गिनती 24
पाठ
चौथी बार बिलाम पहाड़ पर खड़ा है, पर इस बार वह शकुन देखने नहीं जाता; वह बस अपना मुँह जंगल की ओर कर लेता है और नीचे फैले हुए इस्राएल के डेरों को देखता है। परमेश्वर का आत्मा उस पर उतरता है और उसके मुँह से श्राप के बदले सबसे सुंदर आशीष निकलती है: तेरे डेरे कितने मनभावने हैं, तू सिंह के समान लेटा है, तुझे कौन छेड़े। बालाक गुस्से में हाथ पर हाथ पटककर उसे भगा देता है, और बिलाम जाते-जाते आखिरी बात कहता है, याकूब में से एक तारा उदय होगा। फिर वह चुपचाप अपने घर लौट जाता है।
मर्म
यह अध्याय एक बात को निर्ममता से साफ करता है: परमेश्वर की आशीष को कोई सौदा, कोई जादू, कोई राजनीतिक दबाव पलट नहीं सकता। बालाक के पास सोना है, वेदियाँ हैं, बैल और मेढ़े हैं, और एक भाड़े का भविष्यवक्ता है। इन सबका कुल परिणाम यह होता है कि इस्राएल तीन बार और आशीष पाता है। ध्यान दीजिए, इस्राएल को इस पूरे नाटक की खबर तक नहीं; वे नीचे अपने गोत्र-गोत्र के अनुसार चुपचाप बसे हुए हैं, बच्चे खेल रहे हैं, आग जल रही है। परमेश्वर की रक्षा उनके जागरूक होने पर नहीं, उनके वचन पर टिकी है। अनुग्रह का यही स्वभाव है: वह हमारी सतर्कता से नहीं, परमेश्वर की निष्ठा से चलता है।
सूत्र
पद 17 में बिलाम का स्वर बदल जाता है, और वह दूर तक देखता है: "मैं उसको देखूँगा तो सही, परन्तु अभी नहीं; मैं उसको निहारूँगा तो सही, परन्तु समीप होकर नहीं याकूब में से एक तारा उदय होगा, और इस्राएल में से एक राजदण्ड उठेगा।" एक अन्यजाति भविष्यवक्ता, जिसे पैसे के लिए बुलाया गया था, राजा के आने की घोषणा कर बैठता है। दाऊद में इसकी पहली झलक दिखती है, पर "अभी नहीं" शब्द बताते हैं कि निशाना और दूर है। मत्ती के सुसमाचार में पूर्व से आए ज्योतिषी एक तारे के पीछे चलकर यरूशलेम पहुँचते हैं; अन्यजातियों की यह यात्रा बिलाम की इसी वाणी की गूँज है। परमेश्वर अपने मसीह की गवाही उन मुँहों से भी निकलवा लेते हैं जो उसके अपने नहीं।
दर्पण
बालाक का वह क्षण पहचानने लायक है: हाथ पर हाथ पटककर चिल्लाना, "मैंने तुझे अपने शत्रुओं को श्राप देने के लिये बुलवाया, परन्तु तूने तीन बार उन्हें आशीर्वाद ही आशीर्वाद दिया है।" यह उस आदमी का गुस्सा है जिसने परिणाम खरीदने की कोशिश की और असफल रहा। हम भी यह करते हैं, भले ही सभ्य तरीके से: उस सहकर्मी के बारे में जहर भरी बात फैलाना जिससे हमें खतरा लगता है, उस रिश्तेदार की नाकामी की गुप्त आशा रखना, प्रार्थना में भी किसी के "सबक सीखने" की माँग करना। बिलाम की जबान श्राप देने से बँधी थी; हमारी नहीं है, और यही हमारी परीक्षा है। आज एक काम कीजिए: जिस व्यक्ति के बारे में आपके मन में सबसे कड़वी बात बैठी है, उसका नाम कागज पर लिखिए और ऊँची आवाज़ में कहिए, "परमेश्वर, इन्हें आशीष दीजिए।"
श्रोता
