7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

कुलुस्सियों 3

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

पौलुस उन लोगों को लिख रहे हैं जो मसीह पर विश्वास लाए हैं। वे कहते हैं, "जब तुम मसीह के साथ जिलाए गए, तो स्वर्गीय वस्तुओं की खोज में रहो।" यानी, कुछ बदल गया है। जो लोग यीशु मसीह में विश्वास करते हैं, उनके भीतर एक नया जीवन शुरू हो गया है, ठीक वैसे ही जैसे यीशु मृत्यु से जी उठे। यह जीवन परमेश्वर में "छिपा हुआ" है, यानी अभी पूरी तरह दिखता नहीं, पर एक दिन जब मसीह प्रगट होंगे, तब यह जीवन भी महिमा के साथ दिखाई देगा।

फिर पौलुस बहुत सीधी बात कहते हैं। वे कहते हैं कि पुरानी बुरी आदतों को "मार डालो", जैसे झूठ, गुस्सा, गाली-गलौज, बुरी लालसा। ये शब्द कठोर लगते हैं, पर पौलुस यह नहीं कह रहे कि खुद को चोट पहुँचाओ। वे कह रहे हैं कि पुरानी जीवनशैली को पूरी तरह छोड़ दो, जैसे कोई पुराना गंदा कपड़ा उतार कर फेंक दिया जाता है। उसकी जगह एक "नया मनुष्यत्व" पहनना है, यानी नया स्वभाव, जो परमेश्वर की छवि के अनुसार बढ़ता जाता है।

इसके बाद पौलुस बताते हैं कि यह नया जीवन कैसा दिखता है: करुणा, भलाई, नम्रता, सहनशीलता, और सबसे ऊपर प्रेम, जिसे वे "सिद्धता का कमरबन्ध" कहते हैं, यानी वह बेल्ट जो सब कुछ एक साथ बाँधे रखता है। साथ ही क्षमा करना भी ज़रूरी है, ठीक वैसे ही जैसे प्रभु ने हमें क्षमा किया।

अंत में पौलुस घर की बातों पर आते हैं, पति-पत्नी, माता-पिता और बच्चों, और सेवकों के रिश्तों पर। वे कहते हैं कि बच्चे अपने माता-पिता की बात मानें, और पिता अपने बच्चों को भड़काएँ नहीं, ऐसा न हो कि उनका साहस टूट जाए।

इसका क्या मतलब है?

यह अध्याय हमें बताता है कि विश्वास सिर्फ मन की बात नहीं, बल्कि पूरे जीवन की बात है। जब कोई मसीह के साथ जुड़ता है, तो उसकी सोच, उसके शब्द, उसके रिश्ते, सब कुछ धीरे-धीरे बदलने लगते हैं। यह रातों-रात नहीं होता। पौलुस खुद कहते हैं कि नया मनुष्यत्व "ज्ञान प्राप्त करने के लिये नया बनता जाता है", यानी यह एक चलती हुई प्रक्रिया है, कोई एक पल का जादू नहीं।

ध्यान देने वाली बात यह भी है कि पौलुस निराश नहीं करते। वे यह नहीं कहते कि "अगर तुमने गलती की तो सब खत्म।" वे तो सीधे क्षमा की बात करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि हर कोई कभी न कभी गिरता है।

सिलसिला

यह पूरा अध्याय यीशु मसीह के बिना समझ में नहीं आता। पौलुस बार-बार कहते हैं "मसीह के साथ", "मसीह में", "प्रभु यीशु के नाम से।" नया जीवन अपने बलबूते पर शुरू नहीं होता, यह मसीह के साथ जुड़ने से शुरू होता है। और आखिरी वादा भी सुंदर है: "जब मसीह जो हमारा जीवन है, प्रगट होगा, तब तुम भी उसके साथ महिमा सहित प्रगट किए जाओगे।" यह परमेश्वर का वादा है कि यह कहानी अभी पूरी नहीं हुई, आगे कुछ और भी आने वाला है।

तुम्हारे लिए

तुम भी अनुभव करते होगे कि गुस्सा आना, झूठ बोलना, या किसी से बदला लेने का मन करना कितना आसान है। पौलुस यह नहीं कहता कि तुम अकेले इससे लड़ो और खुद अच्छे बन जाओ। वह कहता है, मसीह के साथ जुड़े रहो, और नया स्वभाव धीरे-धीरे बढ़ता जाएगा। शायद आज ही किसी को माफ करने का मौका मिले, या सच बोलने का मौका मिले जब झूठ बोलना आसान होता। वह छोटा कदम भी नए मनुष्यत्व को पहनने जैसा है।

बात करो

अगर परमेश्वर हमें क्षमा करते हैं, तो क्या इसका मतलब है कि हमें कभी बुरा नहीं लगना चाहिए जब हम गलती करते हैं?

तुम्हारे घर में या दोस्तों में कोई ऐसी आदत है जिसे तुम "उतार कर फेंकना" चाहते हो?

