपने आपको एक मानवीय, कमजोर, गलती करने वाली संगति के फैसले से जोड़ लेते हैं। पर ध्यान दीजिए कि यह अधिकार किस संदर्भ में दिया गया है, दंड देने के लिए नहीं बल्कि भाई को "पा लेने" के लिए। स्वर्ग का अधिकार यहाँ क्षमा की सेवा में लगाया गया है, वर्चस्व की नहीं।

जोड़ने वाला सूत्र

बाँधने और खोलने की छवि आसमान से नहीं टपकी। यशायाह 22 में परमेश्वर एलियाकीम के कंधे पर दाऊद के घराने की कुंजी रखते हैं: वह खोलेगा और कोई बंद न करेगा, वह बंद करेगा और कोई न खोलेगा। यह भाषा प्रकाशितवाक्य 3 में सीधे मसीह पर लागू होती है, और मत्ती 16 में यीशु वही कुंजियाँ पतरस को थमाते हैं। अठारहवें अध्याय में वे यह अधिकार किसी एक आदमी के हाथ से निकालकर पूरी संगति के हाथ में रख देते हैं। मुक्ति की कहानी में यह एक नया मोड़ है: जो अधिकार पहले मंदिर के द्वार और याजक के फैसले में बँधा था, वह अब क्रूस के बाद उस समुदाय में बहता है जिसे मसीह ने स्वयं क्षमा किया है। कुंजी वही है, हाथ बदल गए हैं।

दर्पण

हम सब के भीतर एक छोटा-सा न्यायालय चलता रहता है। वह बहनोई जिसने पैसे लौटाए नहीं, वह सहकर्मी जिसने मीटिंग में आपको नीचा दिखाया, वह पुराना मित्र जिसका संदेश आप जानबूझकर नहीं पढ़ते। आपने उन्हें बाँध रखा है, बिना किसी औपचारिक फैसले के, बस दिल के भीतर ताला लगाकर। यह पद डराने वाला इसलिए है क्योंकि यीशु कहते हैं कि यह ताला केवल आपके भीतर नहीं रहता; इसकी गूँज स्वर्ग तक जाती है। और साथ ही यही पद राहत भी देता है: खोलने का अधिकार भी उतना ही असली है। आप किसी को सचमुच मुक्त कर सकते हैं। आज एक काम कीजिए: एक कागज पर उस व्यक्ति का नाम लिखिए जिसे आपने अपने मन में बंद कर रखा है, और उस नाम पर हाथ रखकर ऊँची आवाज़ में कहिए, "मैं तुझे छोड़ता हूँ, परमेश्वर के सामने।"

श्रोताओं का चेहरा

मत्ती जिन विश्वासियों के लिए लिख रहे थे, वे अधिकतर यहूदी पृष्ठभूमि से थे और कई सभाघर से बाहर निकाले जाने का दर्द जानते थे। उन्होंने अनुभव किया था कि किसी समुदाय से "बाँधा" जाना कैसा लगता है। अब यीशु उन्हीं के हाथ में वही अधिकार रखते हैं, और यह खतरनाक है: सताया हुआ आसानी से सताने वाला बन जाता है। इसलिए संदर्भ महत्वपूर्ण है। उनके पास न बिशप थे, न कोई भवन, न कानूनी हैसियत। "दो या तीन" इकट्ठे होते थे, जबकि सभाघर की प्रार्थना के लिए दस पुरुष चाहिए थे। इतनी छोटी, इतनी कमजोर सभा को यह सुनना कि स्वर्ग उनके निर्णय के साथ खड़ा है, चौंकाने वाला भी था और काँपने लायक भी।

