भजन संहिता 43
पाठ
भजन शुरू होता है अदालत की भाषा से: "हे परमेश्वर, मेरा न्याय चुका और विधर्मी जाति से मेरा मुकद्दमा लड़।" प्रार्थना करने वाला किसी छली और कुटिल आदमी के हाथों बदनाम हुआ है, और उसे अपने लिए कोई वकील नहीं मिल रहा, इसलिए वह परमेश्वर को ही वकील बनने को कहता है। फिर वह शिकायत करता है कि परमेश्वर ने उसे छोड़ दिया सा लगता है, मांगता है कि प्रकाश और सच्चाई उसे मन्दिर तक पहुँचाएँ, कल्पना करता है कि वह वेदी के पास वीणा बजाते हुए धन्यवाद कर रहा है, और अन्त में अपने ही प्राण को डाँटता है: "तू क्यों गिरा जाता है?"
मर्म
यह भजन सिखाता है कि न्याय माँगना अविश्वास नहीं है। भजनकार बदला नहीं माँगता, वह मुकद्दमा माँगता है; उसका भरोसा यह है कि सच्चाई अन्ततः परमेश्वर के हाथ में है, न कि चतुर आदमी की जीभ में। और ध्यान दें कि वह किस चीज़ के लिए छुटकारा चाहता है: अपने नाम की सफ़ाई के लिए नहीं, उपस्थिति के लिए। "वे ही मुझ को तेरे पवित्र पर्वत पर और तेरे निवास-स्थान में पहुँचाए।" उसकी सबसे गहरी चोट यह नहीं कि लोग झूठ बोल रहे हैं, बल्कि यह कि झूठ ने उसे परमेश्वर की उपस्थिति से दूर खींच दिया है। यहीं इस भजन की नैतिक धार है: अन्याय हमें सबसे ज़्यादा इस बात में नुकसान पहुँचाता है कि वह हमारी आराधना को कुतर देता है।
सूत्र
"अपने प्रकाश और अपनी सच्चाई को भेज" एक प्रार्थना है जिसका उत्तर भजनकार से भी बड़ा निकला। इस्राएल जानता था कि मन्दिर तक पहुँचने के लिए रास्ता चाहिए, और वह रास्ता परमेश्वर स्वयं देता है। यूहन्ना 14:6 में यीशु अपने बारे में ठीक वही दो शब्द उठाते हैं, मार्ग और सच्चाई, और कहते हैं कि वे ही पिता तक पहुँचाते हैं। मैं यह जोड़ ज़बरदस्ती नहीं बना रहा; यह भजन के ढाँचे से ही निकलता है। भजनकार एक इमारत तक पहुँचना चाहता था, मसीह में वह निवास-स्थान स्वयं हमारे पास आ गया। इसका व्यावहारिक नतीजा यह है: जब बदनामी हमें समुदाय से काट देती है, तब भी परमेश्वर की उपस्थिति तक रास्ता बन्द नहीं होता।
आइना
यह भजन उस जगह पर उँगली रखता है जहाँ हम सबसे ज़्यादा दुखते हैं: जब दफ़्तर में किसी ने आपके बारे में आधा सच बोसा के आगे रख दिया, और सफ़ाई देने का कोई मौका नहीं मिला। जब परिवार में एक रिश्तेदार ने पैसे के मामले में आपकी नीयत पर सवाल उठाया। जब आप रातों को जागकर वही बातचीत मन में दोहराते हैं जो कभी नहीं होगी। भजनकार शोक का पहरावा पहने घूम रहा है, और वह ईमानदार है, लेकिन वह वहीं नहीं रुकता। वह अपने प्राण से बात करता है, उसे सुनता नहीं। यह अन्तर बहुत बड़ा है: भावनाओं को बोलने देना, पर उन्हें फैसला सुनाने न देना।
आज के लिए एक काम: उस व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसने आपको नुकसान पहुँचाया, और उस काग़ज़ को हाथ में लेकर ज़ोर से कहिए, "हे परमेश्वर, मेरा न्याय चुका," फिर काग़ज़ फाड़ दीजिए। अपना मुकद्दमा उनके हाथ में सौंप दीजिए, अपनी जीभ में नहीं।
मुख्य पात्र
भजनकार एक असाधारण रूप से ईमानदार आदमी है। वह परमेश्वर को "मेरा सामर्थी परमेश्वर" कहता है और उसी साँस में पूछता है, "तूने क्यों मुझे त्याग दिया है?" यह विरोधाभास नहीं, यह विश्वास की परिपक्वता है: वह परमेश्वर के सामने शिकायत करता है, परमेश्वर के बारे में नहीं। उसका भीतरी नक्शा तीन तहों वाला है। ऊपर है सार्वजनिक अपमान, बीच में है परमेश्वर की चुप्पी का अनुभव, और सबसे नीचे है एक इच्छा जो इन दोनों से गहरी है, वेदी तक पहुँचने की इच्छा। और वह अपने दुख का इलाज मनोरंजन या बदले में नहीं, आराधना में ढूँढ़ता है: "मैं वीणा बजा-बजाकर तेरा धन्यवाद करूँगा।" वह उस खुशी की कल्पना करता है जो अभी उसके पास नहीं है, और वही कल्पना उसे चलाती है।
प्रसंग
भजन 42 और 43 असल में एक ही कविता हैं; 43 में कोई शीर्षक नहीं है और वही टेक तीसरी बार लौटती है, "हे मेरे प्राण तू क्यों गिरा जाता है?" पिछले भजन से हम जानते हैं कि लिखने वाला यरूशलेम से दूर है, उत्तर में यरदन और हेर्मोन के इलाके में, मन्दिर से कटा हुआ। उस संस्कृति में मन्दिर से दूरी का मतलब केवल भूगोल नहीं था; उसका मतलब था त्योहारों से, गायन से, बलिदान से और समुदाय की पहचान से बाहर होना। और उसके विरोधी इसी का ताना देते हैं। एक "विधर्मी जाति" के बीच फँसा हुआ आदमी, जिसके पास न अदालत है न राजा का कान, उसके पास केवल एक ही अपील बची है, स्वर्ग की।
प्रश्न
फिर भजन उत्तर के साथ खत्म क्यों नहीं होता? परमेश्वर कुछ नहीं कहते। कोई न्याय नहीं सुनाया जाता, कोई शत्रु नहीं गिरता, भजनकार मन्दिर में नहीं पहुँचता। वह केवल अपने प्राण से बात करके कविता बन्द कर देता है। यह असन्तोषजनक है, और मुझे लगता है जानबूझकर है। तीन बार वही टेक दोहराई जाती है क्योंकि एक बार कहना काफ़ी नहीं होता। आशा यहाँ कोई स्विच नहीं है जिसे दबाकर उदासी बुझ जाए; वह एक अभ्यास है जिसे रोज़ दोहराना पड़ता है। भजन हमें यह नहीं सिखाता कि कैसे जल्दी ठीक हो जाएँ, बल्कि यह कि जब ठीक न हों तब भी किससे बात करें। "वह मेरे मुख की चमक और मेरा परमेश्वर है" भविष्य काल में कहा गया वाक्य है, और वह वाक्य उधार लेकर जीना पड़ता है।
चिन्तन
आपके भीतर कौन सा "मुकद्दमा" है जिसे आप बार-बार खुद लड़ते हैं और परमेश्वर के हाथ में नहीं देते?
अन्याय का अनुभव आपकी आराधना को कहाँ कुतर रहा है, और इस हफ़्ते आप किस एक ठोस तरीक़े से वेदी की तरफ़ कदम बढ़ाएँगे?
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