प्रकाशितवाक्य 16
पाठ
सात स्वर्गदूत परमेश्वर के प्रकोप के सात कटोरे पृथ्वी, समुद्र, नदियों, सूर्य, पशु के सिंहासन, फरात और हवा पर उलटते हैं। हर कटोरे के साथ सृष्टि का एक हिस्सा मनुष्य के विरुद्ध हो जाता है: फोड़े, लहू बना पानी, झुलसाने वाली तपन, अंधकार, मन-मन भर के ओले। बीच में स्वर्ग से दो आवाज़ें आती हैं जो कहती हैं कि यह न्याय सही है, और एक चेतावनी कि प्रभु चोर के समान आते हैं। अंत में सिंहासन से शब्द निकलता है, "हो चुका", और बड़ा बाबेल तीन टुकड़ों में टूट जाता है।
केंद्रबिंदु
इस अध्याय की सबसे बेचैन करने वाली बात विपत्तियाँ नहीं हैं, बल्कि वह वाक्य है जो तीन बार लौटता है: "उन्होंने न मन फिराया और न महिमा की।" लोग तपन से झुलसते हैं और परमेश्वर के नाम की निन्दा करते हैं। अंधकार में अपनी जीभ चबाते हैं और फिर निन्दा करते हैं। ओले गिरते हैं, फिर निन्दा। दर्द अपने आप पश्चाताप पैदा नहीं करता। यह धारणा कि दुःख लोगों को नम्र बना देता है, यहाँ टूट जाती है। मनुष्य का हृदय कष्ट में वैसा ही कठोर हो सकता है जैसा समृद्धि में। इसलिए मन फिराना कभी परिस्थिति का स्वाभाविक फल नहीं, वह हमेशा एक निर्णय होता है, और अनुग्रह का काम।
जोड़ने वाला सूत्र
सातवें कटोरे पर सिंहासन से जो शब्द निकलता है, "हो चुका", उसकी गूँज क्रूस से आती है, जहाँ यीशु मसीह ने कहा था कि पूरा हुआ। यही प्रकाशितवाक्य का सबसे गहरा सूत्र है: परमेश्वर का क्रोध कहीं गायब नहीं होता, वह या तो मेम्ने पर गिरता है या उन पर जो अंत तक पशु की छाप को अपनी पहचान बनाए रखते हैं। छठवें कटोरे के समय फरात सूख जाता है, और यह कूच और निर्वासन की पुरानी तस्वीर है: परमेश्वर रास्ता खोलते हैं, कभी बचाने के लिए, कभी हिसाब के लिए। वही हाथ जो लाल समुद्र में बचाता है, यहाँ सेनाओं को हर-मगिदोन तक आने देता है।
आईना
जिस छाप की यहाँ बात है वह माथे पर गुदा कोई चिह्न नहीं, वह निष्ठा है: वह व्यवस्था जिसके भरोसे आप जीते हैं। दफ़्तर में जब सच बोलने की कीमत पदोन्नति हो, तो आप किसकी पूजा करते हैं? जब बिक्री के आँकड़े थोड़े बढ़ाकर दिखाने से महीना अच्छा निकल जाता है, तो किसकी छाप आपके हाथ पर है? यह अध्याय एक और आदत को भी नंगा करता है: तकलीफ़ में शिकायत करना और उसी को आत्मिकता समझ लेना। बीमारी में, बेरोज़गारी में, टूटे रिश्ते में हम बहुत बातें करते हैं, पर "मन फिराना" शब्दकोश से गायब रहता है। आज दस मिनट लें, कागज़ पर वह एक काम लिखिए जिसे आप महीनों से जानते हैं कि गलत है, और ज़ोर से बोलिए: "यह पाप है, मैं इससे मन फिराता हूँ।"
कठिन प्रश्न
