बाइबल व्याख्या

प्रकाशितवाक्य 22:21

बाइबल
यह वचन Evangelical Church of Maraland, Goshen द्वारा समर्पित है

पाठ

किताब का आखिरी वाक्य कोई गर्जन नहीं है, कोई अंतिम न्याय का दृश्य नहीं। बस एक छोटी सी आशीष: "प्रभु यीशु का अनुग्रह पवित्र लोगों के साथ रहे। आमीन।" जिस पुस्तक में घोड़े दौड़े, कटोरे उंडेले गए, बाबुल गिरा और नया यरूशलेम उतरा, वह उसी तरह खत्म होती है जैसे पौलुस की चिट्ठियाँ खत्म होती थीं: एक पत्र के अंत में लिखा गया विदाई-वचन, जो पढ़नेवाले के होंठों से निकलकर सुननेवालों के सिर पर उतरता है। ठीक इससे पहले की साँस में कलीसिया ने पुकारा था, "हे प्रभु यीशु आ!" और अब उत्तर में नहीं, बल्कि प्रतीक्षा के बीच में, अनुग्रह दिया जाता है। आमीन। दीया बुझा दिया जाता है, लोग घर लौटते हैं।

मर्म

यह अंत बताता है कि प्रकाशितवाक्य असल में क्या है: भविष्य का नक्शा नहीं, बल्कि दबाव में जी रही कलीसियाओं के लिए एक चरवाहे का पत्र। और पत्र का अंतिम शब्द "अनुग्रह" है, यह संयोग नहीं। जिन लोगों ने अभी-अभी सुना कि कुत्ते, टोन्हें और हर झूठ का गढ़नेवाला "बाहर रहेगा", वे काँप सकते थे; उनमें से कई जानते थे कि उन्होंने बाजार में, कारखाने में, सम्राट की मूर्ति के सामने कहाँ-कहाँ समझौता किया है। उन्हीं के लिए अंतिम वाक्य न्याय की चेतावनी नहीं, बल्कि दान है। जो वस्त्र धोए जाते हैं (पद 14), वे अपने साबुन से नहीं धुलते। मेम्ने का सिंहासन जो नगर के बीच है, उसी से यह अनुग्रह बहता है, उसी जीवन के जल की तरह, "सेंत-मेंत"। परमेश्वर का आखिरी शब्द माँग नहीं, देन है।

सूत्र

बाइबल का आखिरी वाक्य आशीर्वाद है, और यह पूरी कहानी के आकार के बारे में कुछ कहता है। जिस कथा की शुरुआत में श्राप पड़ा था, वह इस किताब में पहले ही उलट दी जा चुकी है: "फिर श्राप न होगा" (पद 3)। और उसके ठीक बाद वह दृश्य आता है जो हर इस्राएली को जाना-पहचाना लगता: परमेश्वर का नाम लोगों के माथों पर। गिनती 6 में हारून को यही आज्ञा थी कि वह परमेश्वर का नाम इस्राएल पर रखे, और नाम रखने का तरीका आशीष बोलना था। प्रकाशितवाक्य वही करता है। पत्र का अंत याजकीय हाथ की तरह उठता है और कलीसिया के सिर पर उतरता है। मसीह आदि और अंत हैं, और अंत का स्वर माँग नहीं, वरदान है।

दर्पण

आप यह वाक्य उस जीवन में सुनते हैं जहाँ दफ्तर में झूठ बोलना आसान था, जहाँ बैंक का संदेश पढ़कर पेट में गाँठ पड़ती है, जहाँ किसी रिश्ते में आपने वह बात कही जो वापस नहीं ली जा सकती। प्रकाशितवाक्य पढ़ने के बाद अक्सर दो प्रतिक्रियाएँ होती हैं: डर, या तारीखों का हिसाब। यह अंतिम पंक्ति दोनों को खाली कर देती है। वह न तो आपको शुद्धता का प्रमाणपत्र देती है, न आपको भविष्य का कैलेंडर थमाती है; वह आपके कंधे पर हाथ रखकर कहती है कि जिस समय में आप जी रहे हैं, उस पूरे अंतराल का नाम अनुग्रह है। आज किसी एक व्यक्ति का नाम लीजिए, और उससे आमने-सामने या फोन पर ऊँची आवाज़ में कहिए: "प्रभु यीशु का अनुग्रह तुम्हारे साथ रहे।" मन में नहीं, बोलकर।

