फिलिप्पियों 2:7
पाठ
पौलुस एक ही साँस में वह कहता है जो सबसे ऊँचा है और वह भी जो सबसे नीचा है: जो परमेश्वर के स्वरूप में था, उसने "अपने आपको ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया।" यहाँ कोई छीना-झपटी नहीं, कोई पद की रक्षा नहीं। मसीह ने अपने अधिकार को मुट्ठी में भींचकर नहीं रखा, बल्कि उसे खोल दिया और खाली कर दिया। और ध्यान दीजिए कि यह वाक्य किस बात के बीच में रखा गया है: पाँचवें पद में आदेश है कि तुम्हारा स्वभाव भी वैसा ही हो। यानी यह पद केवल मसीह के विषय में जानकारी नहीं, यह हमारे व्यवहार का नक्शा है।
मर्म
"शून्य कर दिया" का अर्थ यह नहीं कि मसीह ने परमेश्वर होना छोड़ दिया; यूनानी शब्द केनोओ का अर्थ है उँडेल देना, खाली कर देना, जैसे कोई घड़ा झुकाकर पूरा पानी बहा दे। उन्होंने जो छोड़ा वह अपने अधिकार का अपने लिए उपयोग करने का हक था। परमेश्वर ने दास का रूप धारण करके यह दिखाया कि दासत्व उनकी महिमा के विपरीत नहीं, बल्कि उसकी सबसे सच्ची अभिव्यक्ति है। यही इस पद की धार है: हम सोचते हैं कि ऊँचाई पकड़कर रखने की चीज़ है, और परमेश्वर दिखाते हैं कि वह खर्च करने की चीज़ है। जहाँ आप अपने पद, अनुभव, योग्यता या सही होने के हक को सुरक्षित रखते हैं, वहीं यह पद आपसे सबसे अधिक टकराता है।
सूत्र
दास का रूप अचानक नहीं आता; परमेश्वर की कहानी में वह बहुत पहले से बुना हुआ है। यशायाह की उन पुकारों में जहाँ प्रभु का सेवक चुपचाप पीठ देता है और कटने के लिए ले जाए जाने वाले मेम्ने की तरह मुँह नहीं खोलता, वहाँ यह आकृति पहले से खड़ी है: ऐसा उद्धारकर्ता जो ताकत से नहीं, आत्मदान से जीतता है। पौलुस उसी धागे को पकड़ता है और यीशु तक खींच लाता है। और वह उसे अधूरा नहीं छोड़ता: पद आठ में आज्ञाकारिता क्रूस तक जाती है, पद नौ में परमेश्वर उसे "अति महान" करते हैं। यानी उँडेलना कोई हार नहीं थी, वह उद्धार का तरीका था। परमेश्वर संसार को ऊपर से नहीं, नीचे से बचाते हैं, और यही वह रास्ता है जिस पर वे अपने लोगों को भी चलने के लिए बुलाते हैं।
दर्पण
इस पद को गंभीरता से लेने का मतलब है कि कुछ चीज़ें आपके हाथ से छूटेंगी। दफ़्तर में वह विचार जो वाकई आपका था, पर जिसका श्रेय किसी और को मिल गया, और आप तीन दिन से सही मौके की ताक में हैं कि सबके सामने स्पष्ट कर दें। घर में वह बहस जिसमें आप तथ्यों के साथ जीत सकते हैं, और इसीलिए हार नहीं मानते। पैसे के मामले में वह हिसाब जो आपके पक्ष में है। मसीह के पास भी तर्क था, उनका दावा हर दावे से ऊँचा था, और उन्होंने उसे मुट्ठी में नहीं भींचा। यह पद आपसे यह नहीं कहता कि आप अपने को तुच्छ समझें; यह कहता है कि जो आपके पास सचमुच है, उसे आप दूसरों पर खर्च करें। आज एक काम कीजिए: जिस व्यक्ति के सामने आप पिछले दिनों अपनी बात सही साबित करने की कोशिश कर रहे थे, उसे अभी एक छोटा संदेश भेजिए और बिना "लेकिन" जोड़े उस बिंदु को छोड़ दीजिए।
मुख्य पात्र
इस पद का केंद्र मसीह हैं, और जो चीज़ सबसे अधिक चौंकाती है वह उनकी स्वतंत्रता है। कोई उनसे कुछ छीन नहीं रहा; वे स्वयं उँडेल रहे हैं। "धारण किया" क्रिया सक्रिय है, पीड़ित की नहीं, चुनने वाले की। यहाँ कोई मजबूर संत नहीं, बल्कि वह है जो इतना सुरक्षित है कि उसे अपनी पहचान की रक्षा करने की ज़रूरत नहीं। हम अक्सर इसलिए नहीं झुक पाते क्योंकि हमें डर है कि झुकने पर हम मिट जाएँगे; मसीह झुकते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि वे कौन हैं। उनका भावनात्मक परिदृश्य असुरक्षा नहीं, भरोसा है, पिता पर इतना भरोसा कि वे अपनी प्रतिष्ठा पिता के हाथ में छोड़ सकते हैं। यही वह जड़ है जिससे दीनता उगती है, और इसके बिना दीनता केवल अभिनय रह जाती है।
श्रोता
