7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

1 कुरिन्थियों 12

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

समझाइए

पौलुस कुरिन्थुस की कलीसिया को लिखते हैं। वहाँ के लोग सोचते थे कि पवित्र आत्मा के कुछ वरदान दूसरों से बड़े हैं। जिसके पास कोई खास वरदान था, वह घमंड करने लगता था। पौलुस यह बात ठीक करना चाहते हैं।

पहले वे याद दिलाते हैं कि पवित्र आत्मा से ही कोई कह सकता है, "यीशु प्रभु हैं।" यह पहली और सबसे बड़ी बात है। इसके बाद वे बताते हैं कि आत्मा एक ही है, परमेश्वर एक ही है, पर वरदान बहुत तरह के हैं। किसी को बुद्धि की बातें मिलती हैं, किसी को ज्ञान, किसी को विश्वास, किसी को चंगा करने की शक्ति, किसी को भविष्यद्वाणी करने का वरदान। ये सब वरदान इसलिए दिए जाते हैं ताकि "सब के लाभ" हो, यानी सारी कलीसिया को फायदा मिले, न कि केवल एक व्यक्ति को शोभा मिले।

फिर पौलुस एक तस्वीर देते हैं जो बच्चे भी आसानी से समझ सकते हैं, अपने ही शरीर की तस्वीर। एक शरीर में हाथ, पाँव, आँख, कान, सब अलग अलग हैं, पर सब मिलकर एक ही शरीर बनते हैं। पाँव यह नहीं कह सकता कि "मैं हाथ नहीं हूँ, इसलिए मैं शरीर का हिस्सा नहीं हूँ।" आँख हाथ से यह नहीं कह सकती, "मुझे तेरी ज़रूरत नहीं।" परमेश्वर ने खुद हर अंग को उसकी जगह रखा है, अपनी इच्छा से।

पौलुस यहाँ तक कहते हैं कि जो अंग कमज़ोर या कम आदरणीय लगते हैं, उन्हें और भी ज़्यादा आदर दिया जाता है, ताकि शरीर में फूट न पड़े। जब एक अंग दुःख पाता है, तो सब दुःख पाते हैं। जब एक की बड़ाई होती है, तो सब आनन्द मनाते हैं। यह मसीह की देह, यानी कलीसिया की तस्वीर है। हर विश्वासी उस देह का एक अंग है।

अंत में पौलुस अलग अलग सेवाओं के नाम गिनाते हैं, प्रेरित, भविष्यद्वक्ता, शिक्षक, और दूसरे। वे साफ कहते हैं कि सब लोग सब कुछ नहीं कर सकते। और फिर वे एक रहस्यमय वादा करते हैं, "मैं तुम्हें और भी सबसे उत्तम मार्ग बताता हूँ।" वह मार्ग अगले अध्याय में आता है।

इसका मतलब क्या है?

यह पाठ हमें सिखाता है कि परमेश्वर हर विश्वासी को कुछ न कुछ देते हैं, पर किसी को भी सब कुछ नहीं देते। इसका मतलब है कि हमें एक दूसरे की ज़रूरत है। कोई यह नहीं कह सकता, "मुझे तुम्हारी कोई ज़रूरत नहीं," और कोई यह भी नहीं कह सकता, "मैं किसी काम का नहीं हूँ।" दोनों बातें गलत हैं। यह सोचना दिलचस्प है कि परमेश्वर ने जानबूझकर लोगों को अलग अलग बनाया है, सिर्फ इसलिए नहीं कि दुनिया रंगीन दिखे, बल्कि इसलिए कि हम एक दूसरे पर निर्भर रहें।

बड़ी कहानी से जोड़

पौलुस कहते हैं कि हम सब "एक ही आत्मा के द्वारा एक देह" बने हैं। यह मसीह के साथ जुड़ने की बात है। जो यीशु में विश्वास करते हैं, वे अलग अलग रहते हुए भी एक शरीर बन जाते हैं, जिसका सिर मसीह हैं। यह परमेश्वर की उस बड़ी योजना का हिस्सा है, जिसमें वे बिखरे हुए लोगों को एक साथ जोड़ते हैं, यहूदी और यूनानी, दास और स्वतंत्र, सबको। यही कलीसिया का रहस्य है, कि इतने अलग अलग लोग सचमुच एक हो सकते हैं, क्योंकि सबने एक ही पवित्र आत्मा को पाया है।

आपके लिए

तुम भी उस शरीर का एक अंग हो। शायद तुम सोचते हो कि तुम्हारे पास कोई खास वरदान नहीं है, जैसे कोई और गा सकता है या बोलने में अच्छा है। पर पौलुस कहते हैं कि छोटा दिखनेवाला अंग भी बहुत ज़रूरी होता है। तुम्हारा काम शायद दिखने में छोटा लगे, पर हो सकता है वह किसी और के लिए बहुत बड़ा हो। और जब तुम्हारे किसी दोस्त को दुःख होता है, तो तुम भी उसका हिस्सा हो, इसलिए उसका दुःख तुम्हारा भी दुःख बन सकता है।

बात करें

क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारे पास भी कोई वरदान है? वह क्या हो सकता है, और तुम्हें यह कैसे पता चलेगा?

पौलुस कहते हैं कि कमज़ोर अंग को ज़्यादा आदर मिलना चाहिए। तुम्हारी कक्षा या दोस्तों के बीच यह बात कैसे दिख सकती है?