पानी का स्वर्गदूत कहता है, "तूने उन्हें लहू पिलाया; क्योंकि वे इसी योग्य हैं।" यह हमारे कानों को चुभता है, और चुभना चाहिए। क्या स्वर्ग में कोई उत्सव है कि लोग झुलस रहे हैं? नहीं, वेदी से जो आवाज़ आती है वह शहीदों की आवाज़ है, उनकी जिनका लहू बहाया गया था, और वे कहते हैं, "तेरे निर्णय ठीक और सच्चे हैं।" जो कभी अन्याय के नीचे नहीं पिसा, उसे यह भाषा क्रूर लगती है; जिसने अपने बच्चे को अन्याय में खोया है, उसके लिए यह पहली बार न्याय जैसा लगता है। फिर भी प्रश्न बचा रहता है: क्या परमेश्वर कठोरता को कठोरता से ही उत्तर देते हैं? पाठ इसका मीठा उत्तर नहीं देता। वह केवल कहता है कि परमेश्वर पवित्र हैं और उनका हिसाब सही है।
पहले सुननेवाले
एशिया माइनर की उन छोटी कलीसियाओं के लिए, जो सम्राट की मूर्ति के सामने धूप जलाने से इनकार करने पर व्यापार, पड़ोस और कभी-कभी जान गँवा देती थीं, यह अध्याय सिद्धांत नहीं था। वे रोज़ देखते थे कि पशु का सिंहासन मज़बूत है और मेम्ने के लोग कमज़ोर। उन्होंने सुना कि उस सिंहासन पर भी एक कटोरा उलटा जाएगा और उसके राज्य पर अंधेरा छा जाएगा। यह उनके लिए बदले की कल्पना नहीं, साँस लेने की जगह थी: रोम अंतिम शब्द नहीं है। और बीच में रखी गई चेतावनी उनके लिए ही थी, क्योंकि खतरा केवल सताव नहीं था, थक जाना और चुपचाप समझौता कर लेना भी था।
एक बारीकी
पंद्रहवीं आयत पूरी तरह बेमेल लगती है। कटोरे उलट रहे हैं, मेंढ़कों जैसी आत्माएँ राजाओं को इकट्ठा कर रही हैं, और अचानक यीशु मसीह बीच में बोल उठते हैं: "देख, मैं चोर के समान आता हूँ; धन्य वह है, जो जागता रहता है।" यह वाक्य विश्व-राजनीति के दृश्य को काटकर सीधे मेरे और आपके सामने आ खड़ा होता है। और जो चित्र वे चुनते हैं वह वस्त्र का है, नंगेपन का: रात में आग लगे तो पता चलता है कि कौन कपड़े पहनकर सोया था। कल के लिए बचाया गया मन फिराना, टाली गई माफ़ी, बाद में सुधारने की योजना, यही वह नंगापन है जिससे वे बचने को कहते हैं।
चिंतन के प्रश्न
पिछले साल के किसी कष्ट में मेरी पहली प्रतिक्रिया क्या थी: शिकायत, या यह प्रश्न कि परमेश्वर मुझमें क्या बदलना चाहते हैं?
मेरे जीवन का कौन सा हिस्सा ऐसा है जिसे मैं नहीं चाहूँगा कि कोई अचानक आकर देख ले?
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Revelation 16 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, जब जीवन में भारी चोटें आती हैं, तो मेरा मन कठोर होने लगता है और शिकायतें होंठों तक आ जाती हैं। मुझे बचा लीजिए कि दर्द में आपसे दूर न भागूँ। मेरा दिल नरम कीजिए, ताकि मुश्किल घड़ी में भी मैं आपकी ओर ही मुड़ूँ और आप पर भरोसा रखूँ।
पिता, जब चारों ओर अंधेरा घिर आता है और दर्द जबान तक पहुँच जाता है, तब भी मेरा मन कठोर न हो। मुझे बचा ले कि मैं तकलीफ़ में तुझसे मुँह मोड़ लूँ। तेरी ज्योति मेरे भीतर जलती रहे, और मैं हर हाल में तेरी ओर लौटता रहूँ।
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