बाइबल व्याख्या

मत्ती 28:17

बाइबल
यह वचन BETHLEHEM PRAYER CENTER MINISTRIES द्वारा समर्पित है

पाठ

ग्यारह चेले गलील के उस पहाड़ पर पहुँचते हैं, जहाँ जाने की आज्ञा उन्हें स्वयं यीशु ने दी थी। वहाँ वे जी उठे प्रभु को देखते हैं और घुटने टेककर प्रणाम करते हैं। पर मत्ती एक ऐसा वाक्य जोड़ देता है जिसे कोई प्रचारक शायद हटा देता: "पर किसी किसी को सन्देह हुआ।" आराधना और सन्देह एक ही पहाड़ पर, एक ही समूह में, शायद एक ही हृदय में। मत्ती इस दरार को ढकता नहीं, न समझाता है, न उसका समाधान देता है। वह बस इतना लिखता है और आगे बढ़ जाता है, क्योंकि अगले ही क्षण यीशु इसी मिले-जुले समूह के पास आते हैं और उन्हें सारी जातियों के पास भेज देते हैं।

मूल बात

यहाँ सबसे चौंकाने वाली बात यह नहीं कि चेलों को सन्देह हुआ, बल्कि यह कि सन्देह के बावजूद उन्हें भेजा गया। यीशु ने यह नहीं कहा कि पहले अपना मन साफ करो, फिर काम सौंपा जाएगा। वे संदेह करने वालों के पास स्वयं "पास आकर" खड़े होते हैं और अधिकार की घोषणा करते हैं। इसका अर्थ है कि मिशन की नींव हमारी निश्चितता नहीं, मसीह का अधिकार है। यह अनुग्रह का बहुत ठोस रूप है: परमेश्वर काम के लिए आदर्श लोग नहीं चुनते, वे उपलब्ध लोगों को चुनते हैं। और यह नैतिक रूप से धारदार भी है, क्योंकि अब "मुझे अभी पूरा यकीन नहीं" आज्ञा न मानने का बहाना नहीं रह जाता। आराधना करो, सन्देह साथ लेकर चलो, और फिर भी जाओ।

मुख्य सूत्र

मत्ती की पूरी पुस्तक इसी तनाव पर चलती है: परमेश्वर अपने लोगों के बीच आते हैं, और उनके लोग आधे मन से उत्तर देते हैं। इम्मानुएल, "परमेश्वर हमारे साथ", पहले अध्याय में एक ऐसे परिवार में आते हैं जहाँ यूसुफ को पहले सब कुछ समझ नहीं आया था। इस्राएल का पूरा इतिहास यही है: समुद्र पार करने के बाद सोने का बछड़ा, प्रतिज्ञा के देश की सीमा पर घबराहट। परमेश्वर कभी किसी निर्दोष, पूरी तरह आश्वस्त जाति के साथ वाचा नहीं बाँधते; वे डगमगाते लोगों के साथ बाँधते हैं और अपनी विश्वासयोग्यता से उसे थामे रखते हैं। इसलिए पहाड़ पर यह दृश्य कोई असफलता नहीं, बल्कि वही पुरानी कहानी है जो अब मसीह के अधिकार में अपने चरम पर पहुँच रही है: डगमगाते हाथों में सारी जातियों की जिम्मेदारी।

दर्पण

आप जानते हैं यह कैसा लगता है। रविवार को आप गाते हैं, और सोमवार को माँ की रिपोर्ट आती है और भीतर कुछ टूट जाता है। आप युवाओं को पढ़ाते हैं, और घर लौटकर सोचते हैं कि जो मैं कह रहा था, क्या मैं सचमुच उस पर टिका हूँ। यह पद उस दोहरेपन को झूठ नहीं कहता, पर उसे छुट्टी का बहाना भी नहीं बनने देता। हम अक्सर आज्ञाकारिता को भावना के अधीन कर देते हैं: जब तक पूरा यकीन न हो, तब तक न देना, न बोलना, न क्षमा करना, न बुलाना। पहाड़ पर वे ग्यारह सिखाते हैं कि प्रणाम और सन्देह एक साथ रह सकते हैं, और भेजा जाना फिर भी होता है। विश्वास का प्रमाण निश्चितता नहीं, चलना है।