साथ में प्रार्थना

प्रभु यीशु, धन्यवाद कि आपने हमें अलग अलग बनाया और फिर भी हमें एक साथ जोड़ा है। हमें दिखाइए कि हमारा वरदान क्या है, और हमें सिखाइए कि दूसरों की ज़रूरत को समझें। जब कोई दुखी हो, तो हमें उसके पास ले जाइए। आमीन।

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1 कुरिन्थियों 12 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

1 कुरिन्थियों 12 किस विषय में है?
पौलुस कुरिन्थुस की कलीसिया को लिखते हैं। वहाँ के लोग सोचते थे कि पवित्र आत्मा के कुछ वरदान दूसरों से बड़े हैं। जिसके पास कोई खास वरदान था, वह घमंड करने लगता था। पौलुस यह बात ठीक करना चाहते हैं।
1 कुरिन्थियों 12 क्या कहता है?
फिर पौलुस एक तस्वीर देते हैं जो बच्चे भी आसानी से समझ सकते हैं, अपने ही शरीर की तस्वीर। एक शरीर में हाथ, पाँव, आँख, कान, सब अलग अलग हैं, पर सब मिलकर एक ही शरीर बनते हैं। पाँव यह नहीं कह सकता कि "मैं हाथ नहीं हूँ, इसलिए मैं शरीर का हिस्सा नहीं हूँ।" आँख हाथ से यह नहीं कह सकती, "मुझे तेरी ज़रूरत नहीं।" परमेश्वर ने खुद हर अंग को उसकी जगह रखा है, अपनी इच्छा से।
1 कुरिन्थियों 12 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
अंत में पौलुस अलग अलग सेवाओं के नाम गिनाते हैं, प्रेरित, भविष्यद्वक्ता, शिक्षक, और दूसरे। वे साफ कहते हैं कि सब लोग सब कुछ नहीं कर सकते। और फिर वे एक रहस्यमय वादा करते हैं, "मैं तुम्हें और भी सबसे उत्तम मार्ग बताता हूँ।" वह मार्ग अगले अध्याय में आता है।
बच्चे 1 कुरिन्थियों 12 से क्या सीख सकते हैं?
पौलुस कहते हैं कि हम सब "एक ही आत्मा के द्वारा एक देह" बने हैं। यह मसीह के साथ जुड़ने की बात है। जो यीशु में विश्वास करते हैं, वे अलग अलग रहते हुए भी एक शरीर बन जाते हैं, जिसका सिर मसीह हैं। यह परमेश्वर की उस बड़ी योजना का हिस्सा है, जिसमें वे बिखरे हुए लोगों को एक साथ जोड़ते हैं, यहूदी और यूनानी, दास और स्वतंत्र, सबको। यही कलीसिया का रहस्य है, कि इतने अलग अलग लोग सचमुच एक हो सकते हैं, क्योंकि सबने एक ही पवित्र आत्मा को पाया है।
1 कुरिन्थियों 12 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारे पास भी कोई वरदान है? वह क्या हो सकता है, और तुम्हें यह कैसे पता चलेगा?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 24

परमेश्वर की गिनती हमारी गिनती से उलटी है। जिस अंग के पास पहले से शोभा है, उसे और सजाने की ज़रूरत नहीं। "परन्तु परमेश्वर ने देह को ऐसा बनाया है कि जिस अंग को घटी थी, उसी को और भी बहुत आदर दिया।" कलीसिया का जो कोना किसी को दिखता ही नहीं, वहीं उसकी नज़र टिकी रहती है। तुम्हें अपनी जगह छोटी लगती है? वहीं वह आदर रखता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 19

यदि वे सब एक ही अंग होते, तो देह कहाँ होती?" पौलुस का यह सवाल चुभता है। हम चाहते हैं कि कलीसिया में सब हमारे जैसे सोचें, हमारे जैसे सेवा करें, हमारे जैसे प्रार्थना करें। पर जिस दिन सब एक जैसे हो जाएँ, उस दिन देह खत्म हो जाएगी। जो भाई तुमसे बहुत अलग है, वह गलत नहीं है। वह वही अंग है जिसके बिना तुम अधूरे हो।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 31

तुम बड़े से बड़े वरदानों की धुन में रहो। परन्तु मैं तुम्हें और भी सबसे उत्तम मार्ग बताता हूँ।" पौलुस वरदानों की चाह को गलत नहीं कहता, पर बीच वाक्य में ही रुककर कहता है, एक और रास्ता है। और वह रास्ता प्रेम है। सोच, तेरी सारी सेवा, सारी काबिलियत जिस गली से गुज़रती है, वह गली प्रेम की है या नहीं?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 17

यदि सारी देह आँख ही होती तो सुनना कहाँ होता? यदि सारी देह कान ही होती तो सूँघना कहाँ होता?"

पौलुस मज़ाक नहीं कर रहा, वह दर्द को छू रहा है। कलीसिया में कोई तुझसे बेहतर बोलता है, बेहतर गाता है, और तू चुपचाप सोचता है कि तेरी जगह कहाँ है। पर सोच, अगर सब वही होते जो तुझे प्रभावशाली लगता है, तो देह अपाहिज होती। परमेश्वर ने तुझे कम नहीं बनाया, अलग बनाया। तेरी सेवा छोटी नहीं, बस दूसरी है।

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For parents and teachers: 7 से 12 वर्ष के उन बच्चों के लिए लिखा गया जो स्वयं पढ़ सकते हैं। पारिवारिक भक्ति और स्कूल में बाइबल पाठ के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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