रोमियों 11:11
पाठ
रोम की उस छोटी कलीसिया में, जहाँ यहूदी और अन्यजाति विश्वासी एक ही मेज़ पर बैठते थे और एक-दूसरे को तिरछी नज़र से देखते थे, पौलुस एक ऐसा सवाल उठाते हैं जो हवा में लटका हुआ था: "क्या उन्होंने इसलिए ठोकर खाई, कि गिर पड़ें?" यानी, क्या इस्राएल का मसीह को ठुकराना उनका अंतिम और स्थायी पतन है, क़िस्सा ख़त्म? पौलुस का उत्तर तेज़ और बिना हिचक का है: "कदापि नहीं।" फिर वे एक अजीब-सा मोड़ लेते हैं। इस्राएल की यही ठोकर वह दरवाज़ा बन गई जिससे अन्यजातियों तक उद्धार पहुँचा, और यह उद्धार बेमक़सद नहीं है: यह इस्राएल में जलन जगाने के लिए है, एक ऐसी कसक जो उन्हें वापस खींच ले।
केंद्रीय सत्य
यह पद परमेश्वर के काम करने के ढंग के बारे में कुछ असुविधाजनक बताता है। वे मनुष्य की ठोकर को रद्द नहीं करते, वे उसे अपनी योजना में पिरो लेते हैं। इस्राएल की विफलता वास्तविक विफलता है, पौलुस उसे नरम नहीं करते; फिर भी वह विफलता इतिहास का अंतिम शब्द नहीं बनती। अन्यजातियों का उद्धार किसी वैकल्पिक "प्लान बी" का नतीजा नहीं है, जैसे परमेश्वर ने हारकर दूसरा रास्ता चुन लिया हो। और यहाँ असली चुभन है: अन्यजातियों को यह अनुग्रह मिला ही इसलिए कि इस्राएल उसे देखे और तरसे। यानी तुम्हारा उद्धार तुम्हारी उपलब्धि नहीं, बल्कि परमेश्वर की उस वफ़ादारी का औज़ार है जो उन्होंने अपने पुराने वादों से कभी नहीं तोड़ी। अनुग्रह यहाँ कभी किसी को अपने ऊपर गर्व करने की जगह नहीं देता।
पूरी कहानी का धागा
पौलुस यहाँ कोई नया विचार गढ़ नहीं रहे; वे मूसा के उस पुराने गीत से उधार ले रहे हैं जो व्यवस्थाविवरण के अंत में गाया गया था। वहाँ परमेश्वर कहते हैं कि इस्राएल ने जो परमेश्वर नहीं हैं उनसे उन्हें जलाया, इसलिए वे भी एक ऐसी जाति के ज़रिए इस्राएल में जलन जगाएँगे जो जाति कहलाने लायक़ भी नहीं। मरुभूमि के किनारे कही गई वह चेतावनी अब रोम की गलियों में पूरी हो रही है: गैर-यहूदी लोग, जो कल तक मूर्तियों के सामने झुकते थे, आज अब्राहम के परमेश्वर को "पिता" कहकर पुकार रहे हैं। और बीच में खड़ा है मसीह, वही ठोकर का पत्थर जिस पर इस्राएल लड़खड़ाया और वही नींव जिस पर संसार खड़ा हुआ। क्रूस पर जो सबसे बड़ी विफलता दिखी, वही सबसे बड़ी मुक्ति निकली। यह पद उसी ढाँचे को इतिहास के पैमाने पर दोहराता है।
दर्पण
सन् 49 में सम्राट क्लौदियुस ने यहूदियों को रोम से निकाल दिया था। जब कुछ साल बाद वे लौटे, तो उन्होंने पाया कि जिन घर-कलीसियाओं को उन्होंने शुरू किया था, वे अब अन्यजाति विश्वासियों के हाथ में हैं, उनके रीति-रिवाज़ों के साथ, उनके भोजन के साथ। कल्पना कीजिए उस बेदखली की चुभन। और दूसरी तरफ़ वह चुपचाप पनपता अहंकार: "हम हैं अब असली वारिस।" पौलुस दोनों की नस दबाते हैं। आप भी किसी को मन ही मन लिख चुके हैं, है ना? वह भाई जो कलीसिया छोड़ गया, वह बेटी जिसने विश्वास को बचकाना कह दिया, वह रिश्तेदार जिसके सामने सुसमाचार रखना अब बेकार लगता है। आपने फ़ाइल बंद कर दी है। पौलुस उस बंद फ़ाइल पर लिखते हैं: "कदापि नहीं।" आज एक काग़ज़ पर उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिसे आपने भीतर से "गया हुआ मामला" मान लिया है, और उस नाम के नीचे लिखिए: कदापि नहीं। फिर एक वाक्य में उसके लिए प्रार्थना कीजिए।
कठिन सवाल
पर यह "जलन" वाली बात खटकती है। क्या परमेश्वर एक समूह को ठोकर खिलाकर दूसरे को बचाते हैं, और फिर दूसरे को दिखाकर पहले को तरसाते हैं? क्या लोग इस तरह मोहरे हैं? पौलुस इस सवाल को नरम नहीं करते; ऊपर पद आठ में वे कठोरता की भाषा तक जाते हैं। ईमानदारी यही है कि यहाँ एक खाई है जिसे हम पाट नहीं सकते। जो हम कह सकते हैं वह इतना है: पौलुस इस तर्क का इस्तेमाल किसी को छोड़ने के लिए नहीं, बल्कि हर किसी की उम्मीद बचाने के लिए करते हैं। इसी अध्याय के अंत में वे लिखते हैं कि परमेश्वर ने सबको आज्ञा न मानने में बंद कर रखा है ताकि वे सब पर दया करें। यह उत्तर नहीं है, यह दिशा है। और बाक़ी पौलुस भी नहीं समझा पाते; वे अध्याय के अंत में बस आराधना में फूट पड़ते हैं।