साथ में प्रार्थना

हे प्रभु, हमें नया जीवन देने के लिए धन्यवाद। हमें सिखाइए कि झूठ, गुस्सा और बुरी बातें कैसे छोड़ें, और प्रेम तथा क्षमा से कैसे भरें। हमारी मदद कीजिए कि हम हर दिन थोड़ा-थोड़ा आपके जैसे बनते जाएँ। आमीन।

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कुलुस्सियों 3 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

कुलुस्सियों 3 किस विषय में है?
पौलुस उन लोगों को लिख रहे हैं जो मसीह पर विश्वास लाए हैं। वे कहते हैं, "जब तुम मसीह के साथ जिलाए गए, तो स्वर्गीय वस्तुओं की खोज में रहो।" यानी, कुछ बदल गया है। जो लोग यीशु मसीह में विश्वास करते हैं, उनके भीतर एक नया जीवन शुरू हो गया है, ठीक वैसे ही जैसे यीशु मृत्यु से जी उठे। यह जीवन परमेश्वर में "छिपा हुआ" है, यानी अभी पूरी तरह दिखता नहीं, पर एक दिन जब मसीह प्रगट होंगे, तब यह जीवन भी महिमा के साथ दिखाई देगा।
कुलुस्सियों 3 क्या कहता है?
इसके बाद पौलुस बताते हैं कि यह नया जीवन कैसा दिखता है: करुणा, भलाई, नम्रता, सहनशीलता, और सबसे ऊपर प्रेम, जिसे वे "सिद्धता का कमरबन्ध" कहते हैं, यानी वह बेल्ट जो सब कुछ एक साथ बाँधे रखता है। साथ ही क्षमा करना भी ज़रूरी है, ठीक वैसे ही जैसे प्रभु ने हमें क्षमा किया।
कुलुस्सियों 3 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यह अध्याय हमें बताता है कि विश्वास सिर्फ मन की बात नहीं, बल्कि पूरे जीवन की बात है। जब कोई मसीह के साथ जुड़ता है, तो उसकी सोच, उसके शब्द, उसके रिश्ते, सब कुछ धीरे-धीरे बदलने लगते हैं। यह रातों-रात नहीं होता। पौलुस खुद कहते हैं कि नया मनुष्यत्व "ज्ञान प्राप्त करने के लिये नया बनता जाता है", यानी यह एक चलती हुई प्रक्रिया है, कोई एक पल का जादू नहीं।
बच्चे कुलुस्सियों 3 से क्या सीख सकते हैं?
यह पूरा अध्याय यीशु मसीह के बिना समझ में नहीं आता। पौलुस बार-बार कहते हैं "मसीह के साथ", "मसीह में", "प्रभु यीशु के नाम से।" नया जीवन अपने बलबूते पर शुरू नहीं होता, यह मसीह के साथ जुड़ने से शुरू होता है। और आखिरी वादा भी सुंदर है: "जब मसीह जो हमारा जीवन है, प्रगट होगा, तब तुम भी उसके साथ महिमा सहित प्रगट किए जाओगे।" यह परमेश्वर का वादा है कि यह कहानी अभी पूरी नहीं हुई, आगे कुछ और भी आने वाला है।
कुलुस्सियों 3 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
अगर परमेश्वर हमें क्षमा करते हैं, तो क्या इसका मतलब है कि हमें कभी बुरा नहीं लगना चाहिए जब हम गलती करते हैं?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 20

हे बालको, सब बातों में अपने माता-पिता की आज्ञा मानो, क्योंकि प्रभु इससे प्रसन्न होता है।" पौलुस ने यह बात मंदिर या सभा के बारे में नहीं, घर की रसोई और आँगन के बारे में कही। जो बच्चा बिना बहस किए माँ की बात मान लेता है, वहीं स्वर्ग मुस्कुराता है। और तू, जिसके माता-पिता अब बूढ़े हो चले हैं, तेरी आवाज़ का लहजा भी तो आज्ञाकारिता ही है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 19

हे पतियो, अपनी-अपनी पत्नी से प्रेम रखो और उनसे कठोरता न किया करो।" ध्यान दो, पौलुस ने पति को अधिकार जताने को नहीं कहा, प्रेम करने को कहा। और साथ में एक चेतावनी भी दी, क्योंकि प्रेम करते हुए भी आवाज़ कड़वी हो सकती है। घर में तुम्हारा लहज़ा भी तुम्हारी गवाही है। जिससे तुम सबसे ज़्यादा प्रेम करते हो, क्या उसी से सबसे कठोरता से बोलते हो?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 16

मसीह का वचन तुम में बहुतायत से बसा रहे।" ध्यान दो, पौलुस ने यह नहीं कहा कि वचन तुमसे मिलने आए, बल्कि तुम में बस जाए। मेहमान की तरह नहीं, घर के सदस्य की तरह। और जो भीतर बसता है, वही बाहर निकलता है, सिखाने में, समझाने में, गीतों में। आज अपनी बातचीत सुनो। उससे पता चलेगा कि तुम्हारे भीतर कौन रहता है।

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हमारे पास छोटे बच्चों (3-6 वर्ष) और किशोरों (12 वर्ष और अधिक) के लिए विशेष संस्करण भी हैं।

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For parents and teachers: 7 से 12 वर्ष के उन बच्चों के लिए लिखा गया जो स्वयं पढ़ सकते हैं। पारिवारिक भक्ति और स्कूल में बाइबल पाठ के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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