भजन संहिता 18
पाठ
दाऊद का यह गीत एक ही वाक्य से शुरू होता है जो पूरे भजन का भार उठा लेता है: "हे यहोवा, हे मेरे बल, मैं तुझ से प्रेम करता हूँ।" इसके बाद नाम पर नाम गिनाए जाते हैं, चट्टान, गढ़, ढाल, उद्धार का सींग, ऊँचा गढ़, जैसे कोई डूबते-डूबते बचाया गया आदमी उस हाथ का वर्णन करना बंद ही न कर पाए जिसने उसे थामा। फिर संकट की तस्वीर आती है, "मृत्यु की रस्सियों से मैं चारों ओर से घिर गया हूँ," और उसके उत्तर में एक तूफान उतरता है: पृथ्वी हिलती है, पहाड़ काँपते हैं, परमेश्वर करूब पर सवार होकर आते हैं और अंधकार को अपना मण्डप बना लेते हैं। अंत में वही व्यक्ति चौड़े स्थान में खड़ा है, राजा बना हुआ, जाति-जाति के सामने गाता हुआ, और भजन अपने अभिषिक्त और उसके वंश पर युगानुयुग करुणा के वचन पर बंद होता है।
मूल बात
इस भजन का धर्मशास्त्रीय केंद्र उस असमानता में छिपा है जिसे हम पढ़ते हुए अक्सर लाँघ जाते हैं। एक आदमी अपने संकट में पुकारता है, और उत्तर में सारी सृष्टि हिल उठती है। "मेरी दुहाई उसके पास पहुँचकर उसके कानों में पड़ी," और अगली ही पंक्ति में पहाड़ों की नींव काँपने लगती है। परमेश्वर दूर से हाथ नहीं हिलाते; "वह स्वर्ग को नीचे झुकाकर उतर आया।" उद्धार यहाँ हमारे ऊपर चढ़ने का नाम नहीं, परमेश्वर के नीचे उतरने का नाम है। और ध्यान दीजिए कि जो उतरते हैं, वे साफ दिखाई नहीं देते: उन्होंने "अंधियारे को अपने छिपने का स्थान" बनाया। बचानेवाला परमेश्वर वही परमेश्वर है जो रहस्य में लिपटे रहते हैं। वे सुनते हैं, वे आते हैं, वे गहरे जल में से खींच लेते हैं, फिर भी वे हमारी समझ के दायरे में नहीं समा जाते। यह भजन हमें बचाव का आराम देता है, पर परमेश्वर पर अधिकार नहीं देता।
सूत्र
भजन का अंतिम शब्द ही सूत्र थमा देता है: "वह अपने ठहराए हुए राजा को महान विजय देता है, वह अपने अभिषिक्त दाऊद पर और उसके वंश पर युगानुयुग करुणा करता रहेगा।" "अभिषिक्त" के लिए इब्रानी शब्द है माशीयाख, मसीह। दाऊद यहाँ अपने बारे में गाते हुए अपने से बड़ी किसी बात को छू लेते हैं, क्योंकि "युगानुयुग" किसी एक जीवनकाल में समा नहीं सकता। और पद 49, "मैं जाति-जाति के सामने तेरा धन्यवाद करूँगा," पौलुस रोमियों 15 में मसीह के मुँह में रखते हैं, यह दिखाने के लिए कि अन्यजातियाँ भी इस स्तुति में शामिल हो गई हैं। ध्यान दीजिए कि यह गीत किसी ने मृत्यु की रस्सियों से खिंचकर निकलने के बाद गाया। एक और अभिषिक्त उन रस्सियों में और गहरे उतरे, और उसी परमेश्वर ने उन्हें ऊपर से हाथ बढ़ाकर थाम लिया। पुनरुत्थान का बीज इस भजन में पहले से धड़क रहा है।
दर्पण
पद 20 से 24 पर हम ठिठक जाते हैं: "यहोवा ने मुझसे मेरी धार्मिकता के अनुसार व्यवहार किया।" यह वही दाऊद हैं जिनका पाप हम जानते हैं। तो क्या यह डींग है? या यह उस आदमी की आवाज़ है जो झूठे आरोपों के बीच जीता रहा और अब कहता है, मैंने सही रास्ता नहीं छोड़ा? यहाँ दर्पण हमारी ओर मुड़ता है। दफ्तर की उस राजनीति में जहाँ आपकी नीयत पर सवाल उठे, उस परिवार में जहाँ आपकी चुप्पी को कमजोरी समझा गया, उस कर्ज़ में जिसे आपने ईमानदारी से चुकाया और किसी ने नहीं देखा, आपके भीतर कोई आवाज़ चाहती है कि कोई तो कहे, मैंने देखा। पद 24 कहता है: "मेरे हाथों की उस शुद्धता के अनुसार जिसे वह देखता था।" वह देखता था। आज एक काम कीजिए: कागज़ पर वह एक बात लिखिए जो आपने सही किया और जिसे किसी ने नहीं सराहा, और उसे ज़ोर से पढ़कर परमेश्वर के सामने रख दीजिए।
मुख्य पात्र
इस भजन का असली पात्र दाऊद नहीं, वह परमेश्वर हैं जिनके नथनों से धुआँ निकलता है और जिनके हाथ गहरे जल में उतरते हैं। यह जोड़ी अजीब है और जानबूझकर अजीब रखी गई है। पद 8 में क्रोध की आग, पद 16 में थामनेवाली उँगलियाँ। पद 14 में तीर और बिजली, पद 35 में "तेरी नम्रता ने मुझे महान बनाया है।" कौन-सा परमेश्वर सच्चा है, तूफान वाला या झुककर उठानेवाला? भजन कहता है: दोनों, और दोनों एक ही आवागमन के हिस्से हैं। जो शक्ति पहाड़ों की नींव हिला देती है, वही एक डूबते आदमी को बाहर खींचने के लिए स्वर्ग झुका देती है। यहाँ रुकिए। यह वह परमेश्वर नहीं जिसे हम अपनी सुविधा के आकार में ढाल सकें। इसीलिए पद 31 का प्रश्न प्रश्न ही रहता है और उत्तर नहीं माँगता: "यहोवा को छोड़ क्या कोई परमेश्वर है?"