आज ही उस एक व्यक्ति को संदेश भेजिए जिससे आप अपने विश्वास के बारे में कुछ कहना टालते रहे हैं, और उसमें ईमानदारी से लिखिए: "मुझे हर बात का उत्तर नहीं मालूम, फिर भी यीशु मेरे लिए सच हैं, और मैं चाहता हूँ कि तुम भी उन्हें जानो।" दस मिनट, एक संदेश, आज।

प्रसंग

यह घटना यरूशलेम से लगभग सौ किलोमीटर उत्तर, गलील में घटती है, वहीं जहाँ से सब शुरू हुआ था। यह संयोग नहीं। गलील धार्मिक केन्द्र नहीं था, बल्कि मिली-जुली आबादी वाला सीमावर्ती इलाका, जिसे यरूशलेम के लोग थोड़ा नीची नज़र से देखते थे। चेले वहाँ लौटे हैं हारे हुए लोगों की तरह: उनका गुरु रोमी तरीके से मारा गया, उनमें से एक ने विश्वासघात किया, एक ने इनकार किया, बाकी भाग गए। नगर में उसी समय प्रधान याजक सिपाहियों को चाँदी देकर झूठी कहानी गढ़ रहे हैं। यानी एक ओर संगठित शक्ति और पैसा, दूसरी ओर एक पहाड़ पर खड़े ग्यारह आदमी, जिनमें से कुछ को अभी भी सन्देह है। अधिकार की घोषणा इसी असंतुलन के बीच होती है।

पहले सुननेवाले

मत्ती जिनके लिए लिख रहा था, वे मुख्यतः यहूदी पृष्ठभूमि के मसीही थे, जो आराधनालय से कट रहे थे, परिवारों में ताने सुन रहे थे, और बाहर वह कहानी सुन रहे थे जो पद पन्द्रह में दर्ज है: "उसके चेले आकर उसे चुरा ले गए।" उनके मन में भी सवाल उठते होंगे: क्या हमने सब कुछ दाँव पर लगाकर गलत चुना? उनके लिए यह आधा वाक्य, "पर किसी किसी को सन्देह हुआ", राहत की साँस रहा होगा। जिन्होंने जी उठे प्रभु को अपनी आँखों से देखा, वे भी डगमगाए, और फिर भी भेजे गए। इसका मतलब था कि उनका अपना डगमगाना उन्हें मण्डली से बाहर नहीं करता, और उनकी गवाही बेकार नहीं होती।

कठिन प्रश्न

अगर जी उठे मसीह सामने खड़े हों, तो सन्देह कैसे बचा रह सकता है? यूनानी शब्द यहाँ दिस्तात्सो है, जिसका अर्थ "अविश्वास" नहीं बल्कि "दो दिशाओं में खिंचना, ठिठकना" है। मत्ती इसी शब्द का प्रयोग पानी पर चलते पतरस के लिए करता है, जो यीशु को देखते हुए ही डूबने लगता है। यानी यह सन्देह प्रमाणों की कमी से नहीं आता; यह उस धक्के से आता है जब सच्चाई हमारे सँभालने की क्षमता से बड़ी हो जाती है। मत्ती यह नहीं बताता कि वह सन्देह कब मिटा, या मिटा भी या नहीं। वह इसे खुला छोड़ देता है। शायद इसलिए कि आश्वासन अंत में उस वाक्य से आता है जो यीशु कहते हैं, न कि उस भावना से जो हम महसूस करते हैं: "मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूँ।"

चिंतन के प्रश्न

कौन सा एक काम आप इसलिए टाल रहे हैं क्योंकि आप भीतर से "पूरी तरह आश्वस्त" महसूस नहीं करते, और अगर निश्चितता शर्त नहीं है तो वह काम आज कैसा दिखेगा?

आपकी मण्डली या समूह में जो लोग खुलकर अपने सन्देह बताते हैं, उन्हें आप आराधना करने वालों में गिनते हैं या बाहर खड़े लोगों में?

Matthew में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Matthew For Everyone, Part 1

N.T. Wright

Short, fresh readings that make Matthew feel newly written.

The Message of Matthew

Michael Green

The King and his kingdom, traced through the whole Gospel.

Matthew: An Introduction and Commentary

R.T. France

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Matthew

Michael Wilkins

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

The Message of the Sermon on the Mount

John Stott

Stott's classic on Matthew 5-7, the charter of the kingdom.

