फिलिप्पियों 3
पाठ
पौलुस "लाभ" और "हानि" का बहीखाता खोलकर सामने रखता है। पहले वह उन लोगों से चौकस रहने को कहता है जो शरीर पर, यानी वंश और रीति पर भरोसा रखते हैं, फिर अपना ही प्रभावशाली धार्मिक बायोडाटा गिनाता है: आठवें दिन खतना, बिन्यामीन का गोत्र, फरीसी, व्यवस्था की धार्मिकता में निर्दोष। और यह सब कुछ वह मसीह के कारण घाटा, बल्कि "कूड़ा" कह देता है। शेष अध्याय एक दौड़ है: अभी पकड़ा नहीं, अभी सिद्ध नहीं, पर निशाने की ओर दौड़ता चला जाता हूँ, क्योंकि हमारा स्वदेश स्वर्ग में है और वहाँ से उद्धारकर्ता आकर हमारी दीन-हीन देह को अपनी महिमा की देह के अनुकूल बना देगा।
मर्म
जो शब्द पौलुस पद 8 में इस्तेमाल करता है, वह यूनानी में स्कूबाला है: कचरा, गोबर, वह जो फेंक दिया जाता है। यह विनम्रता का दिखावा नहीं, यह मूल्य-व्यवस्था का पूरा उलट जाना है। पौलुस यह नहीं कहता कि उसकी विरासत बुरी थी; वह कहता है कि उसे लाभ के खाते में लिखना मसीह के सामने दिवालियापन है। धार्मिकता यहाँ कोई अर्जित उपाधि नहीं, बल्कि "परमेश्वर की ओर से विश्वास करने पर" मिलने वाला दान है। और ध्यान दें, यह दान केवल कानूनी बरी होना नहीं है: उद्देश्य है "उसको और उसके पुनरुत्थान की सामर्थ्य को" जानना, दुःखों में सहभागी होना, उसकी मृत्यु की समानता पाना। अनुग्रह मसीह के साथ जुड़ जाना है, उससे कम कुछ नहीं।
मुख्य सूत्र
खतना अब्राहम को दिया गया वाचा का चिन्ह था, परमेश्वर की अपनी पहल की मुहर। परन्तु व्यवस्थाविवरण 30 में मूसा पहले से ही हृदय के खतने की बात करता है, क्योंकि चिन्ह कभी वस्तु का विकल्प नहीं था। इसलिए पौलुस का दावा उतना क्रांतिकारी नहीं जितना दिखता है: "यथार्थ खतनावाले तो हम ही हैं जो परमेश्वर के आत्मा की अगुआई से उपासना करते हैं।" वाचा टूटी नहीं, वह अपने लक्ष्य पर पहुँची है। और सूत्र आगे भी जाता है: कहानी का अंत आत्मा का देह से छूटना नहीं, बल्कि "हमारी दीन-हीन देह का रूप बदलकर" महिमा की देह बनाना है। सृष्टि को त्यागा नहीं जाता, उसे नया किया जाता है। पुनरुत्थित मसीह उस नई सृष्टि का पहला फल है।
दर्पण
पद 19 का वाक्य असहज करता है: "उनका ईश्वर पेट है।" यह केवल भोगियों पर तंज नहीं; पेट वह है जो हमें रोज़ चलाता है, हमारी भूख, हमारी सुरक्षा, हमारा आराम। जिस बैंक बैलेंस से आप रात को चैन पाते हैं, जिस पद से आपकी पहचान बनती है, वह आपका छोटा ईश्वर बन सकता है। और धार्मिक रूप भी वैसा ही चलता है: बीस साल की सेवा, बच्चों का अच्छा संस्कार, कभी न छूटी प्रार्थना सभा। पौलुस की सूची उससे लंबी थी, और उसने उसे कूड़े में डाल दिया। सवाल यह नहीं कि आपकी उपलब्धियाँ सच्ची हैं या नहीं; सवाल यह है कि आप उन्हें किस खाते में लिखते हैं। लाभ के खाते में लिखी हुई भलाई मसीह की जगह ले लेती है।
मुख्य पात्र
पौलुस यहाँ आत्मविश्वास से भरा प्रेरित नहीं, एक बूढ़ा कैदी है जो रोता है: "अब भी रो-रोकर कहता हूँ।" जो व्यक्ति पहले कलीसिया का सतानेवाला था, वह अब भटकते लोगों के लिए आँसू बहाता है; उत्साह वही है, दिशा बदल गई है। और वह अपने बारे में चौंकाने वाली ईमानदारी दिखाता है: "यह मतलब नहीं कि मैं पा चुका हूँ, या सिद्ध हो चुका हूँ।" जीवन के इस पड़ाव पर भी वह पहुँचा हुआ नहीं, दौड़ता हुआ है। पीछे की बातें भूलना उसकी स्मृति का मिट जाना नहीं, बल्कि उन पर टिकना छोड़ देना है। उसका भरोसा अपनी पकड़ पर नहीं: "जिसके लिये मसीह यीशु ने मुझे पकड़ा था।" पकड़ा जाना पहले है, दौड़ना उसके बाद।
