प्रकाशितवाक्य 22:20
पाठ
दृश्य के अंत में, जब नदी, पेड़, नगर और खुले फाटक दिखाई दे चुके हैं, एक आवाज़ फिर बोलती है। यह वही आवाज़ है जो पूरी पुस्तक की गवाही देती आई है, और वह केवल इतना कहती है: "हाँ, मैं शीघ्र आनेवाला हूँ।" और फिर, जैसे कोई बूढ़ा आदमी काँपते हाथ से कलम रखकर आँखें मूँद ले, यूहन्ना उत्तर देता है: "आमीन। हे प्रभु यीशु आ!" पूरे बाइबल का अंतिम संवाद यही है, दो वाक्य, एक वादा और एक प्रार्थना, आमने-सामने। कोई व्याख्या नहीं, कोई समय-सारणी नहीं, कोई चेतावनी की सूची नहीं। बस एक व्यक्ति जो आने का वचन देता है, और एक व्यक्ति जो उसे बुलाता है।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि प्रकाशितवाक्य किसी घटना पर समाप्त नहीं होता, किसी व्यक्ति पर होता है। सात मुहरें, सात तुरहियाँ, सात कटोरे, पशु, वेश्या, युद्ध, सब बीत चुके; और जो बचता है वह है "मैं आनेवाला हूँ।" यही इस पुस्तक का धर्मशास्त्र है: इतिहास का अंत एक योजना का पूरा होना नहीं, एक आगमन है। और जो आ रहा है वह वही मेम्ना है जिसका सिंहासन अब नगर के बीच में है (पद 3)। इसलिए यह वाक्य डर का नहीं, अनुग्रह का है। न्याय करनेवाला और बचानेवाला एक ही हैं। जो विश्वास करता है वह अंत की ओर पीठ करके नहीं, मुँह करके खड़ा होता है, क्योंकि अंत कोई काली दीवार नहीं, एक जाना-पहचाना चेहरा है।
जोड़ने वाला सूत्र
बाइबल की पहली पुस्तक में मनुष्य जीवन के पेड़ से दूर किया गया और उद्यान का रास्ता तलवार से बंद हुआ। यहाँ, अंतिम पृष्ठ पर, वही पेड़ फिर खड़ा है, नदी के दोनों ओर, और फाटक खुले हैं। बीच का सारा इतिहास एक ही प्रश्न है: क्या परमेश्वर अपने लोगों के पास लौटेंगे? "हाँ" उसी प्रश्न का उत्तर है। और यूहन्ना की प्रार्थना नई नहीं है; पौलुस ने कुरिन्थुस की कलीसिया को लिखते हुए अरामी शब्द "मरानाथा" ज्यों का त्यों छोड़ दिया था, क्योंकि यह पुकार यीशु के पहले शिष्यों की भाषा में ही जमी हुई थी (1 कुरिन्थियों 16:22)। मसीह की देह ने शुरू से ही यही साँस ली है: आ, प्रभु, आ।
दर्पण
ईमानदारी से पूछिए: क्या आप सचमुच चाहते हैं कि वे आज आएँ? हममें से बहुतों की प्रार्थना असल में यह है, "आइए, पर पहले बच्चों की पढ़ाई पूरी हो जाए, पहले मकान का कर्ज़ उतर जाए, पहले वह रिश्ता ठीक हो जाए।" यह पुकार उस आदमी के मुँह से निकली थी जिसके पास खोने को कुछ नहीं बचा था। जब आपकी ज़िंदगी आराम से भरी हो, "आ" कहना मुश्किल होता है; जब अस्पताल के गलियारे में रात कटती हो, वही शब्द अपने आप निकलता है। यह पद आपकी आशा की दिशा जाँचता है: आप किस चीज़ के इंतज़ार में सुबह उठते हैं?
