बाइबल व्याख्या

सपन्याह 1

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

योशिय्याह के राज में सपन्याह को यह वचन मिलता है, और उसकी पहली आवाज़ ही झटका देती है: परमेश्वर पूरी धरती पर से सब का अन्त कर देंगे, मनुष्य, पशु, पक्षी, मछलियाँ। इसके बाद निशाना सिकुड़कर यहूदा और यरूशलेम पर आता है, जहाँ बाल के अवशेष, छतों पर तारों की पूजा, मिल्कोम की शपथ और परमेश्वर को न ढूँढ़ने की सुस्ती चल रही है। अन्त में अध्याय "यहोवा का दिन" खोल देता है: यज्ञ, नरसिंगे, अंधकार, चिल्लाहट, और वह भयानक वाक्य कि उस दिन चाँदी-सोना किसी को नहीं बचा सकेगा।

मूल बात

पद 3 की सूची को धीरे से पढ़िए: मनुष्य, पशु, आकाश के पक्षी, समुद्र की मछलियाँ। यह उत्पत्ति 1 की सृष्टि-सूची है, उलटे क्रम में चलाई गई। सपन्याह न्याय को केवल राजनीतिक आपदा के रूप में नहीं देखता, बल्कि सृष्टि के पीछे लौटने के रूप में। पाप कोई निजी गलती नहीं है जिसका असर बस पापी पर पड़े; वह उस व्यवस्था को खोखला करता है जिसमें जीवन सम्भव है। और परमेश्वर उसे अनदेखा नहीं करते, क्योंकि अनदेखा करना उदासीनता होती, न कि प्रेम। जो परमेश्वर सृष्टि रचते हैं, वही उसे वापस समेटने का अधिकार रखते हैं। यही इस अध्याय की गम्भीरता है और, विचित्र रूप से, इसकी आशा भी।

जोड़नेवाला सूत्र

पद 7 का चित्र सुनने में धार्मिक लगता है, पर है भयावह: "यहोवा ने यज्ञ सिद्ध किया है, और अपने पाहुनों को पवित्र किया है।" बलि यहाँ पशु नहीं, यरूशलेम है; और मेहमान वे राष्ट्र हैं जो उसे खाएँगे। मन्दिर की भाषा युद्ध की भाषा बन जाती है। यहीं से एक रेखा सीधे गुलगुता तक जाती है। नया नियम इसी शब्दावली में यीशु की मृत्यु को पढ़ता है: वह क्रोध का दिन, वह अंधकार, वह बलि, एक व्यक्ति पर उतरता है, ताकि जो उसमें हैं वे पाहुने न रहें, बलि भी न बनें, बल्कि बचाए हुए ठहरें। सपन्याह का यज्ञ अभी न्याय है; मसीह में वही यज्ञ अनुग्रह बन जाता है, बिना न्याय को झूठा ठहराए।

दर्पण

पद 12 का वाक्य सबसे आधुनिक है: लोग "दाखमधु के तलछट तथा मैल के समान बैठे हुए" मन में कहते हैं, "यहोवा न तो भला करेगा और न बुरा।" ये नास्तिक नहीं हैं; ये मन्दिर जानेवाले लोग हैं जिनके लिए परमेश्वर व्यवहार में कुछ नहीं करते। यह वह आदमी है जो रविवार को उपस्थित रहता है और सोमवार को अपना बजट, अपनी नौकरी की चालाकी, अपने बच्चों का भविष्य ऐसे तय करता है जैसे परमेश्वर का उससे कोई लेना-देना न हो। और पद 18 उसकी सुरक्षा-दीवार तोड़ देता है: "न तो चाँदी से उनका बचाव होगा, और न सोने से।" आपकी बचत आपको बीमारी, बुढ़ापे और परमेश्वर के सामने खड़े होने से नहीं बचाएगी। यह कड़वा है, पर झूठ नहीं।

अन्तर्पाठ

पद 13 का "वे घर तो बनाएँगे, परन्तु उनमें रहने न पाएँगे" व्यवस्थाविवरण 28 के शापों की सीधी गूँज है; सपन्याह कुछ नया नहीं गढ़ रहा, वह वाचा की शर्तें याद दिला रहा है। यहूदा को अचानक सज़ा नहीं मिल रही, उसे बहुत पहले चेताया गया था। दूसरी ओर, आपकी बाइबल पद 14 के पास प्रकाशितवाक्य 6:17 का सन्दर्भ देती है, जहाँ राजा और दास एक साथ पूछते हैं कि क्रोध के उस दिन कौन ठहर सकेगा। सपन्याह का "यहोवा का दिन" इतिहास में 586 ईसा पूर्व में उतरा, पर उसका आकार उससे बड़ा रहा; इसीलिए यीशु भी कटनी और छानने की भाषा में इसी दिन की बात करते हैं। एक ही दिन, बढ़ते हुए घेरे।