श्रोताओं का परिचय
फिलिप्पी रोमी उपनिवेश था, सेवानिवृत्त सैनिकों का शहर, जहाँ रोमी नागरिकता गर्व की सबसे बड़ी वस्तु थी। "उद्धारकर्ता" और "प्रभु" वहाँ कैसर के लिए बोले जाने वाले शब्द थे। जब पौलुस लिखता है "हमारा स्वदेश स्वर्ग में है; और हम एक उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहाँ से आने की प्रतीक्षा करते हैं," तो यह कोई कोमल स्वर्ग-गीत नहीं, एक राजनैतिक वाक्य है। सम्राट अपने उपनिवेशों में आता था, जनता उसका स्वागत करने बाहर निकलती थी। वैसे ही एक और राजा आएगा। जो पाठक अपने पड़ोसियों के बीच दबाव में जी रहे थे, उन्हें यह सुनना कि उनकी असली नागरिकता कहीं और दर्ज है, दोनों बातें देता था: साहस और थोड़ी खतरनाक निष्ठा।
कठिन प्रश्न
पद 11 अटकाता है: "ताकि मैं किसी भी रीति से मरे हुओं में से जी उठने के पद तक पहुँचूँ।" क्या पौलुस अनिश्चित है? और पद 12 में वह सिद्ध नहीं, पर पद 15 में "हम में से जितने सिद्ध हैं" कहता है। इसे चिकना कर देना आसान होगा, पर पौलुस की भाषा जानबूझकर तनी हुई है। वह जानता है कि उसे मसीह ने पकड़ा है, और फिर भी दौड़ने का कोई विकल्प नहीं मानता। निश्चयता उसके लिए आराम की कुर्सी नहीं, दौड़ने का कारण है। शायद यहाँ हमें यह स्वीकार करना पड़ता है कि अनुग्रह और परिश्रम को गणित की तरह बाँटा नहीं जा सकता। जो हाथ हमें थामे हुए है, वही हमें आगे धकेलता भी है, और उस पकड़ के भीतर ही हमारी दौड़ अर्थ पाती है।
चिंतन
आपकी "लाभ" की सूची में आज क्या लिखा है, और उसमें से क्या मसीह के सामने खाते से हटाने की ज़रूरत है?
अगर आपकी असली नागरिकता स्वर्ग में दर्ज है, तो इस सप्ताह के किसी एक ठोस निर्णय में वह कैसे दिखाई देगा?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पौलुस यह नहीं कहता कि "मैं मसीह को पा लूँ," वह कहता है "मसीह में पाया जाऊँ।" फर्क बड़ा है। एक में मेहनत है, दूसरे में समर्पण।
सोच कि जिस दिन परमेश्वर तुझे देखेगा, तू कहाँ खड़ा मिलेगा? अपने अच्छे कामों की सूची पर, या मसीह में छिपा हुआ? पौलुस ने अपनी सारी धार्मिकता छोड़ दी, क्योंकि वह जानता था कि उसका ढेर बहुत छोटा है।
उत्साह के विषय में कलीसिया का सतानेवाला" पौलुस अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि गिनवा रहा है, और वही उसकी सबसे बड़ी भूल थी। उसका जोश सच्चा था, पर दिशा गलत। वह परमेश्वर के लिए लड़ते हुए परमेश्वर के लोगों को घायल कर रहा था। सोचिए, आपका जोश किसकी ओर बह रहा है? मसीह की ओर, या बस अपने सही होने को साबित करने की ओर?
कुत्तों से चौकस रहो, उन बुरे काम करनेवालों से चौकस रहो।" पौलुस तीन बार चेतावनी दोहराता है, क्योंकि जो लोग मसीह के साथ कुछ और जोड़ने आते हैं, वे कभी कठोर नहीं दिखते। उनकी बात मीठी और धार्मिक लगती है। आज भी कोई कहता है, यीशु काफ़ी हैं, पर इतना और कर लो तब पक्का होगा। तुम्हारे मन में वह कौन सी शर्त है जो चुपचाप अनुग्रह के ऊपर बैठ गई है?
हे भाइयो, तुम सब मिलकर मेरी सी चाल चलो" ऐसा कहने का साहस पौलुस को कहाँ से मिला? ठीक पिछली आयतों में उसने माना था कि वह अभी पहुँचा नहीं, बस दौड़ रहा है। यानी वह अपनी सिद्धता नहीं, अपनी दिशा दिखा रहा था। सोचो, क्या कोई तुम्हारे पीछे चलकर मसीह तक पहुँच सकता है? तुम्हारी चाल किसी की राह बन रही है, चाहे तुम जानो या न जानो।
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