फिलिप्पी एक रोमी उपनिवेश था, पूर्व सैनिकों का शहर, जहाँ नागरिकता, पद और सम्मान की सीढ़ी हर बातचीत में मौजूद थी। वहाँ "दास" कोई रूपक नहीं था; हर गली में असली दास थे, जिनके पास न नाम का अधिकार था, न शरीर का। और क्रूस उस शहर के लिए वह सज़ा थी जो रोमी नागरिक को कभी नहीं दी जाती थी, केवल दासों और विद्रोहियों को। जब फिलिप्पी की कलीसिया ने सुना कि उनका प्रभु स्वेच्छा से दास का स्वरूप लेकर नीचे उतरा, तो यह उनके पूरे सामाजिक ढाँचे पर सीधा प्रहार था। पौलुस यह मंडली के भीतर के झगड़ों के बीच लिख रहा है, जहाँ लोग एक-दूसरे से ऊपर रहना चाहते थे। उनके कानों में यह पद सांत्वना से पहले चुनौती था।
अंतर्पाठ
यूहन्ना के सुसमाचार में अंतिम भोज की रात यीशु कपड़े उतारकर अँगोछा बाँधते हैं और शिष्यों के पैर धोते हैं, ठीक वही काम जो उस समय घर के सबसे निचले दास का था। वह दृश्य इस पद का जीवंत चित्र है: परमेश्वर का पुत्र, जो जानता है कि पिता ने सब कुछ उसके हाथ में दे दिया है, और इसी जानकारी के कारण घुटनों पर बैठता है। दूसरी ओर उत्पत्ति तीन में इसका उलटा है: मनुष्य, जो मिट्टी से बना है, परमेश्वर के तुल्य होने को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाता है। आदम ने ऊपर चढ़ना चाहा और गिरा; मसीह नीचे उतरे और ऊँचे किए गए। इन्हीं दो रास्तों के बीच हर दिन हमारा चुनाव होता है।
चिंतन
आपके जीवन में इस समय कौन सा अधिकार, श्रेय या "सही होना" है जिसे आप मुट्ठी में भींचे हुए हैं, और उसे खोलने से आपको वास्तव में किस बात का डर है?
मसीह इसलिए झुक सके क्योंकि वे जानते थे कि उनकी पहचान सुरक्षित है। आपकी पहचान किस चीज़ पर टिकी है, और वह आपके झुकने को आसान बनाती है या कठिन?
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Philippians 2:7 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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फिलिप्पियों 2:7 का क्या अर्थ है?
फिलिप्पियों 2:7 किस विषय में है?
फिलिप्पियों 2:7 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
फिलिप्पियों 2:7 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
फिलिप्पियों 2:7 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Philippians 2 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, इपफ्रुदीतुस मरने पर था, पर आपने उस पर दया की और पौलुस को "शोक पर शोक" से बचा लिया। धन्यवाद कि आज भी आप बीमारों को उठाते हैं और हमारे अपनों को हमें लौटा देते हैं। हर स्वस्थ होती साँस आपकी करुणा का चिह्न है।
पौलुस जंजीरों में है, फिर भी उसकी चिंता अपनी नहीं: "मुझे प्रभु यीशु में आशा है कि मैं तीमुथियुस को तुम्हारे पास शीघ्र भेजूँगा, ताकि तुम्हारी दशा सुनकर मुझे शान्ति मिले।" कैदखाने में बैठा आदमी दूसरों का हाल जानकर शांत होता है। सोचो, तुम्हारे मन की शांति किस बात पर टिकी है? अपनी सुविधा पर, या इस पर कि तुम्हारे अपने मसीह में मजबूत खड़े हैं?
पिता, मेरी योजनाएँ मेरे हाथ में नहीं हैं, यह मैं जानता हूँ। फिर भी पौलुस की तरह मैं तुझ पर भरोसा रखना चाहता हूँ कि जो आगे है, वह तेरे हाथ में सुरक्षित है। जिनसे मिलने की आशा दिल में है, उन मुलाक़ातों को तू अपने समय पर पूरा कर। मुझे इंतज़ार में भी शांत रहना सिखा।
विरोध या झूठी बड़ाई के लिए कुछ न करो, पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो।" पौलुस यह जेल से लिख रहा है, और मसीह के झुकने की बात कहने से पहले कह रहा है। ध्यान दे, वह कहता है "समझो", यानी यह मन की बात है, दिखावे की नहीं। आज जिस व्यक्ति से तुलना करके तुम जलते हो, उसी को मन ही मन अपने से अच्छा समझकर देखो। क्या तुम्हारा दिल इसके लिए तैयार है?
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