शास्त्र की गूँज

यूहन्ना 20 में जी उठे यीशु चेलों पर फूँककर कहते हैं कि जिनके पाप तुम क्षमा करोगे वे क्षमा किए गए हैं। वही अधिकार, पर अब स्पष्ट रूप से पवित्र आत्मा से जुड़ा हुआ; बाँधना-खोलना कोई प्रशासनिक शक्ति नहीं, आत्मा की सेवा है। तनाव भी दिखता है: 1 कुरिन्थियों 5 में पौलुस एक आदमी को संगति से बाहर करते हैं, और 2 कुरिन्थियों 2 में उसी मंडली से कहते हैं कि अब उसे क्षमा करो और सांत्वना दो, कहीं वह अत्यधिक उदासी में डूब न जाए। बाँधना कभी अंतिम शब्द नहीं था। और उत्पत्ति 4 में लेमेक सत्तर गुना बदला लेने की डींग मारता है; यीशु उसी गिनती को उलटकर सत्तर गुना क्षमा बना देते हैं। वही अंक, ठीक उल्टी दिशा में।

मुख्य पात्र

इस पद के केंद्र में यीशु हैं, और उनका रुख असाधारण है। वे अपनी प्रतिष्ठा गलती करने वाले लोगों के हाथ में सौंप देते हैं। ठीक इसी अध्याय में वे जानते हैं कि पतरस गिनती करना चाहेगा, कि चेले अभी-अभी "बड़ा कौन है" पर झगड़ रहे थे। फिर भी वे कुंजी उन्हीं को देते हैं। यह भरोसा भोलापन नहीं, अनुग्रह है। और इसका सबसे गहरा प्रमाण आगे आता है: जो बाँधने का अधिकार देते हैं, वही कुछ ही अध्यायों बाद स्वयं बाँधे जाकर पीलातुस के पास ले जाए जाते हैं। मसीह ने स्वयं को बँधवाया ताकि उनके लोग खोलने वाले बन सकें। अधिकार की यह दिशा, ऊपर से नीचे नहीं बल्कि क्रूस से बाहर की ओर, पूरे सुसमाचार का हस्ताक्षर है।

चिंतन के प्रश्न

आपकी मंडली या छोटे समूह में जब किसी के बारे में फैसला होता है, तो क्या उसका लक्ष्य "भाई को पा लेना" होता है, या केवल व्यवस्था बनाए रखना?

यदि स्वर्ग सचमुच आपके खोलने के साथ खड़ा है, तो वह कौन-सा दरवाज़ा है जिसे आप वर्षों से बंद रखे हुए हैं, और किस डर से?

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Matthew For Everyone, Part 1

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The Message of Matthew

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The King and his kingdom, traced through the whole Gospel.

