मत्ती 28:9
पाठ
कब्र से लौटती हुई दो स्त्रियाँ, डर और आनन्द दोनों से काँपती हुईं, दौड़ रही हैं। रास्ते में, बिना किसी भूमिका के, यीशु स्वयं उन्हें मिलते हैं और एक बिलकुल साधारण अभिवादन करते हैं: "सुखी रहो।" कोई गर्जना नहीं, कोई तेजस्वी घोषणा नहीं, वही शब्द जो उस समय बाज़ार में एक-दूसरे से कहा जाता था। और उन स्त्रियों की प्रतिक्रिया इसके ठीक उलट है: वे पास आती हैं, उनके पाँव पकड़ लेती हैं, और दण्डवत् करती हैं। एक ओर रोज़मर्रा का "नमस्कार", दूसरी ओर ज़मीन पर गिरकर आराधना। यह छोटा-सा पद इन्हीं दो गतियों के बीच खड़ा है, और इसी तनाव में इसका पूरा भार छिपा हुआ है।
मर्म
जिस यूनानी शब्द का अनुवाद "सुखी रहो" हुआ है, वह खाइरेते है, एक आम अभिवादन, लगभग "सलाम" जैसा। जी उठे हुए प्रभु का पहला वाक्य कोई धर्मसिद्धांत नहीं, बल्कि एक मित्र का हालचाल है। यहाँ परमेश्वर के बारे में कुछ बहुत गहरा खुलता है: पुनरुत्थान ने यीशु को दूर नहीं किया, पास कर दिया। जो मृत्यु को पार कर आए हैं, वे रास्ते में मिलते हैं, कब्र में नहीं, मंदिर में नहीं, दौड़ती हुई दो औरतों के साधारण रास्ते पर। और फिर भी वे पाँव छूने देते हैं और आराधना स्वीकार करते हैं, जो किसी भी यहूदी के लिए केवल परमेश्वर का अधिकार था। मसीह का राज्य ऐसे ही आता है: इतना निकट कि छुआ जा सके, और इतना ऊँचा कि घुटने टेकने के सिवा कोई रास्ता न बचे।
सूत्र
इस दृश्य में बाइबल की एक लम्बी रेखा अपने सिरे पर पहुँचती है। पुराने नियम में जब भी कोई मनुष्य परमेश्वर के पास आता है, दूरी बनाए रखनी पड़ती है: मूसा को जूते उतारने पड़ते हैं, पहाड़ के चारों ओर घेरा खींचा जाता है, मंदिर में पर्दा लटका रहता है। छूना मना था, क्योंकि छूना मृत्यु थी। और यहाँ दो स्त्रियाँ, जो अभी-अभी कब्र से लौटी हैं, यानी अशुद्धता के सबसे निकट से, जी उठे हुए प्रभु के पाँव पकड़ लेती हैं और जीवित रहती हैं। क्रूस पर जो पर्दा फटा, उसका परिणाम इस मिट्टी के रास्ते पर दिखता है। पवित्रता अब छूने वाले को नष्ट नहीं करती, बल्कि छूने वाले को शुद्ध करती है। यही वह सुसमाचार है जो आगे चलकर सब जातियों तक जाएगा।
दर्पण
यह पद आपसे एक अजीब बात माँगता है: एक ही समय में झुकना और चलते रहना। स्त्रियाँ आराधना करती हैं, पर यीशु उन्हें वहीं टिकने नहीं देते; अगला ही वाक्य है, "जाकर कहो।" आराधना यहाँ विश्राम का कमरा नहीं, दिशा बदलने की जगह है। और ध्यान दीजिए कि प्रभु का पहला शब्द कितना मामूली है। हम आत्मिकता को बड़े क्षणों में खोजते हैं, जबकि जी उठे मसीह रास्ते में, काम पर जाते हुए, रसोई में, व्हाट्सएप के संदेश में मिलते हैं। जिस कर्मचारी को आप रोज़ बिना देखे पार कर जाते हैं, जिस बच्चे की बात आप आधे मन से सुनते हैं, जिस पड़ोसी का नाम आप दस साल बाद भी नहीं जानते, वहीं वह साधारण "सुखी रहो" चुकता करना है जो आपको मुफ़्त मिला है। और पाँव पकड़ना यह भी कहता है कि आपके पैसे, आपका समय और आपका शरीर अब किसी और के अधिकार में हैं।
आज घर से निकलने से पहले एक ऐसे व्यक्ति का नाम सोचिए जिसे आप रोज़ देखते हैं पर कभी अभिवादन नहीं करते। आज उसके पास जाकर रुकिए, आँख मिलाइए, नाम लेकर नमस्कार कीजिए और पूछिए कि वह कैसा है। पाँच मिनट दीजिए, जल्दी मत कीजिए।
श्रोता