एक बारीकी

"उस समय मैं दीपक लिए हुए यरूशलेम में ढूँढ़-ढाँढ़ करूँगा।" ठहरिए। यह वही क्रिया है जो पद 6 में लोगों के बारे में कही गई थी: उन्होंने "न तो यहोवा को ढूँढ़ा, और न उसकी खोज में लगे।" जिन्होंने ढूँढ़ना छोड़ दिया, अब वे स्वयं ढूँढ़े जाएँगे। दीपक की छवि तंग गलियों और तहखानों की है, जहाँ आदमी छिपकर सोचता है कि अंधेरा उसे ढक लेगा। परमेश्वर की खोज पुलिस की तलाशी जैसी है, कोने-कोने तक। और यही चित्र सुसमाचार में उलट जाता है, जहाँ एक स्त्री दीपक जलाकर खोए सिक्के को खोजती है। खोजनेवाला परमेश्वर वही है; फ़र्क इसमें है कि आप पाए जाने पर क्या पाते हैं।

श्रोताओं का चेहरा

योशिय्याह के दिन सुधार का समय था: मूर्तियाँ तोड़ी जा रही थीं, मन्दिर साफ़ हो रहा था, राष्ट्रीय गर्व लौट रहा था। ऐसे माहौल में सपन्याह कहता है कि बाल के "बचे हुए" अभी भी हैं, छतों पर तारों की पूजा जारी है, और व्यापारी टोला मक्तेश चाँदी से लदा है। यानी बाहरी सुधार भीतरी हृदय से आगे निकल गया था। असीरिया कमज़ोर पड़ रहा था, बाबेल अभी उठ रहा था, और यरूशलेम को लगता था कि सबसे बुरा समय बीत गया। इस आत्मसन्तुष्टि के बीच "परमेश्वर यहोवा के सामने शान्त रहो" सुनना असहनीय रहा होगा: बोलना बन्द करो, बहाने बन्द करो, न्यायी अदालत में प्रवेश कर चुका है।

चिन्तन

आपके जीवन के किस कोने में आप व्यवहार में मान बैठे हैं कि "यहोवा न तो भला करेगा और न बुरा"?

यदि परमेश्वर आज दीपक लेकर आपके घर, आपके खर्च और आपके निजी विचारों में ढूँढ़ने निकलें, तो आप सबसे पहले क्या छिपाना चाहेंगे, और उसे छिपाए रखना किस कीमत पर पड़ रहा है?

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Zephaniah 1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