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Matthew 28:17 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 28:17 का क्या अर्थ है?
ग्यारह चेले गलील के उस पहाड़ पर पहुँचते हैं, जहाँ जाने की आज्ञा उन्हें स्वयं यीशु ने दी थी। वहाँ वे जी उठे प्रभु को देखते हैं और घुटने टेककर प्रणाम करते हैं। पर मत्ती एक ऐसा वाक्य जोड़ देता है जिसे कोई प्रचारक शायद हटा देता: "पर किसी किसी को सन्देह हुआ।" आराधना और सन्देह एक ही पहाड़ पर, एक ही समूह में, शायद एक ही हृदय में। मत्ती इस दरार को ढकता नहीं, न समझाता है, न उसका समाधान देता है। वह बस इतना लिखता है और आगे बढ़ जाता है, क्योंकि अगले ही क्षण यीशु इसी मिले-जुले समूह के पास आते हैं और उन्हें सारी जातियों के पास भेज देते हैं।
मत्ती 28:17 किस विषय में है?
मत्ती की पूरी पुस्तक इसी तनाव पर चलती है: परमेश्वर अपने लोगों के बीच आते हैं, और उनके लोग आधे मन से उत्तर देते हैं। इम्मानुएल, "परमेश्वर हमारे साथ", पहले अध्याय में एक ऐसे परिवार में आते हैं जहाँ यूसुफ को पहले सब कुछ समझ नहीं आया था। इस्राएल का पूरा इतिहास यही है: समुद्र पार करने के बाद सोने का बछड़ा, प्रतिज्ञा के देश की सीमा पर घबराहट। परमेश्वर कभी किसी निर्दोष, पूरी तरह आश्वस्त जाति के साथ वाचा नहीं बाँधते; वे डगमगाते लोगों के साथ बाँधते हैं और अपनी विश्वासयोग्यता से उसे थामे रखते हैं। इसलिए पहाड़ पर यह दृश्य कोई असफलता नहीं, बल्कि वही पुरानी कहानी है जो अब मसीह के अधिकार में अपने चरम पर पहुँच रही है: डगमगाते हाथों में सारी जातियों की जिम्मेदारी।
मत्ती 28:17 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज ही उस एक व्यक्ति को संदेश भेजिए जिससे आप अपने विश्वास के बारे में कुछ कहना टालते रहे हैं, और उसमें ईमानदारी से लिखिए: "मुझे हर बात का उत्तर नहीं मालूम, फिर भी यीशु मेरे लिए सच हैं, और मैं चाहता हूँ कि तुम भी उन्हें जानो।" दस मिनट, एक संदेश, आज।
मत्ती 28:17 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मत्ती जिनके लिए लिख रहा था, वे मुख्यतः यहूदी पृष्ठभूमि के मसीही थे, जो आराधनालय से कट रहे थे, परिवारों में ताने सुन रहे थे, और बाहर वह कहानी सुन रहे थे जो पद पन्द्रह में दर्ज है: "उसके चेले आकर उसे चुरा ले गए।" उनके मन में भी सवाल उठते होंगे: क्या हमने सब कुछ दाँव पर लगाकर गलत चुना?
मत्ती 28:17 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
कौन सा एक काम आप इसलिए टाल रहे हैं क्योंकि आप भीतर से "पूरी तरह आश्वस्त" महसूस नहीं करते, और अगर निश्चितता शर्त नहीं है तो वह काम आज कैसा दिखेगा?
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Matthew 28 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 12

तब उन्होंने पुरनियों के साथ इकट्ठे होकर सम्मति की, और सिपाहियों को बहुत रुपये देकर कहा।" सोचिए, पुनरुत्थान की पहली खबर जिन्हें मिली, उन्होंने उसे दबाने के लिए पैसा गिना। सच्चाई उनके सामने खड़ी थी, पर उन्हें अपनी इज़्ज़त ज़्यादा प्यारी लगी। आज भी सच कभी-कभी महँगा पड़ता है। आप क्या चुनते हैं, जब सच आपकी सुविधा तोड़ देता है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 19

पद 17 कहता है, "उन्होंने उसे देखकर दण्डवत् किया, पर कुछ ने सन्देह किया।" और उन्हीं सन्देह करने वालों से यीशु कहता है, "इसलिए तुम जाओ, सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ।" वह पहले तुम्हारा विश्वास पक्का होने का इन्तज़ार नहीं करता। अधूरे मन वाले हाथों में ही उसने अपना सबसे बड़ा काम सौंप दिया। तुम्हारे डगमगाते कदम भी उसकी सेवा में चल सकते हैं।

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