मत्ती का सुसमाचार उन यहूदी विश्वासियों के लिए लिखा गया जिनके ऊपर यह आरोप लटका था कि उनका पूरा विश्वास एक चोरी हुई लाश पर टिका है, ठीक वैसा ही जैसा अगले पदों में याजक गढ़ते हैं। उनके लिए यह पद एक अदालती सबूत जैसा था: मरियम मगदलीनी और दूसरी मरियम ने उसे छुआ, और उस संस्कृति में स्त्रियों की गवाही कचहरी में भरोसे लायक नहीं मानी जाती थी। कोई गढ़ी हुई कहानी अपने सबसे अहम गवाह स्त्रियाँ नहीं चुनती। साथ ही यह उनके लिए गहरा सान्त्वना था: जिस समाज ने उन्हें आराधनालय से निकाल दिया था, उसी प्रभु ने सबसे पहले हाशिये पर खड़े लोगों को रास्ते में रोककर "सुखी रहो" कहा था।
प्रश्न
फिर यूहन्ना में यीशु मरियम से क्यों कहते हैं कि मुझे मत छू, जबकि यहाँ वे पाँव पकड़ने देते हैं? यह विरोधाभास असहज है और इसे चिकना कर देना बेईमानी होगी। शायद अंतर पकड़ने में नहीं, पकड़े रहने में है: एक स्त्री उसे वापस पुराने रिश्ते में बाँधना चाहती है, ये दो उसके सामने गिरकर आराधना करती हैं और फिर दौड़ पड़ती हैं। पर सच यह भी है कि हमें पूरा उत्तर नहीं मिलता। जी उठे हुए शरीर की प्रकृति हमारी श्रेणियों में नहीं समाती: उसे छुआ जा सकता है, वह खाता है, और वह बन्द दरवाज़ों से आता है। यहाँ बहुत समझाने से बेहतर है स्वीकार करना कि पुनरुत्थान हमारे नापने के औज़ारों से बड़ा है।
मुख्य पात्र
इस पद का केंद्र वह व्यक्ति है जो अभी-अभी मृत्यु से लौटा है और जिसके पास शिकायत करने का पूरा अधिकार था। जिन्होंने उसे छोड़ा, नकारा, सोते हुए छोड़ दिया, उनके लिए उसका पहला शब्द उलाहना नहीं, कुशलक्षेम है। और उसकी पहली चिंता अपनी महिमा नहीं, बल्कि यह कि डरे हुए शिष्यों तक खबर पहुँचे, जिन्हें वह अगले ही पद में "मेरे भाइयों" कहता है। यही उसका आत्मिक स्वभाव है: सारा अधिकार हाथ में, और फिर भी सबसे पहले कोमलता। जो परमेश्वर इस तरह लौटता है, उससे डरने की ज़रूरत नहीं रही; पर जो इस तरह झुककर मिलता है, उसके सामने खड़े रहना और भी कठिन हो जाता है।
चिंतन
आपके रोज़ के रास्ते पर वह कौन-सा चेहरा है जिसे आप देखते तो हैं, पर अभिवादन कभी नहीं करते?
आपकी आराधना आपको कहाँ भेजती है, या वह आपको वहीं बिठाए रखती है जहाँ आप सुरक्षित महसूस करते हैं?
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Matthew 28:9 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मत्ती 28:9 का क्या अर्थ है?
मत्ती 28:9 किस विषय में है?
मत्ती 28:9 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मत्ती 28:9 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मत्ती 28:9 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Matthew 28 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
तब उन्होंने पुरनियों के साथ इकट्ठे होकर सम्मति की, और सिपाहियों को बहुत रुपये देकर कहा।" सोचिए, पुनरुत्थान की पहली खबर जिन्हें मिली, उन्होंने उसे दबाने के लिए पैसा गिना। सच्चाई उनके सामने खड़ी थी, पर उन्हें अपनी इज़्ज़त ज़्यादा प्यारी लगी। आज भी सच कभी-कभी महँगा पड़ता है। आप क्या चुनते हैं, जब सच आपकी सुविधा तोड़ देता है?
पद 17 कहता है, "उन्होंने उसे देखकर दण्डवत् किया, पर कुछ ने सन्देह किया।" और उन्हीं सन्देह करने वालों से यीशु कहता है, "इसलिए तुम जाओ, सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ।" वह पहले तुम्हारा विश्वास पक्का होने का इन्तज़ार नहीं करता। अधूरे मन वाले हाथों में ही उसने अपना सबसे बड़ा काम सौंप दिया। तुम्हारे डगमगाते कदम भी उसकी सेवा में चल सकते हैं।
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