प्रश्न

"पवित्र लोगों के साथ रहे।" यह सीमा खटकती है। चार पद पहले दरवाजे के बाहर खड़ी भीड़ की सूची है, और सत्रहवें पद में सबसे खुला निमंत्रण: "जो कोई चाहे वह जीवन का जल सेंत-मेंत ले।" किताब इन दोनों को एक साथ रखती है और सुलझाती नहीं। क्या अनुग्रह केवल भीतरवालों का है? पाठ इतना ही कहता है कि यह आशीष उन पर उतरती है जो सुन रहे हैं, जो उस कमरे में बैठे हैं, जिन्होंने "आ!" कहा। बाहरवालों के लिए द्वार खुले हैं, पर द्वार द्वार ही रहता है। मुझे इसका सुंदर समाधान नहीं मिलता। शायद यही ईमानदारी है: परमेश्वर किसी को जबरदस्ती भीतर नहीं घसीटते, और प्यास से इनकार करना भी एक चुनाव है।

मुख्य पात्र

इस छोटे वाक्य का केंद्र एक नाम है: प्रभु यीशु। पूरी किताब में वह कभी वध किया हुआ मेम्ना है, कभी घोड़े पर सवार, कभी "दाऊद का मूल और वंश, और भोर का चमकता हुआ तारा" (पद 16)। अंत में वही व्यक्ति एक चीज़ देता है जो उसकी अपनी है: उसका अनुग्रह। यह ध्यान देने योग्य है कि यूहन्ना यह नहीं लिखते कि प्रभु की शक्ति या प्रभु का न्याय तुम्हारे साथ रहे। जिसने तीन बार कहा "मैं शीघ्र आनेवाला हूँ", वह अपनी अनुपस्थिति के खालीपन में अपना अनुग्रह छोड़ जाता है, जैसे कोई जाते समय अपना कोट उतारकर ठिठुरते हुए पर डाल दे। वह दूर नहीं है; वह अपने दिए हुए में उपस्थित है।

श्रोताओं का चेहरा

पहली सदी का अंत, एशिया माइनर का कोई घर। दीये का तेल जल रहा है, नीचे गली से मछली और धुएँ की गंध आ रही है। एक दास, एक रंगरेज़, एक विधवा, कुछ बच्चे; पढ़नेवाला पत्र का आखिरी हिस्सा खोलता है। वे "अनुग्रह" शब्द को उस दुनिया में सुनते हैं जहाँ कारिस, यानी संरक्षक का दिया हुआ उपहार, जीवन की धुरी थी: ताकतवर देता था, कमजोर आजीवन कृतज्ञ रहता था। अब उन्हें बताया जाता है कि उनका संरक्षक सम्राट नहीं, मेम्ना है, और उसका उपहार सेंत-मेंत है। कल सुबह वे फिर उसी शहर में निकलेंगे जहाँ मंदिर की जुलूस निकलती है और व्यापारी संघ की दावत में मूर्ति के सामने माँस परोसा जाता है। पर आज रात, सबने मिलकर कहा: आमीन।

चिंतन

आप इस समय, मसीह के आने और अब के बीच के अंतराल को किस नाम से पुकारते हैं: प्रतीक्षा, देरी, या अनुग्रह?

किसकी आशीष आपके ऊपर कभी नहीं बोली गई, और आप आज किसके ऊपर वह बोल सकते हैं?

Revelation में और गहराई से जानें

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The Message of Revelation

Michael Wilcock

A steady, sane guide through the visions to the throne of the Lamb.

Revelation For Everyone

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Wright makes the last book hopeful instead of frightening.