आज, किसी एक ठोस दुःख का नाम लेकर, ऊँची आवाज़ में कहिए: "हे प्रभु यीशु, इस बात में आ।" बोलकर कहिए, मन में नहीं।
पहले सुननेवाले
एशिया माइनर की छोटी कलीसियाएँ, जहाँ यह पुस्तक ऊँची आवाज़ में पढ़ी जाती थी। स्मुरना के गरीब विश्वासी, जिनके पास व्यापारिक संघ की सदस्यता नहीं थी क्योंकि उन्होंने सम्राट की मूर्ति के आगे धूप जलाने से इनकार किया था। पिरगमुन के वे लोग जिनके बीच से अंतिपास मारा जा चुका था। उनके लिए "शीघ्र" कोई खगोलीय गणना नहीं थी, बल्कि अदालत की अपील जैसी बात: न्यायी रास्ते में है, बस थोड़ा और सह लो। जब पढ़नेवाला ये अंतिम शब्द बोलता और पूरी सभा मिलकर "आमीन, हे प्रभु यीशु आ!" कहती, तो वह केवल पूजा नहीं थी, वह राजनीतिक साहस था। उनका असली राजा रोम में नहीं, आनेवाला था।
एक बारीकी
"हाँ" शब्द पर रुकिए। यह उत्तर है, पर किस प्रश्न का? यूहन्ना ने अभी कुछ माँगा नहीं। पद 17 में आत्मा और दुल्हन कह चुकी हैं "आ!", और अब मसीह उसी पुकार को उठाकर कहते हैं, "हाँ।" यानी वादा प्रार्थना के बाद नहीं, प्रार्थना के पहले आता है। कलीसिया इसलिए नहीं पुकारती कि शायद वे सुन लें; वह इसलिए पुकारती है क्योंकि वे पहले ही बोल चुके हैं। और यूहन्ना का "आमीन" उस "हाँ" को दोहराता है, जैसे दो हाथ मिलते हैं। हमारी प्रार्थना परमेश्वर के वचन की प्रतिध्वनि है, उसकी याचना नहीं। यह बात आपकी हर अनुत्तरित प्रार्थना को दूसरी रोशनी में रख देती है।
पृष्ठभूमि
पहली सदी का अंत, सम्राट दोमिशियन का समय। यूहन्ना पतमुस नामक चट्टानी टापू पर है, "परमेश्वर के वचन और यीशु की गवाही के कारण" वहाँ भेजा गया, यानी निर्वासित। उस समय सम्राट के किसी नगर में आगमन को "परूसिया" कहा जाता था; सड़कें सजतीं, लोग बाहर निकलकर उसका स्वागत करते। यूहन्ना इसी शब्दावली को उलट देता है: असली आगमन किसी और का है। यह पुस्तक घर-घर नहीं पढ़ी जाती थी, सभा में पढ़ी जाती थी, शायद रोटी तोड़ने से ठीक पहले। इसलिए ये अंतिम शब्द बोलने के तुरंत बाद वे उस मेज़ पर बैठते थे जहाँ आनेवाला प्रभु पहले से उपस्थित था।
चिंतन के प्रश्न
आपकी ज़िंदगी में वह कौन-सी चीज़ है जो आपको "आ, प्रभु यीशु" कहने से रोकती है, और वह क्या बताती है कि आपका भरोसा असल में कहाँ टिका है?
यदि मसीह का "हाँ" आपकी प्रार्थना से पहले ही बोला जा चुका है, तो इस हफ़्ते आपकी प्रार्थना का लहजा कैसे बदलना चाहिए?
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Revelation 22:20 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
प्रकाशितवाक्य 22:20 का क्या अर्थ है?
प्रकाशितवाक्य 22:20 किस विषय में है?
प्रकाशितवाक्य 22:20 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
प्रकाशितवाक्य 22:20 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
प्रकाशितवाक्य 22:20 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Revelation 22 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि आपने मेरे वस्त्र धोने का रास्ता खोला है, अपने पुत्र के लहू से। धन्यवाद कि जीवन के वृक्ष के पास आने का अधिकार मुझ जैसे को भी मिला, और वे फाटक मेरे लिए बंद नहीं, खुले हैं। इस आशा से मेरा मन आज भी भरा हुआ है।
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