जिन्होंने यह पहली बार सुना, वे मोआब के मैदानों में डेरा डाले हुए इस्राएली थे, या उनकी वह पीढ़ी जो अब यरदन पार करने वाली थी। चालीस साल रेगिस्तान में बिताने के बाद उन्हें यह बताया जा रहा था कि जब वे बेखबर अपने तंबुओं में थे, तब पहाड़ी पर उनके खिलाफ एक पूरा षड्यंत्र चल रहा था, और वह हर बार आशीष में बदल गया। उनके लिए "वे तो घाटियों के समान, और नदी के तट की वाटिकाओं के समान" सुनना करेजे को छूने वाला था, क्योंकि उन्होंने घाटियाँ नहीं, सिर्फ रेत देखी थी। यह वर्णन उनकी वर्तमान हालत का नहीं, उनके भविष्य का था, और वह भविष्य एक शत्रु के मुँह से निकला था। गवाही जितनी अनपेक्षित जगह से आए, उतनी ही भरोसेमंद लगती है।
अन्य सन्दर्भ
उत्पत्ति 49 में मरता हुआ याकूब यहूदा के बारे में कहता है कि उससे राजदण्ड न छूटेगा, और उसे सिंह के बच्चे जैसा बताता है। बिलाम वही दो चित्र दोहराता है, सिंह और राजदण्ड, बिना यह जाने कि वह एक पुरानी प्रतिज्ञा की लकीर पर चल रहा है। दूसरी ओर, नया नियम बिलाम को नायक नहीं मानता; प्रकाशितवाक्य में पिरगमुन की कलीसिया पर दोष लगता है कि उसने "बिलाम की शिक्षा" को थामे रखा, क्योंकि आगे चलकर वही आदमी इस्राएल को पाप में फँसाने की सलाह देता है। सही शब्द बोलना और सही आदमी होना दो अलग बातें हैं, और बिलाम इस दूरी का सबसे डरावना उदाहरण है।
मुख्य पात्र
बिलाम एक अजीब आकृति है: खुली आँखों वाला आदमी जो अंधा रह जाता है। वह खुद को "परमेश्वर के वचनों का सुननेवाला" कहता है, और यह झूठ नहीं है; परमेश्वर का आत्मा सचमुच उस पर उतरता है। वह बालाक से ईमानदारी से कहता है कि सोने चाँदी से भरा घर भी उसे यहोवा की आज्ञा तोड़ने को राज़ी नहीं कर सकता। फिर भी वह आखिर तक उस आशीष में शामिल नहीं होता जिसे वह बोलता है। वह बोलता है, और "अपने स्थान पर लौट गया।" यही इस अध्याय का सबसे ठंडा वाक्य है। सत्य उसके मुँह से होकर गुजरा, पर उसके दिल में रुका नहीं। परमेश्वर ने उसका इस्तेमाल किया; उसे बचाया नहीं, क्योंकि वह बचना नहीं चाहता था।
चिंतन
जब मेरे विरुद्ध कोई षड्यंत्र चल रहा होता है और मुझे उसकी खबर तक नहीं, तो क्या मेरा भरोसा अपनी सतर्कता पर है या परमेश्वर के वचन पर?
क्या मेरे जीवन में भी कोई ऐसा सच है जो मेरे मुँह से तो निकलता है पर मेरे दिल में ठहरा नहीं, और मैं उसे बोलकर "अपने स्थान" लौट जाता हूँ?
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Numbers 24 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
बिलाम ऊपर पहाड़ से देख रहा था, और नीचे रेगिस्तान में धूल भरे तंबू थे। फिर भी उसके मुँह से निकला, "वे यहोवा के लगाए हुए अगर के वृक्षों, और जल के किनारे के देवदारों के समान हैं।" जहाँ नदी थी ही नहीं, वहाँ परमेश्वर ने अपने लोगों को हरा-भरा देखा। तेरी सूखी जगह में भी उसकी नज़र वही है। तू खुद को धूल समझता है, वह तुझे अपना लगाया हुआ पौधा कहता है।
हे प्रभु, मेरी आँखें खोल दे कि मैं तुझे देख सकूँ। कई बार मैं अपने ही विचारों में उलझा रहता हूँ और तेरी आवाज़ अनसुनी कर देता हूँ। मुझे ऐसा दिल दे जो तेरे सामने झुक जाए, और ऐसी नज़र दे जो तेरी सच्चाई पहचान सके।
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