Revelation: An Introduction and Commentary

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A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Revelation

Craig Keener

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Revelation 22:21 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

प्रकाशितवाक्य 22:21 का क्या अर्थ है?
किताब का आखिरी वाक्य कोई गर्जन नहीं है, कोई अंतिम न्याय का दृश्य नहीं। बस एक छोटी सी आशीष: "प्रभु यीशु का अनुग्रह पवित्र लोगों के साथ रहे। आमीन।" जिस पुस्तक में घोड़े दौड़े, कटोरे उंडेले गए, बाबुल गिरा और नया यरूशलेम उतरा, वह उसी तरह खत्म होती है जैसे पौलुस की चिट्ठियाँ खत्म होती थीं: एक पत्र के अंत में लिखा गया विदाई-वचन, जो पढ़नेवाले के होंठों से निकलकर सुननेवालों के सिर पर उतरता है। ठीक इससे पहले की साँस
प्रकाशितवाक्य 22:21 किस विषय में है?
बाइबल का आखिरी वाक्य आशीर्वाद है, और यह पूरी कहानी के आकार के बारे में कुछ कहता है। जिस कथा की शुरुआत में श्राप पड़ा था, वह इस किताब में पहले ही उलट दी जा चुकी है: "फिर श्राप न होगा" (पद 3)। और उसके ठीक बाद वह दृश्य आता है जो हर इस्राएली को जाना-पहचाना लगता: परमेश्वर का नाम लोगों के माथों पर। गिनती 6 में हारून को यही आज्ञा थी कि वह परमेश्वर का नाम इस्राएल पर रखे, और नाम रखने का तरीका आशीष बोलना था। प्रकाशितवाक्य वही करता है। पत्र का अंत याजकीय हाथ की तरह उठता है और कलीसिया के सिर पर उतरता है। मसीह आदि और अंत हैं, और अंत का स्वर माँग नहीं, वरदान है।
प्रकाशितवाक्य 22:21 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
"पवित्र लोगों के साथ रहे।" यह सीमा खटकती है। चार पद पहले दरवाजे के बाहर खड़ी भीड़ की सूची है, और सत्रहवें पद में सबसे खुला निमंत्रण: "जो कोई चाहे वह जीवन का जल सेंत-मेंत ले।" किताब इन दोनों को एक साथ रखती है और सुलझाती नहीं। क्या अनुग्रह केवल भीतरवालों का है? पाठ इतना ही कहता है कि यह आशीष उन पर उतरती है जो सुन रहे हैं, जो उस कमरे में बैठे हैं, जिन्होंने "आ!
प्रकाशितवाक्य 22:21 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पहली सदी का अंत, एशिया माइनर का कोई घर। दीये का तेल जल रहा है, नीचे गली से मछली और धुएँ की गंध आ रही है। एक दास, एक रंगरेज़, एक विधवा, कुछ बच्चे; पढ़नेवाला पत्र का आखिरी हिस्सा खोलता है। वे "अनुग्रह" शब्द को उस दुनिया में सुनते हैं जहाँ कारिस, यानी संरक्षक का दिया हुआ उपहार, जीवन की धुरी थी: ताकतवर देता था, कमजोर आजीवन कृतज्ञ रहता था। अब उन्हें बताया जाता है कि उनका संरक्षक सम्राट नहीं, मेम्ना है, और उसका उपहार सेंत-मेंत है। कल सुबह वे फिर उसी शहर में निकलेंगे जहाँ मंदिर की जुलूस निकलती है और व्यापारी संघ की दावत में मूर्ति के सामने माँस परोसा जाता है। पर आज रात, सबने मिलकर कहा: आमीन।
प्रकाशितवाक्य 22:21 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
किसकी आशीष आपके ऊपर कभी नहीं बोली गई, और आप आज किसके ऊपर वह बोल सकते हैं?
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Revelation 22 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 14

पिता, धन्यवाद कि आपने मेरे वस्त्र धोने का रास्ता खोला है, अपने पुत्र के लहू से। धन्यवाद कि जीवन के वृक्ष के पास आने का अधिकार मुझ जैसे को भी मिला, और वे फाटक मेरे लिए बंद नहीं, खुले हैं। इस आशा से मेरा मन आज भी भरा हुआ है।

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