एक बारीकी
"जलन" शब्द को जल्दी से मत निकल जाइए। यूनानी में यह पाराज़ेलोओ है, और इसकी जड़ वही है जो परमेश्वर के "जलन रखनेवाले" होने में मिलती है। यह ईर्ष्या नहीं, जो दूसरे का सुख छीनना चाहती है; यह वह टीस है जो तब उठती है जब आप किसी और को उस जगह बैठे देखते हैं जो आपकी थी। घर लौटे यहूदी विश्वासी अपने ही आँगन में अजनबियों को गाते सुन रहे थे। पौलुस कहते हैं: यही कसक दवा है। परमेश्वर अपने लोगों को तर्क से नहीं, तड़प से वापस बुलाते हैं। यह वही ढंग है जो होशे की किताब में दिखता है, जहाँ छोड़ा हुआ पति अपनी पत्नी को डाँटकर नहीं, लुभाकर वापस लाता है।
मुख्य पात्र
इस पद में असली पात्र पौलुस नहीं, परमेश्वर हैं, और वे यहाँ एक बेहद अजीब रूप में दिखते हैं: एक ऐसा प्रेमी जो इनकार को स्वीकार नहीं करता। वे इस्राएल की ठोकर पर पर्दा नहीं डालते, न उसे माफ़-सा बना देते हैं। पर वे इनकार को भी अपने हाथ में लेकर उसे वापसी का रास्ता बना देते हैं। यही परमेश्वर का स्वभाव है: वे हारकर विषय बदल नहीं लेते। उनकी वफ़ादारी हमारी वफ़ादारी पर टिकी नहीं है, वरना कब की टूट चुकी होती। और यह वही स्वभाव है जो आपके अपने जीवन पर लागू होता है, चाहे आपकी ठोकर कितनी भी पुरानी क्यों न हो।
मनन के लिए
आपके जीवन में वह कौन-सा "गिरना" है जिसे आप अब तक सिर्फ़ विफलता मानते आए हैं, और क्या होगा अगर परमेश्वर उससे भी कुछ बुन रहे हों?
आपका विश्वास किसी और के मन में तड़प जगाता है या सिर्फ़ दूरी?
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Romans 11:11 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
रोमियों 11:11 का क्या अर्थ है?
रोमियों 11:11 किस विषय में है?
रोमियों 11:11 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
रोमियों 11:11 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
रोमियों 11:11 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Romans 11 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
एलिय्याह की शिकायत सुनिए: "हे प्रभु, उन्होंने तेरे भविष्यद्वक्ताओं को मार डाला और तेरी वेदियों को ढा दिया है; और मैं ही अकेला बच गया हूँ, और वे मेरे प्राण के भी खोजी हैं।" वह गिन रहा था, और गिनती में सिर्फ़ खुद को पाया। पर परमेश्वर के पास दूसरी गिनती थी, सात हज़ार। आपका अकेलापन सच्चा दर्द है, मगर पूरा सच नहीं।
पिता, मुझे याद दिला कि मैं तेरी दया से ही इस पेड़ में जुड़ा हूँ, अपनी योग्यता से नहीं। मेरे मन का घमंड तोड़ दे और डर के बजाय आदर से भरा भरोसा दे। मुझे नम्र रख, ताकि मैं तेरी भलाई को हल्के में न लूँ।
धन्यवाद पिता, कि आप फिर से लगा सकते हैं। जो डाली टूट गई, उसे भी आप कलम की तरह वापस जोड़ देते हैं। इसलिए जो अभी अविश्वास में हैं, उनके लिए भी आशा बाकी है। आपकी सामर्थ्य हमारी टूटन से बड़ी है, इसके लिए मेरा हृदय आपका आभारी है।
जंगली जैतून की डाली को अच्छे पेड़ में लगाना, यह प्रकृति के विरुद्ध है। माली ऐसा नहीं करते। पर परमेश्वर ने तेरे साथ यही किया। तू जो दूर था, पराया था, उसे उसने अपने पवित्र पेड़ में जोड़ लिया।
जब कभी लगे कि तू यहाँ का नहीं है, याद रखना, तेरा जुड़ना उसकी कृपा का चमत्कार है, तेरी योग्यता का इनाम नहीं।
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