पहले सुननेवाले
जो लोग यह गीत मंदिर में गाते थे, उनके लिए "अन्यजातियों का प्रधान" और "परदेशी मेरे वश में हो जाएँगे" राजनीतिक भाषा थी, धार्मिक रूपक नहीं। वे छोटे से देश में रहते थे, बड़े साम्राज्यों की छाया में, जहाँ हर पड़ोसी की सेना उनकी सीमा से बड़ी थी। पद 17, "क्योंकि वे अधिक सामर्थी थे," उनके लिए रोज़ का अनुभव था। और सिनै की भाषा, धुआँ, आग, गरजती वाणी, काली घटा, उन्हें तुरंत मूसा की पहाड़ी पर ले जाती थी। यानी जो परमेश्वर मिस्र से निकाल लाए, वही अब अपने राजा के लिए उतर आए हैं। बंधुआई के बाद जब यह भजन गाया गया होगा, तो पद 50 का वादा जलता हुआ प्रश्न बन गया होगा: वह अभिषिक्त कहाँ है? गाना और प्रतीक्षा करना, दोनों एक साथ।
कठिन प्रश्न
पद 41 सबसे कठिन है: "उन्होंने यहोवा की भी दुहाई दी, परन्तु उसने भी उनको उत्तर न दिया।" वही परमेश्वर जिन्होंने पद 6 में एक पुकार सुनी, यहाँ दूसरी पुकार पर चुप रह जाते हैं। हम इसे मीठा करके नहीं कह सकते। और पद 42, कूट-कूटकर धूल बना देना, हमारी आधुनिक भक्ति की भाषा में फिट नहीं बैठता। शायद ईमानदार बात यह है: यह गीत युद्धभूमि से लौटे आदमी का है, संतुलित धर्मशास्त्रीय निबंध नहीं। और फिर भी शास्त्र ने इसे रखा, क्योंकि यह सच बोलता है कि अन्याय की एक सीमा है और परमेश्वर उदासीन नहीं हैं। पर वह चुप्पी बनी रहती है, और उसे बनी रहने देना चाहिए। जो कहते हैं कि उन्हें परमेश्वर की हर चुप्पी का कारण मालूम है, वे इस भजन से बड़े नहीं, छोटे हैं।
चिंतन
पद 11 कहता है कि परमेश्वर ने अंधियारे को अपना छिपने का स्थान बनाया। आपके जीवन का कौन-सा अंधेरा हिस्सा शायद उनके छिपने का स्थान रहा है, न कि उनकी अनुपस्थिति का प्रमाण?
दाऊद बचाए जाने के बाद पहले शब्द में प्रेम कहते हैं, कृतज्ञता नहीं। आपकी प्रार्थना में परमेश्वर से पाने और परमेश्वर से प्रेम करने के बीच का अनुपात इन दिनों कैसा है?
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Psalms 18 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
भजन संहिता 18 का क्या अर्थ है?
भजन संहिता 18 किस विषय में है?
भजन संहिता 18 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
भजन संहिता 18 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
भजन संहिता 18 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Psalms 18 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, तू जीवित है, यही मेरे लिए काफी है। जब सब कुछ हिलता है, तू वही चट्टान है जिस पर मैं खड़ा रह सकता हूँ। मेरे डर के बीच भी मुझे याद दिला कि तू पास है, और मेरा मन तेरी भलाई के लिए धन्यवाद से भर जाए।
पिता, धन्यवाद कि तू स्तुति के योग्य है और मेरी पुकार सुनता है। जब मैंने डर के बीच तुझे पुकारा, तूने मुझे मेरे शत्रुओं से बचाया। तेरा नाम लेना ही मेरी ढाल बन गया, और तूने मुझे अकेला नहीं छोड़ा।
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