बाइबल व्याख्या

रोमियों 11:24

बाइबल
यह वचन MANIKPUR BAPTIST CHURCH द्वारा समर्पित है

पाठ

पौलुस जैतून के एक बाग में खड़ा होकर बोल रहा है, कम से कम उसकी कल्पना में। उसके हाथ में चाकू है, और वह रोम की उस कलीसिया को, जिसमें अन्यजाति विश्वासियों की संख्या बढ़ती जा रही थी, एक ऐसी बात दिखा रहा है जो हर किसान जानता था: कोई भी समझदार माली जंगली डाली काटकर अच्छे पेड़ में नहीं जोड़ता। उलटा होता है। फिर भी, पौलुस कहता है, परमेश्वर ने ठीक यही किया, "तू उस जैतून से, जो स्वभाव से जंगली है, काटा गया और स्वभाव के विरुद्ध अच्छी जैतून में साटा गया।" और अगर वे इतना असम्भव काम कर चुके हैं, तो टूटी हुई स्वाभाविक डालियों को उन्हीं के अपने पेड़ में वापस जोड़ देना उनके लिए कितना सहज होगा।

मर्म

ध्यान दीजिए, पौलुस का तर्क "छोटे से बड़े" की ओर नहीं, बल्कि "कठिन से सरल" की ओर चलता है। अनुग्रह ने पहले ही प्रकृति के नियम को तोड़ दिया है; जो तर्कसंगत नहीं था, वह हो चुका है। तो फिर जो तर्कसंगत है, वह क्यों न होगा? यहीं इस आयत का धर्मशास्त्रीय हृदय धड़कता है: परमेश्वर की विश्वासयोग्यता उनके स्वभाव पर टिकी है, हमारी योग्यता पर नहीं। अन्यजाति विश्वासी अपने जुड़े होने को अपनी उपलब्धि समझने लगे थे, मानो इस्राएल की जगह उन्होंने कमाई हो। पौलुस उस घमण्ड की जड़ काट देता है। आप इस पेड़ पर हैं क्योंकि माली ने नियम तोड़ा, न कि क्योंकि आपकी लकड़ी बेहतर थी। और वही माली अपने पुराने हाथ से लगाए पेड़ को नहीं भूला।

सूत्र

एक ही पेड़। यही इस पूरे रूपक की सबसे ज़िद्दी बात है। पौलुस दो पेड़ नहीं बनाता, एक पुराना और एक नया, एक इस्राएल का और एक कलीसिया का। परमेश्वर के पास हमेशा से एक ही जैतून रहा है, जिसकी जड़ अब्राहम से की गई वाचा है, और उस पर अनुग्रह की कलमें चढ़ती रही हैं। मसीह इस कहानी में कोई नया पेड़ नहीं लगाते; वे वह हैं जिनमें जड़ और डालियाँ मिलती हैं, वह छुड़ानेवाला जिसके बारे में पौलुस कुछ ही पंक्तियों बाद कहता है, "छुड़ानेवाला सिय्योन से आएगा, और अभक्ति को याकूब से दूर करेगा।" क्रूस पर जो दीवार गिरी, वह दो पेड़ों के बीच की नहीं थी, बल्कि एक पेड़ और उन लोगों के बीच की थी जो उससे बाहर खड़े थे। इसलिए आयत 24 कोई दयालु पूर्वानुमान नहीं, वाचा का तर्क है: जिस परमेश्वर ने बाहरवालों को भीतर लिया, वे अपने ही घरवालों को बाहर नहीं छोड़ेंगे।

दर्पण

हम सबके पास एक सूची है। उस पर उन लोगों के नाम हैं जिन्हें हमने चुपचाप लिख दिया है: वह भाई जो बीस साल से कलीसिया नहीं आया, वह बेटी जिसने विश्वास को "पुरानी पीढ़ी की बात" कह दिया, वह सहकर्मी जो हर बातचीत में व्यंग्य करता है, वह पिता जिसकी कठोरता अब पत्थर जैसी लगती है। हम प्रार्थना करना बंद नहीं करते, पर उम्मीद करना बंद कर चुके होते हैं। और उस निराशा के नीचे अक्सर एक सूक्ष्म घमण्ड छिपा होता है: मैं तो विश्वास में बना रहा, वे नहीं रहे। पौलुस उस घमण्ड पर चाकू रखता है। आपका जुड़ा होना भी प्रकृति के विरुद्ध एक चमत्कार था। आपने जो पाया है वह योग्यता नहीं, कलम है। आज एक काम कीजिए: एक कागज़ पर उस व्यक्ति का नाम लिखिए जिसे आपने मन ही मन छोड़ दिया है, और उस नाम को देखते हुए ज़ोर से कहिए, "परमेश्वर उन्हें फिर साट सकते हैं," फिर उसी वाक्य को प्रार्थना में बदल दीजिए।