Matthew: An Introduction and Commentary

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Matthew 18:18 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 18:18 का क्या अर्थ है?
चेलों के बीच जो भाई सुनने से इनकार करता है, उसके बारे में यीशु अभी-अभी कठोर बात कह चुके हैं: "तो तू उसे अन्यजाति और चुंगी लेनेवाले के जैसा जान।" और ठीक उसी साँस में, बिना रुके, वे एक और वाक्य जोड़ते हैं जो उस कठोरता को स्वर्ग तक उठा ले जाता है: "मैं तुम से सच कहता हूँ, जो कुछ तुम पृथ्वी पर बाँधोगे, वह स्वर्ग पर बँधेगा और जो कुछ तुम पृथ्वी पर खोलोगे, वह स्वर्ग में खुलेगा।" यानी शिष्यों की छोटी-सी मंडली जब किसी को दूर रखती है या फिर से गले लगाती है, तो वह निर्णय केवल धरती की बहीखाता में दर्ज नहीं होता। यह पद कोई अलग-थलग सूत्र नहीं है; यह उस भटकी भेड़ वाली कहानी और सत्तर गुना सात बार क्षमा करने की माँग के बीच खड़ा है।
मत्ती 18:18 किस विषय में है?
बाँधने और खोलने की छवि आसमान से नहीं टपकी। यशायाह 22 में परमेश्वर एलियाकीम के कंधे पर दाऊद के घराने की कुंजी रखते हैं: वह खोलेगा और कोई बंद न करेगा, वह बंद करेगा और कोई न खोलेगा। यह भाषा प्रकाशितवाक्य 3 में सीधे मसीह पर लागू होती है, और मत्ती 16 में यीशु वही कुंजियाँ पतरस को थमाते हैं। अठारहवें अध्याय में वे यह अधिकार किसी एक आदमी के हाथ से निकालकर पूरी संगति के हाथ में रख देते हैं। मुक्ति की कहानी में यह एक नया मोड़ है: जो अधिकार पहले मंदिर के द्वार और याजक के फैसले में बँधा था, वह अब क्रूस के बाद उस समुदाय में बहता है जिसे मसीह ने स्वयं क्षमा किया है। कुंजी वही है, हाथ बदल गए हैं।
मत्ती 18:18 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मत्ती जिन विश्वासियों के लिए लिख रहे थे, वे अधिकतर यहूदी पृष्ठभूमि से थे और कई सभाघर से बाहर निकाले जाने का दर्द जानते थे। उन्होंने अनुभव किया था कि किसी समुदाय से "बाँधा" जाना कैसा लगता है। अब यीशु उन्हीं के हाथ में वही अधिकार रखते हैं, और यह खतरनाक है: सताया हुआ आसानी से सताने वाला बन जाता है। इसलिए संदर्भ महत्वपूर्ण है। उनके पास न बिशप थे, न कोई भवन, न कानूनी हैसियत। "दो या तीन" इकट्ठे होते थे, जबकि सभाघर की प्रार्थना के लिए दस पुरुष चाहिए थे। इतनी छोटी, इतनी कमजोर सभा को यह सुनना कि स्वर्ग उनके निर्णय के साथ खड़ा है, चौंकाने वाला भी था और काँपने लायक भी।
मत्ती 18:18 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इस पद के केंद्र में यीशु हैं, और उनका रुख असाधारण है। वे अपनी प्रतिष्ठा गलती करने वाले लोगों के हाथ में सौंप देते हैं। ठीक इसी अध्याय में वे जानते हैं कि पतरस गिनती करना चाहेगा, कि चेले अभी-अभी "बड़ा कौन है" पर झगड़ रहे थे। फिर भी वे कुंजी उन्हीं को देते हैं। यह भरोसा भोलापन नहीं, अनुग्रह है। और इसका सबसे गहरा प्रमाण आगे आता है: जो बाँधने का अधिकार देते हैं, वही कुछ ही अध्यायों बाद स्वयं बाँधे जाकर पीलातुस के पास ले जाए जाते हैं। मसीह ने स्वयं को बँधवाया ताकि उनके लोग खोलने वाले बन सकें। अधिकार की यह दिशा, ऊपर से नीचे नहीं बल्कि क्रूस से बाहर की ओर, पूरे सुसमाचार का हस्ताक्षर है।
मत्ती 18:18 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यदि स्वर्ग सचमुच आपके खोलने के साथ खड़ा है, तो वह कौन-सा दरवाज़ा है जिसे आप वर्षों से बंद रखे हुए हैं, और किस डर से?
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Matthew 18 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 23

पिता, धन्यवाद कि तू वह राजा है जिसने "अपने दासों से लेखा लेना चाहा", और मेरा भारी कर्ज़ अनदेखा नहीं किया, बल्कि उसे अपने ऊपर ले लिया। धन्यवाद कि तेरे राज्य में हिसाब सच्चाई से होता है और दया से चुकाया जाता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 18

जो कुछ तुम पृथ्वी पर बाँधोगे, वह स्वर्ग में बँधेगा और जो कुछ तुम पृथ्वी पर खोलोगे, वह स्वर्ग में खुलेगा।" यह बात यीशु ने भटके हुए भाई को खोजने की बात के बीच कही। यह अधिकार निन्दा करने के लिए नहीं, किसी को वापस लाने के लिए मिला है। सोच, जो दरवाज़ा तू आज किसी के लिए खोलता है, स्वर्ग उसे बन्द नहीं करता। और जो तू बन्द रखता है?

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