सपन्याह 1 का क्या अर्थ है?
योशिय्याह के राज में सपन्याह को यह वचन मिलता है, और उसकी पहली आवाज़ ही झटका देती है: परमेश्वर पूरी धरती पर से सब का अन्त कर देंगे, मनुष्य, पशु, पक्षी, मछलियाँ। इसके बाद निशाना सिकुड़कर यहूदा और यरूशलेम पर आता है, जहाँ बाल के अवशेष, छतों पर तारों की पूजा, मिल्कोम की शपथ और परमेश्वर को न ढूँढ़ने की सुस्ती चल रही है। अन्त में अध्याय "यहोवा का दिन" खोल देता है: यज्ञ, नरसिंगे, अंधकार, चिल्लाहट, और वह भयानक वाक्य कि उस दिन चाँदी-सोना किसी को नहीं बचा सकेगा।
सपन्याह 1 किस विषय में है?
पद 7 का चित्र सुनने में धार्मिक लगता है, पर है भयावह: "यहोवा ने यज्ञ सिद्ध किया है, और अपने पाहुनों को पवित्र किया है।" बलि यहाँ पशु नहीं, यरूशलेम है; और मेहमान वे राष्ट्र हैं जो उसे खाएँगे। मन्दिर की भाषा युद्ध की भाषा बन जाती है। यहीं से एक रेखा सीधे गुलगुता तक जाती है। नया नियम इसी शब्दावली में यीशु की मृत्यु को पढ़ता है: वह क्रोध का दिन, वह अंधकार, वह बलि, एक व्यक्ति पर उतरता है, ताकि जो उसमें हैं वे पाहुने न रहें, बलि भी न बनें, बल्कि बचाए हुए ठहरें। सपन्याह का यज्ञ अभी न्याय है; मसीह में वही यज्ञ अनुग्रह बन जाता है, बिना न्याय को झूठा ठहराए।
सपन्याह 1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पद 13 का "वे घर तो बनाएँगे, परन्तु उनमें रहने न पाएँगे" व्यवस्थाविवरण 28 के शापों की सीधी गूँज है; सपन्याह कुछ नया नहीं गढ़ रहा, वह वाचा की शर्तें याद दिला रहा है। यहूदा को अचानक सज़ा नहीं मिल रही, उसे बहुत पहले चेताया गया था। दूसरी ओर, आपकी बाइबल पद 14 के पास प्रकाशितवाक्य 6:17 का सन्दर्भ देती है, जहाँ राजा और दास एक साथ पूछते हैं कि क्रोध के उस दिन कौन ठहर सकेगा। सपन्याह का "यहोवा का दिन" इतिहास में 586 ईसा पूर्व में उतरा, पर उसका आकार उससे बड़ा रहा; इसीलिए यीशु भी कटनी और छानने की भाषा में इसी दिन की बात करते हैं। एक ही दिन, बढ़ते हुए घेरे।
सपन्याह 1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
योशिय्याह के दिन सुधार का समय था: मूर्तियाँ तोड़ी जा रही थीं, मन्दिर साफ़ हो रहा था, राष्ट्रीय गर्व लौट रहा था। ऐसे माहौल में सपन्याह कहता है कि बाल के "बचे हुए" अभी भी हैं, छतों पर तारों की पूजा जारी है, और व्यापारी टोला मक्तेश चाँदी से लदा है। यानी बाहरी सुधार भीतरी हृदय से आगे निकल गया था। असीरिया कमज़ोर पड़ रहा था, बाबेल अभी उठ रहा था, और यरूशलेम को लगता था कि सबसे बुरा समय बीत गया। इस आत्मसन्तुष्टि के बीच "परमेश्वर यहोवा के सामने शान्त रहो" सुनना असहनीय रहा होगा: बोलना बन्द करो, बहाने बन्द करो, न्यायी अदालत में प्रवेश कर चुका है।
सपन्याह 1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यदि परमेश्वर आज दीपक लेकर आपके घर, आपके खर्च और आपके निजी विचारों में ढूँढ़ने निकलें, तो आप सबसे पहले क्या छिपाना चाहेंगे, और उसे छिपाए रखना किस कीमत पर पड़ रहा है?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Zephaniah 1 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 3

पिता, आपकी बात सुनकर दिल काँप जाता है। जो कुछ हमने बनाया और जिन चीज़ों पर भरोसा किया, वह सब मिट सकता है। हमें हल्के में जीना छोड़कर आपकी ओर लौटना सिखाइए। हमारे मन से वह सब हटा दीजिए जो आपसे दूर करता है, और हमें अपनी दया में थामे रखिए।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 14

पिता, धन्यवाद कि आपने चुपचाप नहीं रहा, बल्कि पहले से चेतावनी दी कि "यहोवा का भयानक दिन निकट है, वह बहुत वेग से समीप चला आता है।" यह चेतावनी भी आपकी करुणा है, क्योंकि इसी से मुझे तैयार होने का अवसर मिलता है। मेरे दिल को जगाए रखिए।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 17

वे अंधों के समान चलेंगे, क्योंकि उन्होंने यहोवा के विरुद्ध पाप किया है।" सबसे डरावनी बात यह नहीं कि सज़ा आई, बल्कि यह कि लोग टटोलते हुए चलने लगे। पाप आँखें नहीं निकालता, वह धीरे धीरे दिशा छीन लेता है। जिन्होंने कहा था कि यहोवा न भला करेगा न बुरा, वे अब रास्ता ही नहीं पहचान पा रहे। आज अपने आप से पूछिए, क्या मुझे अब भी साफ़ दिखता है कि परमेश्वर मुझे किधर बुला रहा है?

धन्यवाद संपादकीय पर पद 6

पिता, धन्यवाद कि जब मैं तुझसे मुड़ गया था और न तुझे ढूँढ़ा, न तेरी खोज में लगा, तब भी तूने मुझे छोड़ नहीं दिया। तूने मेरे मन में फिर से तुझे खोजने की चाह जगाई और अपने पीछे चलने के लिए बुलाया। यह तेरी दया का काम है, मेरा नहीं।

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