पृष्ठभूमि

यह पत्र लगभग सन् 57 में लिखा गया, और रोम की कलीसिया का इतिहास अभी ताज़ा घाव था। कुछ ही साल पहले सम्राट क्लौदियुस ने यहूदियों को रोम से निकाल दिया था; जो यहूदी विश्वासी लौटे, उन्होंने पाया कि घर बदल चुका है। सभाएँ अब अन्यजाति विश्वासियों से भरी थीं, भाषा बदल गई थी, नेतृत्व बदल गया था। उस माहौल में यह कहना आसान था, और शायद कहा भी जा रहा था: "डालियाँ इसलिए तोड़ी गई, कि मैं साटा जाऊँ।" भूमध्यसागरीय किसान जैतून की कलम लगाना अच्छी तरह जानता था, पर हमेशा उलटी दिशा में, अच्छी कलम जंगली जड़ पर। पौलुस जानबूझकर प्रक्रिया उलट देता है, और उसके सुननेवाले मुस्कुराए होंगे: यह तो कोई नहीं करता। बिल्कुल। और यही बात है।

एक बारीकी

"अपने ही जैतून में।" तीन छोटे शब्द, और पूरा वजन उन्हीं पर है। पौलुस कह सकता था "उस जैतून में," पर उसने स्वामित्व का शब्द चुना। टूटी हुई डालियाँ किसी पराए पेड़ में मेहमान बनकर नहीं लौटतीं; वे घर लौटती हैं। अन्यजाति विश्वासी के लिए यह जुड़ना "स्वभाव के विरुद्ध" था, यूनानी में परा फ़ुसिन, यानी प्रकृति की दिशा के आर-पार। पर इस्राएल के लिए यह स्वभाव के अनुकूल है। कल्पना कीजिए: एक डाली ज़मीन पर पड़ी है, सूखती हुई, और माली झुककर उसे उठाता है और उसी तने पर रखता है जहाँ से वह निकली थी, जहाँ छाल का निशान अब भी बना है। कलम वहीं सबसे अच्छी बैठती है जहाँ घाव पुराना हो।

मुख्य पात्र

इस दृश्य में असली पात्र माली है, और उसका चरित्र उसके काम से खुलता है। वे वही परमेश्वर हैं जिनके बारे में पौलुस ने अभी कहा है, "परमेश्वर की दयालुता और कड़ाई को देख!" यह माली भावुक नहीं है; उसने सचमुच डालियाँ तोड़ी हैं, और वह चेतावनी देता है कि फिर तोड़ सकता है। पर उसकी कठोरता कभी अंतिम शब्द नहीं होती। वह अपने ही बनाए नियमों के विरुद्ध जाकर जंगली लकड़ी को अपने पेड़ में जगह देता है, क्योंकि उसका लक्ष्य साफ़-सुथरा बाग नहीं, भरा हुआ बाग है। और वह भूलता नहीं। जो हाथ कलम लगाने के लिए इतनी दूर गया, वह हाथ अपने पुराने रोपे को याद रखता है। यही परमेश्वर की स्मृति है, और हमारी एकमात्र आशा।

चिंतन

आपके जीवन में कौन-सी बात आप चुपचाप अपनी योग्यता मानते हैं, जो असल में "स्वभाव के विरुद्ध" मिला हुआ अनुग्रह है?

यदि परमेश्वर उस व्यक्ति को सचमुच वापस जोड़ दें जिसे आपने छोड़ दिया है, तो क्या आप खुश होंगे, या थोड़े असहज?

Romans में और गहराई से जानें

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The Message of Romans

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A modern classic on the letter that has changed history more than once.

Romans: An Introduction and Commentary

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Romans 11:24 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

रोमियों 11:24 का क्या अर्थ है?
पौलुस जैतून के एक बाग में खड़ा होकर बोल रहा है, कम से कम उसकी कल्पना में। उसके हाथ में चाकू है, और वह रोम की उस कलीसिया को, जिसमें अन्यजाति विश्वासियों की संख्या बढ़ती जा रही थी, एक ऐसी बात दिखा रहा है जो हर किसान जानता था: कोई भी समझदार माली जंगली डाली काटकर अच्छे पेड़ में नहीं जोड़ता। उलटा होता है। फिर भी, पौलुस कहता है, परमेश्वर ने ठीक यही किया, "तू उस जैतून से, जो स्वभाव से जंगली है, काटा गया और स्वभाव के विरुद्ध अच्छी जैतून में साटा गया।" और अगर वे इतना असम्भव काम कर चुके हैं, तो टूटी हुई स्वाभाविक डालियों को उन्हीं के अपने पेड़ में वापस जोड़ देना उनके लिए कितना सहज होगा।
रोमियों 11:24 किस विषय में है?
एक ही पेड़। यही इस पूरे रूपक की सबसे ज़िद्दी बात है। पौलुस दो पेड़ नहीं बनाता, एक पुराना और एक नया, एक इस्राएल का और एक कलीसिया का। परमेश्वर के पास हमेशा से एक ही जैतून रहा है, जिसकी जड़ अब्राहम से की गई वाचा है, और उस पर अनुग्रह की कलमें चढ़ती रही हैं। मसीह इस कहानी में कोई नया पेड़ नहीं लगाते; वे वह हैं जिनमें जड़ और डालियाँ मिलती हैं, वह छुड़ानेवाला जिसके बारे में पौलुस कुछ ही पंक्तियों बाद कहता है, "छुड़ानेवाला सिय्योन से आएगा, और अभक्ति को याकूब से दूर करेगा।" क्रूस पर जो दीवार गिरी, वह दो पेड़ों के बीच की नहीं थी, बल्कि एक पेड़ और उन लोगों के बीच की थी जो उससे बाहर खड़े थे। इसलिए आयत 24 कोई दयालु पूर्वानुमान नहीं, वाचा का तर्क है: जिस परमेश्वर ने बाहरवालों को भीतर लिया, वे अपने ही घरवालों को बाहर नहीं छोड़ेंगे।
रोमियों 11:24 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यह पत्र लगभग सन् 57 में लिखा गया, और रोम की कलीसिया का इतिहास अभी ताज़ा घाव था। कुछ ही साल पहले सम्राट क्लौदियुस ने यहूदियों को रोम से निकाल दिया था; जो यहूदी विश्वासी लौटे, उन्होंने पाया कि घर बदल चुका है। सभाएँ अब अन्यजाति विश्वासियों से भरी थीं, भाषा बदल गई थी, नेतृत्व बदल गया था। उस माहौल में यह कहना आसान था, और शायद कहा भी जा रहा था: "डालियाँ इसलिए तोड़ी गई, कि मैं साटा जाऊँ।" भूमध्यसागरीय किसान जैतून की कलम लगाना अच्छी तरह जानता था, पर हमेशा उलटी दिशा में, अच्छी कलम जंगली जड़ पर। पौलुस जानबूझकर प्रक्रिया उलट देता है, और उसके सुननेवाले मुस्कुराए होंगे: यह तो कोई नहीं करता। बिल्कुल। और यही बात है।
रोमियों 11:24 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इस दृश्य में असली पात्र माली है, और उसका चरित्र उसके काम से खुलता है। वे वही परमेश्वर हैं जिनके बारे में पौलुस ने अभी कहा है, "परमेश्वर की दयालुता और कड़ाई को देख!" यह माली भावुक नहीं है; उसने सचमुच डालियाँ तोड़ी हैं, और वह चेतावनी देता है कि फिर तोड़ सकता है। पर उसकी कठोरता कभी अंतिम शब्द नहीं होती। वह अपने ही बनाए नियमों के विरुद्ध जाकर जंगली लकड़ी को अपने पेड़ में जगह देता है, क्योंकि उसका लक्ष्य साफ़-सुथरा बाग नहीं, भरा हुआ बाग है। और वह भूलता नहीं। जो हाथ कलम लगाने के लिए इतनी दूर गया, वह हाथ अपने पुराने रोपे को याद रखता है। यही परमेश्वर की स्मृति है, और हमारी एकमात्र आशा।
रोमियों 11:24 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यदि परमेश्वर उस व्यक्ति को सचमुच वापस जोड़ दें जिसे आपने छोड़ दिया है, तो क्या आप खुश होंगे, या थोड़े असहज?
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Romans 11 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 3

एलिय्याह की शिकायत सुनिए: "हे प्रभु, उन्होंने तेरे भविष्यद्वक्ताओं को मार डाला और तेरी वेदियों को ढा दिया है; और मैं ही अकेला बच गया हूँ, और वे मेरे प्राण के भी खोजी हैं।" वह गिन रहा था, और गिनती में सिर्फ़ खुद को पाया। पर परमेश्वर के पास दूसरी गिनती थी, सात हज़ार। आपका अकेलापन सच्चा दर्द है, मगर पूरा सच नहीं।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 21

पिता, मुझे याद दिला कि मैं तेरी दया से ही इस पेड़ में जुड़ा हूँ, अपनी योग्यता से नहीं। मेरे मन का घमंड तोड़ दे और डर के बजाय आदर से भरा भरोसा दे। मुझे नम्र रख, ताकि मैं तेरी भलाई को हल्के में न लूँ।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 23

धन्यवाद पिता, कि आप फिर से लगा सकते हैं। जो डाली टूट गई, उसे भी आप कलम की तरह वापस जोड़ देते हैं। इसलिए जो अभी अविश्वास में हैं, उनके लिए भी आशा बाकी है। आपकी सामर्थ्य हमारी टूटन से बड़ी है, इसके लिए मेरा हृदय आपका आभारी है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 24

जंगली जैतून की डाली को अच्छे पेड़ में लगाना, यह प्रकृति के विरुद्ध है। माली ऐसा नहीं करते। पर परमेश्वर ने तेरे साथ यही किया। तू जो दूर था, पराया था, उसे उसने अपने पवित्र पेड़ में जोड़ लिया।

जब कभी लगे कि तू यहाँ का नहीं है, याद रखना, तेरा जुड़ना उसकी कृपा का चमत्कार है, तेरी योग्यता का इनाम नहीं।

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